अयोध्या में 22 जनवरी को राम लला की प्राण प्रतिष्ठा होने जा रही है। इस अवसर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी मौजूद रहेंगे। 5 अगस्त 2020 को हुए भूमि-पूजन कार्यक्रम में भी प्रधानमंत्री पहुंचे थे। अब प्राण प्रतिष्ठा कार्यक्रम में भी प्रधानमंत्री समेत देश की कई जानी मानी हस्तियां शरीक होंगी।
अब जब राम मंदिर साकार रूप ले रहा है तो इससे जुड़ी घटनाएं भी विमर्श में सामने आ रही हैं। ऐसी ही एक घटना है साल 1986 की जब कानूनी विवाद के बीच राम जन्मभूमि परिसर का ताला खुला था। पिछले दिनों जब कांग्रेस ने राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा समारोह का न्योता ठुकराया तो ताला खुलवाने वाली घटना की चर्चा फिर से शुरू हो गई। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता आचार्य प्रमोद कृष्णम ने कहा कि कांग्रेस वो पार्टी है जिसके नेता राजीव गांधी ने ही इस राम मंदिर का शिलान्यास, इस मंदिर का ताला खुलवाने का काम किया था।
अयोध्या में 22 जनवरी को राम लला की प्राण प्रतिष्ठा होने जा रही है। इस अवसर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी मौजूद रहेंगे। 5 अगस्त 2020 को हुए भूमि-पूजन कार्यक्रम में भी प्रधानमंत्री पहुंचे थे। अब प्राण प्रतिष्ठा कार्यक्रम में भी प्रधानमंत्री समेत देश की कई जानी मानी हस्तियां शरीक होंगी।
अब जब राम मंदिर साकार रूप ले रहा है तो इससे जुड़ी घटनाएं भी विमर्श में सामने आ रही हैं। ऐसी ही एक घटना है साल 1986 की जब कानूनी विवाद के बीच राम जन्मभूमि परिसर का ताला खुला था। पिछले दिनों जब कांग्रेस ने राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा समारोह का न्योता ठुकराया तो ताला खुलवाने वाली घटना की चर्चा फिर से शुरू हो गई। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता आचार्य प्रमोद कृष्णम ने कहा कि कांग्रेस वो पार्टी है जिसके नेता राजीव गांधी ने ही इस राम मंदिर का शिलान्यास, इस मंदिर का ताला खुलवाने का काम किया था।
आइये जानते हैं राम जन्मभूमि परिसर पर ताला कब लगा? ताला खुलने की घटना क्या थी? किस वजह से ताला खुलवाया गया था? इसके बाद क्या हुआ?
राम जन्मभूमि परिसर पर ताला कब लगा?
22 दिसंबर 1949 की रात को अयोध्या में विवादित बाबरी ढांचे के नीचे हिंदू मूर्तियां प्रकट हुईं। इस घटना के बाद इलाके में तनाव की स्थिति उत्पन्न हो गयी। 29 दिसंबर 1949 को फैजाबाद की एक अदालत ने बढ़ते सांप्रदायिक तनाव को काबू करने के लिए इस स्थल को सरकार को सौंप दिया। कुछ ही समय बाद परिसर में ताला लग गया। दूसरी तरफ आजादी के पहले से चली आ रही कानूनी लड़ाई जारी रही।
...तो ताला खुलने की बात क्यों आई?
दावा किया जाता है कि पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी के कार्यकाल में इस विवाद को सबसे बड़ी हवा मिली, जिसमें शाह बानो केस की बड़ी भूमिका मानी गई। दरअसल, मध्य प्रदेश के इंदौर की रहने वाली मुस्लिम महिला शाहबानो को पति मोहम्मद अहमद ने 62 वर्ष की उम्र में तलाक दे दिया था। उनके शौहर ने 1978 में तीन तलाक कहते हुए उनको घर से निकाल दिया था। शाहबानो उस वक्त पांच बच्चों की मां थीं। बच्चों और अपनी जीविका का कोई जरिया न होने से पति से गुजारा लेने के लिए शाह बानो ने अदालत का रुख किया।
शाह बानो कोर्ट पहुंचीं। सात साल चली कानूनी लड़ाई के बाद 23 अप्रैल 1985 के दिन सर्वोच्च अदालत का फैसला तलाकशुदा महिला के पक्ष में आया। कोर्ट ने सीआरपीसी की धारा 125 के तहत फैसला दिया। इसमें कहा गया कि यह हर किसी पर लागू होता है, फिर चाहे वह व्यक्ति किसी भी धर्म का हो। इसके साथ ही अदालत ने निर्देश दिया कि शाह बानो को निर्वाह-व्यय दिया जाए।
शाह बानो केस की कहानी
जाने-माने लेखक रामचंद्र गुहा अपनी किताब 'इंडिया आफ्टर नेहरू' में लिखते हैं कि न्यायाधीशों ने याचिका के संदर्भ से बाहर जाते हुए कुछ सामान्य टिप्पणी भी की। उन्होंने संविधान की धारा 44 का जिक्र करते हुए समान नागरिक संहिता का हवाला दिया और इस पर खेद जताया कि संविधान की ये धारा एक ‘मृत दस्तावेज के बराबर’ हो गई है। उन्होंने कहा कि लोगों में ऐसी धारणा बन गई है कि सिर्फ मुसलमानों को ही अपने निजी कानूनों में सुधार के लिए आगे आना चाहिए। विवादित विचारों वाले कानून के प्रति व्याकुल प्रतिबद्धता को दूर कर एक समान नागरिक संहिता, राष्ट्र के एकीकरण में मददगार साबित होगी।
पुस्तक में लिखा गया कि सुप्रीम कोर्ट की इस टिप्पणी को पूरे मुस्लिम समुदाय के प्रति एक गैर-जरूरी टिप्पणी के रूप में देखा गया। मुस्लिम धर्मगुरुओं ने फैसले की ये कहकर आलोचना की कि यह इस्लाम पर एक हमला है। देशभर की मस्जिदों में इसका विरोध किया गया। मुस्लिम धर्म गुरुओं ने सुप्रीम कोर्ट और शाहबानो की कड़ी आलोचना की। दूसरी तरफ कुछ इस्लामी विद्वानों ने इस फैसले का स्वागत करते हुए कहा कि यह शरीयत के खिलाफ नहीं है। उन्होंने कहा कि इस्लाम में ये प्रावधान है कि तलाक देते समय पति को अपनी पूर्व पत्नी की मृत्यु या उसके पुनर्विवाह तक उसको उचित गुजारा भत्ता देना चाहिए।
अदालती फैसले के तीन महीने बाद संसद में प्राइवेट मेंबर बिल
सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के तीन महीने बाद जी.एम. बनात वाला नाम के सांसद ने संसद में एक प्राइवेट मेम्बर बिल पेश किया। इस बिल में मुसलमानों को धारा 125 के दायरे से मुक्त करने की बात कही गई थी। सदन में इस बिल का विरोध तत्कालीन केंद्रीय गृह राज्य मंत्री आरिफ मोहम्मद खान ने किया। उन्होंने अदालत के फैसले का समर्थन किया।
'इंडिया आफ्टर नेहरू' किताब में राम चंद्र गुहा लिखते हैं कि आरिफ मोहम्मद खान को प्रधानमंत्री का समर्थन हासिल था और कांग्रेस पार्टी द्वारा बिल के विरोध में जाने के कारण यह बिल संसद में गिर गया। लेकिन सदन के बाहर यह बहस चलती रही। दूसरी तरफ इंदौर में कट्टरपंथियों ने शाहबानो को धर्मच्युत करार कर दिया, उसके घर के बाहर धरना प्रदर्शन किया गया और पड़ोसियों से उसके बहिष्कार की मांग की गई। 15 नवंबर 1985 को शाहबानो, कट्टरपंथियों के दबाव के सामने झुक गईं और उन्होंने एक कागजी बयान पर अंगूठे का निशान लगा दिया, जिसमें कहा गया कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले की जिम्मेदारी उन पर नहीं है और वह गुजारा भत्ते को लोकसेवा लिए दान दे देंगी। इसके साथ ही उन्होंने ये भी कहा कि मुस्लिम निजी कानून में किसी तरह का न्यायिक हस्तक्षेप नहीं होना चाहिए।
1985 के अंत में हुए उप-चुनावों में कांग्रेस की हार
अदालती फैसले के बाद उपजे विरोध के बीच 1985 के अंत में उत्तर भारतीय राज्यों में उप-चुनाव हुए। इनमें कांग्रेस बुरी तरह पराजित हुई। गुहा अपनी किताब में लिखते हैं कि राजनीतिक विश्लेषकों ने ‘शाहबानो मामले’ को इसकी वजह बताया। गुहा के मुताबिक मुसलमानों के पार्टी से अलगाव ने राजीव गांधी को चिंतित कर दिया। कांग्रेस कट्टरपंथियों के दबाव में आ गई। राजीव पार्टी और मंत्रिमंडल के मसलों पर उदारपंथी आरिफ खान की बजाय जेड.ए. अंसारी से सलाह लेने लगे। संसद में अपने तीन घंटे के भाषण में अंसारी ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले को पूर्वाग्रहग्रस्त, भेदभावकारी और विरोधाभासों से पूर्ण बताया। अंसारी ने कहा कि अदालत के न्यायाधीश इस्लामी कानूनों की व्याख्या करने के लिए बहुत छोटे इंसान हैं।
जनवरी 1986: बिल लाकर कोर्ट के फैसले को निष्प्रभावी करने का एलान
जून 2019 में एक निजी टीवी चैनल को दिए साक्षात्कार में केरल के राज्यपाल और उस वक्त राजीव सरकार में मंत्री रहे आरिफ मोहम्मद खान कहते हैं, '15 जनवरी 1986 को प्रधानमंत्री (राजीव गांधी) ने दिल्ली के सिरी फोर्ट ऑडिटोरियम में एक सम्मेलन के दौरान एलान किया कि पर्सनल लॉ बोर्ड (मुस्लिम) से हमारा समझौता हो गया है कि 5 फरवरी 1986 से शुरू हो रहे संसद के शीतकालीन सत्र में विधेयक लाकर सुप्रीम कोर्ट के फैसले को निष्प्रभावी कर दिया जाएगा।'
राजीव सरकार के एलान का विरोध
आरिफ मोहम्मद कहते हैं, 'सत्र को शुरू होने के 20 दिन पहले हुए एलान को लेकर देशभर में विरोध उठने लगा। सरकार में होने के कारण खुफिया जानकारी मिली कि देश में स्थिति पूरी तरह खराब हो गई है। इस बीच एक बैठक में सुझाव दिया गया कि शाह बानो के फैसले को बदलने का एलान करने से जो प्रतिक्रिया हुई है उसको संतुलित करने के लिए अयोध्या का ताला खुलवा दिया जाए।'
1 फरवरी 1986 को खुल गया परिसर का ताला
ताला खुलवाने की घटना के बारे में रामचंद्र गुहा अपनी किताब में लिखते हैं, 'शाहबानो मामले में सुप्रीम कोर्ट का फैसला आने के दस महीने बाद एक जिला अदालत के फैसले ने और भी बड़े भूचाल को जन्म दे दिया। 1 फरवरी 1986 को उत्तर प्रदेश के शहर अयोध्या में जिला न्यायाधीश ने एक छोटे से हिंदू उपासना गृह का ताला खोलकर पूजा करने की इजाजत दे दी। लोगों का ऐसा मानना था कि न्यायाधीश का फैसला नई दिल्ली के निर्देश पर हुआ है। ऐसा माना गया कि प्रधानमंत्री कार्यालय ने ऐसा करने का निर्देश दिया है। ऐसा लगा कि स्थानीय प्रशासन को फैसले के बारे में पहले से जानकारी थी क्योंकि फैसले के एक घंटे के भीतर ही बाबरी मस्जिद का ताला खोल दिया गया। खास बात तो ये थी राष्ट्रीय टेलीविजन भी उस क्षण इस घटना को अपने कैमरे में उतार रहा था, जब लोगों का हुजूम अभी-अभी खुले उपासना गृह की तरफ जा रहा था। ऐसा लग रहा था कि मुस्लिम महिला बिल और अयोध्या के फैसले के बीच कोई मजबूत तार जुड़ा हुआ है। ऐसा कहा गया कि राजीव गांधी ने मस्जिद का ताला अपने सहयोगी अरुण नेहरू की सलाह पर खुलवाया।'
गुहा ने किताब में राजनीतिक विश्लेषक नीरजा चौधरी के हवाले से लिखा कि ‘राजीव गांधी एक ही साथ दोनों पक्षों को संतुष्ट करना चाहते थे। अगर एक काम मुस्लिम मत को आकर्षित करने के लिए किया गया था तो दूसरा उससे भी बड़ा हिंदू मतदाताओं को संतुष्ट करने के लिए किया गया।’
आरिफ मोहम्मद खान ने एक साक्षात्कार में दावा किया, '5 फरवरी से संसद का सत्र शुरू हुआ और 6 फरवरी को मैं प्रधानमंत्री से मिला। मैंने प्रधानमंत्री से कहा कि लोग शाह बानो केस को भूल जाएंगे लेकिन जो अयोध्या में ताला खोला गया है उसे हल करना कठिन हो जाएगा। तो पलटकर प्रधानमंत्री ने कहा कि कोई मुस्लिम नेता इसका विरोध नहीं करेगा। मैंने पूछा कि यह कैसे? तो प्रधानमंत्री ने कहा कि ताला खुलने से पहले मैंने उनको इत्तला कर दी थी।'
19 मई 1986 को पारित हुआ बिल
दूसरी ओर 22 फरवरी 1986 को सरकार ने संसद में एक मुस्लिम महिला बिल पेश किया जिसके द्वारा मुस्लिम निजी कानून को अपराध दंड संहिता के दायरे से बाहर रखकर अप्रैल 1985 के सुप्रीम कोर्ट के फैसले को पलटने की कोशिश की गई। इस बिल ने तलाकशुदा पत्नी के गुजारे की व्यवस्था का जिम्मा अपने संबंधियों पर छोड़ दिया। अब तलाक देने वाले पति को सिर्फ उसे तीन महीने का गुजारा भत्ता देना था। 19 मई 1986 को इस बिल को पारित कर दिया गया और कांग्रेस पार्टी ने इसे पारित करने के लिए अपने सारे सांसदों को पार्टी व्हिप जारी किया। अपनी पार्टी और अपने नेता द्वारा खारिज किए जाने के बाद आरिफ मोहम्मद खान ने कांग्रेस से इस्तीफा दे दिया।