हरियाणा का लोक और भक्ति साहित्य राम के आदर्शों और राम की लीलाओं से भरा है। यहां के संत कवियों ने राम के दर्शन को आधार मानकर जिस भक्ति साहित्य का सृजन किया, वह आज तक प्रासंगिक है। गरीब दास और निश्चल दास की रचनाओं में वाल्मीकि रामायण और रामचरित मानस के पात्रों का जिक्र कई-कई बार आता है। आज जब अयोध्या में रामलला की मूर्ति की प्राण प्रतिष्ठा हो रही है, तब हरियाणवी साहित्य में राम के दर्शन का महत्व और बढ़ जाता है।
हरियाणा को सदियों पहले से हरि धान्यक, बहु धान्यक, हरण्यक आदि नाम से पुकारा जाता रहा है। रामचरित मानस में भी अरण्य कांड में उस माहौल को दिखाया गया है जिसकी कल्पना हरण्यक यानी हरियाणा के बारे में की जाती है। इसी कारण हरियाणा के संत यानी भक्ति साहित्य में राम स्मरण, शब्द योग साधना, सतगुरु की शरण, आनंद शब्द की पहचान, पतिव्रता का धर्म, जीवों पर दया, निष्काम कर्म, विषय विकार से दूरी का समावेश राम के जीवन से ही किया गया है।
हरियाणवी संस्कृति पर काम कर रहे दूबलधन जिला झज्जर हरियाणा निवासी डॉ. महावीर कादियान बताते हैं कि हरियाणा में जब संत परंपरा शुरू हुई तो चारों ओर राजनीतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक और धार्मिक अव्यवस्था थी। ऐसे हालात में संतों ने राम के जीवन के आधार पर साहित्य का सृजन कर समाज को दिशा देने का काम किया। इन संतों में गरीबदास का नाम सबसे ऊपर है जो हरियाणा के रोहतक जिले के करौथा गांव में जन्मे थे और झज्जर जिले के छुड़ानी की गद्दी के महंत के रूप में में चर्चित हुए थे। उनके ग्रंथ का सुमिरन अंग पूरा का पूरा राम महिमा से सारगर्भित है। वह लिखते हैं:-
गरीब ऐसा अविगत राम है, आदि अंत नहीं कोय
वार पार कीमत नहीं, अचल है हिरंबर सोय।
इसका अर्थ है राम ऐसा सर्वज्ञ है जिसका न तो कोई आदि है तथा नहीं कोई अंत है, भगवान प्रभु अमूल्य है तथा वह अचल और अडिक रूप में मानवता की सेवा कर रही है।
गरीब अष्ट कंवल दल राम है, बाहर भीतर राम।
पिंड ब्रह्मांड में राम है, सकल ठौर सब धाम।
उपरोक्त दोहे में गरीब दास जी कहते हैं कि सभी आठ दलों में राम है। समूचे ब्रह्मांड में राम वास करते हैं। कोई भी धाम (गांव) उनके बिना अस्तित्व में नहीं रह सकता।
गरीब मूल कंवल में राम है, स्वाद चक्र में राम।
नाभि कमल में राम है, हृदय कंवल विश्राम।
गरीब दास जी कहते हैं कि हमारी नाभि, मन तथा स्वाद चक्कर हर जगह राम विद्यमान हैं।
संत निश्चल दास ने भी राम की महत्ता को अपने साहित्य में संजोया
हरियाणा के सोनीपत जिले के किङहोली गांव से संबंधित तपस्वी संत निश्चल दास जी ने भी राम की महत्ता को अपने साहित्य में संजोने का अनुपम काम किया है। निश्चल दास जी ने तो राम के साथ-साथ दशरथ की भी स्तुति की है। उनकी एक चौपाई इस प्रकार है:-
राम राम सबको कहै, दशिरत कहे न कोय।
एक दशिरत कहै, तो कोटिज्य फल होय।
इस चौपाई में निश्चल दास जी कहते हैं कि राम-राम सब कहते हैं, अभिवादन में दशरथ का नाम कोई नहीं लेता। यदि दशरथ का स्मरण करें तो करोड़ गुना फल मिल सकता है। निश्चल दास जी की चौपाइयों में बाल्मीकि रामायण का जिक्र कई बार आता है। उनकी सारी की सारी चौपाई रामचरितमानस की तर्ज पर रचित की गई है।
डॉ. कादियान का कहना है कि राम भक्ति में जो स्थान रामचरितमानस का है, वही स्थान राम स्तुति में निश्चल दश्चित विचार सागर, युक्ति प्रकाश तथा वृति प्रभाकर आदि का है। इस प्रकार जीतराम, हरिदास, रामदास, लाल दास, प्रेमदास, चेतन दास, जीवनदास, पूर्ण दास, संत मंगतराम, ऊधो बाई और नाथ पंथ के साहित्य में राम हर जगह समावेशित हैं।