कुछ जरूरी कदम
जघन्य अपराध करने वाले अपराधी कुछ समय बाद समाज में बेखौफ घूमते नजर आते हैं। न तो समाज उनका बहिष्कार करता है और न ही कानून उन्हें किसी तरह का कठिन दंड दे पाता है। सदियों से चली आ रही सामाजिक-प्रशासनिक व्यवस्था में आमूलचूल बदलाव आना तो असंभव-सा जान पड़ता है। लिहाजा बढ़ते महिला अपराधों को रोकने का दायित्व समाज को ही लेना होगा।
शुरुआत घर से
घर समाज का अभिन्न हिस्सा है। अगर हमें अगली पीढ़ी में बदलाव लाना है तो बच्चों के दिलो-दिमाग में यह मानसिकता विकसित करनी होगी कि समाज में लड़का-लड़की बराबर हैं। लड़के अगर वंश के अग्रज हैं, तो लड़कियां वंश की जन्मदात्री हैं। लड़कों को लड़कियों के मौलिक अधिकारों की रक्षा करना और उनकी सुरक्षा के प्रति सजग रहना भी सिखाना होगा, तभी वे बड़े होकर महिला अपराध रोकने में सहयोग दे सकेंगे। वहीं लड़कियों को बचपन से ही दूसरों की अपेक्षाओं-आकांक्षाओं के प्रति दृढ़ता से विरोध करना या किसी के भी गलत व्यवहार के खिलाफ प्रतिक्रिया करना सिखाना चाहिए। आत्मसुरक्षा के विभिन्न तरीके सिखाने चाहिए, ताकि वे विरोधी परिस्थितियों के प्रति पूरी तरह सतर्क रहें और खुद को सुरक्षित रख सकें।
समाज का दायित्व
महिला अपराध को रोकने की जिम्मेदारी समाज के हर व्यक्ति की है। पुरुष की दरिंदगी का शिकार होती महिला की सुरक्षा के लिए समुचित कदम उठाने चाहिए। तमाशबीन न बनकर असहाय महिला के रखवाले बनना चाहिए। यह सच है कि पुलिस सूचना के अभाव में घटना स्थल पर देरी से पहुंचती है, लेकिन जरूरत है आस-पास के लोगों को महिला की मदद के लिए आगे आने की, तुरंत एक्शन लेने की।
अगर 4-5 लोग भी मिलकर हत्यारे को रोकने का प्रयास करें तो निश्चित ही सफल हो सकते हैं और किसी की जान बच सकती है। उन्हें देखकर संभव है, दूसरे लोग भी उनके साथ हो लें और अपराधी को काबू में कर लें। आज कानूनी प्रक्रिया में काफी बदलाव आया है। पुलिस महिला अपराध की सूचना देने वाले व्यक्ति को शक के घेरे में नहीं लेती। अब व्यक्ति अपनी पहचान गुप्त रखकर भी घटना की सूचना दर्ज करा सकता है। समाज में बढ़ते महिला अपराध को रोकना है तो अपराधी के खिलाफ पुलिस में रिपोर्ट दर्ज कराने की हिम्मत तो जुटानी ही होगी।
हमें ही तो बदलना है ‘समाज’
सेंटर फॉर सोशल रिसर्च, दिल्ली की डायरेक्टर डॉ. रंजना कुमारी के मुताबिक, आज जरूरत है समाज में लोगों को इन साइकोपैथ व्यक्ति का शिकार होती पीड़िता की हरसंभव मदद करने की। अगर कहीं किसी भी महिला को किसी भी तरह से प्रताड़ित किया जा रहा है तो लोगों को तुरंत सामने आना चाहिए और एकजुट होकर अपराधी का प्रतिकार करने हेतु कदम उठाने चाहिए। सही मायने में तभी इंसान कहलाएंगे। सिर्फ तमाशा देखने और आंखें मूंद कर पतली गली से निकल लेने से कभी यह समाज महिलाओं के लिए सुरक्षित नहीं बन पाएगा।