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Ram Mandir: रथयात्राओं से बना माहौल और खुला राम जन्मभूमि का ताला; विशारद के मुकदमे को बनाया गया था आधार

Fri, 12 Jan 2024 08:03 AM IST
आकाश दुबे अखिलेश वाजपेयी, अमर उजाला, अयोध्या

सार

आंदोलन से युवाओं को जोड़ने के लिए बजरंग दल का गठन किया गया था। संयोजक विनय कटियार को बनाया गया था। सभी पंथों व जातियों को जोड़ने के लिए तीन एकात्मता यज्ञ यात्राएं निकलीं थीं।
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अयोध्या राम मंदिर - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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मार्च 1983 के मुजफ्फरनगर के हिंदू सम्मेलन के बाद जिलों में हुए सम्मेलनों में जुटी भीड़ ने राम जन्मस्थान विवाद के मुक्त होने की उम्मीद बढ़ा दी थी। संघ की योजना पर अयोध्या पहुंचे संघ प्रचारक महेश नारायण सिंह का डेरा अब सुग्रीव किला के बजाय राम जन्मस्थान के सामने 2.77 एकड़ भूमि के टुकड़े पर जम चुका था। इसे महंत बाबा अभिरामदास के शिष्य रामकेवल दास ने विहिप को दे दी थी। यह वही भूमि थी, जो आगे शिलान्यास एवं कारसेवा आंदोलन का आधार बनी।

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अशोक सिंहल, मोरोपंत पिंगले और ओंकारभावे भी अयोध्या आ चुके थे। रामचबूतरे पर सीताराम नाम अखंड कीर्तन के जरिये रामलला के दर्शन को आने वाले श्रद्धालुओं को रामजन्मभूमि मुक्ति के संघर्ष का इतिहास वितरित कर उन्हें मुक्ति आंदोलन की तैयारियों की जानकारी देकर जनजागरण शुरू हो चुका था। राम जन्मभूमि मुक्ति के मुकदमे के वादी दिगंबर अखाड़े के महंत रामचंद्रदास परमहंस, गोरक्षपीठ के पीठाधीश्वर महंत अवेद्यनाथ, अमेठी के राजा रणजंय सिंह सहित अयोध्या और आसपास के तमाम रजवाड़ों और साधन संपन्न लोगों के साथ जुड़ने से मंदिर मुक्ति के आंदोलन के साधनों का अब टोटा भी नहीं था। विहिप ने धर्मस्थल रक्षा समिति बनाकर आंदोलन आगे बढ़ाने का फैसला किया। समिति ने दिल्ली में 6 अगस्त, 1983 को पत्रकार वार्ता में श्रीराम जन्मभूमि का ताला खोलो आंदोलन की घोषणा की।

आंदोलन से युवाओं को जोड़ने के लिए अशर्फी भवन में बजरंग दल का गठन किया गया। संयोजक विनय कटियार को बनाया गया। सभी पंथों व जातियों को जोड़ने के लिए तीन एकात्मता यज्ञ यात्राएं निकलीं। गंगा माता की जय, राम ने उत्तर से दक्षिण को जोड़ा-जाति-पांत का बंधन तोड़ा नारों से देशभर की नदियों का जल एकत्र कर उसे लोगों में वितरित करके और उसमें उनके घर का थोड़ा जल मिलाकर जनजागरण किया गया। संघ के तत्कालीन सरसंघचालक बाला साहब देवरस के सुझाव पर दिल्ली के विज्ञान भवन में 7-8 अप्रैल, 1984 को हिंदू धर्म के विभिन्न पंथों के धर्माचार्यों की बैठक हुई, जिसे धर्मसंसद नाम दिया गया। पहली बैठक में राम और कृष्ण की जन्मभूमि तथा विश्वनाथ मंदिर की मुक्ति के आंदोलनों का दायित्व संतों ने अपने ऊपर लिया। 18 जुलाई, 84 को महंत अवेद्यनाथ की अध्यक्षता में श्रीरामजन्मभूमि मुक्ति यज्ञ समिति का औपचारिक गठन हुआ। महंत रामचंद्रदास परमहंस और महंत नृत्यगोपाल दास को उपाध्यक्ष, पूर्व मंत्री और कांग्रेस नेता दाऊदयाल खन्ना को महामंत्री तथा ओंकार भावे, दिनेश त्यागी और महेश नारायण सिंह को मंत्री नियुक्त किया गया।

विशारद के मुकदमे को बनाया आधार
ताला खोलने की मांग को लेकर कई चरणों में आठ रथयात्राएं निकाली गईं। मेरे जल को लेकर राम जन्मस्थान मुक्त कराने की सौगंध ली गई। साल 1986 आ गया। कांग्रेस सरकार और मुख्यमंत्री थे वीरबहादुर सिंह। लखनऊ में 12 जनवरी को संत सम्मेलन में 9 मार्च से सत्याग्रह की घोषणा हुई। परमहंस ने रामनवमी तक ताला न खुलने पर आत्मदाह की चेतावनी दी। इसी बीच, फैजाबाद के वकील उमेश पांडेय ने मुंसिफ मजिस्ट्रेट की अदालत में राम जन्मभूमि का ताला खोलने की अपील दाखिल की। उन्होंने गोपाल सिंह विशारद के 1950 के मुकदमे में जिला न्यायालय के श्रद्धालुओं को बिना रोकटोक दर्शन के आदेश को आधार बनाया।
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उच्च न्यायालय ने भी इसी निर्णय को बहाल रखा था। फिर भी प्रशासन ने अवैध रूप से सींकचा लगवाकर ताला डलवा दिया था। मुंसिफ मजिस्ट्रेट ने अपील निरस्त कर दी। उमेश ने जिला जज के यहां अपील की। जिला न्यायाधीश न्यायमूर्ति कृष्णमोहन पांडेय ने तत्कालीन जिला अधिकारी और एसएसपी से ताला की वजह पूछी, तो वे कुछ बता नहीं पाए। सिर्फ यह कहा कि इसका कोई लिखित आदेश उपलब्ध नहीं है। बिना ताला के भी परिसर की सुरक्षा हो सकती है। शाम 5.25 का वक्त होगा, मेरे कानों में सियावर रामचंद्र की जय गूंजी। पता चला कि जिला न्यायाधीश ने प्रभु के स्थान पर लगे ताले को खोलने का फैसला दिया है।
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