फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

आंखन देखी अयोध्या : माई बाड़ा...पुरुषों के मठ में हमें कौन महंत-महाराज बनाएगा, यहीं सुरक्षित हैं हम सब

Thu, 18 Jan 2024 05:55 AM IST
दुष्यंत शर्मा उपमिता वाजपेयी, अयोध्या

सार

....भगवान राम का जिक्र आता है तो उनकी आंखें डबडबा जाती हैं। कहती हैं, सीता जी हमारी बहन हैं। बड़े दुख किए, अब घर मिला है। आंसू पोछती हैं, लेकिन गला रुंध जाता है। पिछले आषाढ़ की द्वादशी को 100 साल पूरे कर लिए हैं रामसनेही दासी ने। माई बाड़ा की वो सबसे उम्रदराज संत हैं।
विज्ञापन
ayodhya ram mandir - फोटो : अमर उजाला
विज्ञापन

विस्तार
वॉट्सऐप चैनल फॉलो करें

जननी सम जानहिं पर नारी। तिन्ह के मन सुभ सदन तुम्हारे ।।

विज्ञापन

यानी, जो पुरुष अपनी पत्नी के अलावा किसी और स्त्री को मां के समान समझता है, उसी के हृदय में ईश्वर का वास होता है।

भगवान राम का जिक्र आता है तो उनकी आंखें डबडबा जाती हैं। कहती हैं, सीता जी हमारी बहन हैं। बड़े दुख किए, अब घर मिला है। आंसू पोछती हैं, लेकिन गला रुंध जाता है। पिछले आषाढ़ की द्वादशी को 100 साल पूरे कर लिए हैं रामसनेही दासी ने। माई बाड़ा की वो सबसे उम्रदराज संत हैं। जन्मभूमि आंदोलन में जब ढांचा गिरा, गोलियां चलीं तो वो सरयू किनारे रहती थीं। कहती हैं बसों में भरकर लाशें आतीं और उन्हें सरयू में बहा देते थे। आठ दिन तक लोग सरयू में इसलिए नहा नहीं पाए क्योंकि खून से पानी लाल हो गया था। 

उनके बाड़े में रामजानकी मंदिर की पहली महंत रेशमा दासी 70 साल की उम्र में भी मोपेड चलाती थीं। हृष्ट-पुष्ट ऐसी कि 50 किलो की बोरी अकेले उठा लेतीं। वह भी चुपके से कारसेवा में चली गई थीं। खूब पिटाई झेली, बंदूक के कुंदे से सिर में ऐसी चोट लगी कि छह महीने उठ नहीं पाई थीं।  
विज्ञापन


अयोध्या के 3 माई बाड़े में 40-45 महिलाएं रहती हैं। कोई बंगाल, मप्र तो कोई महाराष्ट्र, बिहार और यूपी के अलग-अलग जिलों से यहां आई हैं। कोई घर से परेशान है तो किसी को राघव श्री राम की भक्ति खींच लाई है। 

यहां की महिला संत कायदों की पक्की हैं। कभी मांगकर नहीं खातीं। आकाशवृत्ति परंपरा को मानती हैं, इसलिए जो यहां दे गया, उसी से काम चलता है। सुबह उठकर पूजन पाठ करती हैं। बिना भोग, खाना नहीं खातीं। और बाथरूम जाने के भी अलग कपड़े रखती हैं। बिल्कुल साधुओं वाले नियम। हां थोड़ा बहुत वक्त मिल गया, तो पंचायत जरूर कर लेती हैं।


माई बाड़ा की सबसे उम्रदराज संत रामसनेही - फोटो : अमर उजाला
16 साल की मांडवी इस माई बाड़ा की उत्तराधिकारी है। पांच दिन की थी जब रेशमा दासी उसे ले आई थीं। अब वह तो रहीं नहीं लेकिन बाकायदा वसीयत और ये बाड़ा उसके नाम कर गई हैं। दसवीं में पढ़ने वाली मांडवी अभी पूजा-पाठ-मठ उतना नहीं समझती। लेकिन मंदिर से मोह इतना कि किसी बूढ़ी संत को खरोंच तक आए तो दवा लेकर दौड़ पड़ती है। 

 

कृष्णादासी और कुसुम दासी - फोटो : अमर उजाला
कुसुम दासी ग्रेजुएट हैं। माई बाड़े के दूसरे नंबर वाले मंदिर की वो महाराज हैं। कहती हैं यहां हम सुरक्षित हैं। पुरुषों के मठ में हमें कौन महंत बनाएगा? यहां हम सब एक दूसरी की मां-बहन-बेटी-शिष्या और चेली हैं। वो दस दिन पहले ही रामलला के दर्शन कर आई हैं।

कृष्णादासी ने तो 22 तारीख के लिए 2 किलो हवन सामग्री मंगवाई है। महीने का खर्च बमुश्किल चलता है फिर भी उनको भरोसा है, राम किसी को भूखा नहीं सोने देते। इनके पास पुरुषों के वर्चस्व वाले मंदिर-मठों की तरह सम्पन्नता और वैभव नहीं है। दरवाजे पुराने हो चुके हैं, चौखट लड़खड़ाती सी है। खिड़कियां टूट चुकी हैं और उसपर लटके फटे-पुराने कंबल अयोध्या की तेज सर्दी से बचाने के जरा भी लायक नहीं। खैर...
 

अयोध्या की पहली महिला पीठाधिपति ममता। - फोटो : अमर उजाला
जानकी घाट पर एक दर्शन भवन है। इसका जिक्र अचानक इसलिए क्योंकि यहां कि महंत अयोध्या की पहली महिला पीठाधिपति हैं। महंत डॉ. ममता शास्त्री। यह स्थान सुल्तानपुर के सांसद रह चुके महंत विश्वनाथ दास शास्त्री ने बनवाया था। कहती हैं गुरुजी ने उन्हें धर्मपुत्री माना था। गुरुजी का शरीर पूरा हुआ तो उन्हें जो जलसमाधि दी, उसकी अंतिम क्रिया के सारे काम उत्तराधिकारी बतौर ममता ने ही पूरे किए।
 
विज्ञापन

ममता मनोविज्ञान में पीएचडी हैं। टॉपिक था, परीक्षा से पूर्व तनाव। सीबीएसई इंग्लिश मीडियम से पढ़ाई की है और एलएलबी, बीएड की डिग्री भी है। उम्र बमुश्किल 40 साल है। 2015 में मठ की पीठाधिपति बनीं तो रामानंद संप्रदाय की पहली महिता महंत थीं। वह गृहस्थ हैं। पति वकील हैं। एक बेटी है, नाम है वैदेही। उनके मठ में स्वामी रामानंद आचार्य की 700 साल पुरानी मूर्ति है। सुबह साढ़े तीन घंटे पूजन-हवन के साथ उनका दिन शुरू होता है।

राममंदिर आंदोलन के वक्त वो स्कूल में थीं। कहती हैं, शिला पूजन के लिए स्कूल में राम लिखी ईंटें आई थीं। सब रोज उसकी पूजा करते थे। वो एक ईंट घर लाने की जिद कर बैठी थीं। जब वो ईंटें वापस चली गईं तो रोज वो उस जगह को प्रणाम करने जाती थीं जहां वो ईंटें रखी गई थीं। उनका मठ राममंदिर आंदोलन की राजनीति का अखाड़ा था। अशोक सिंघल और कल्याण सिंह यहां बैठकें लेते थे।  

वह कहती हैं ठाकुर जी महिला पुरुष में भेद नहीं करते। वरना जब उन्हें इस मंदिर की गद्दी मिली तो उससे पहले उन्होंने भी सिर्फ साधु पुरुष ही देखे थे। लोग सिर्फ इस उत्सुकता से उनके मठ में दीक्षा-कंठी लेने और शिष्य बनने के लिए आते थे क्योंकि वो ‘महिला महाराज’ थीं।
 
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें