बतौर नृत्यांगना मैंने राम के चरित्र को कई बार जीया है। उनके सुख और दुख को गहरे तक महसूस किया है। इसमें वह प्रसंग मुझे सबसे प्रिय है, जब राम पिता की आज्ञा का पालन करने के लिए वन चले जाते हैं। राम इसी रूप में मेरे सबसे करीब हैं। पिता की आज्ञा का पालन कर राम ने पिता-पुत्र के संबंधों को नई ऊंचाई दी है। यह अपनी तरह का अनूठा आदर्श है। मेरे राम पारिवारिक मूल्यों को अक्षुण्ण रखने की परंपरा और अपने जीवन लक्ष्यों को पुरुषार्थ से साधने की कला का नाम है।
शत्रु का आदर करने का नाम है राम। शत्रु की भी विद्वता का स्वीकार है राम। कोई अनादर नहीं, जीत का अहंकार नहीं। जो कुछ सीखने लायक है, शत्रु से भी सीख लेने का नाम है राम। यह राम से ही संभव हो सकता है कि अपनी जिंदगी के सबसे अहम युद्ध के शुरुआती और सबसे महत्वपूर्ण विधान की जिम्मेदारी उसी को दे दें, जिनसे उनको युद्ध लड़ना है। रावण को भी आचार्य बना लेना है राम।
और कितना कहूं, राम का रामत्व अथाह है। वह लक्ष्मण के बहाने हम सबको भी शत्रु से सीखने की प्रेरणा देते हैं। इस सलाह के साथ कि ज्ञान विनम्र होकर ही पाया जा सकता है। मैंने कंबन से भी राम को समझा है। तभी राम की सुंदरता पर भी गुमान है मुझे। वह भी ऐसा, शरीर के जिस हिस्से पर नजर पड़े, अपलक उसे ही देखना हो। इसमेें पूर्णता में देखने का मोह कौन करे। जनकपुर ने किया भी नहीं। मेरे राम मन से भी सुंदर है, शरीर से भी। आचरण तो उनका सर्वोच्च है ही।
(गीता चंद्रन, भरतनाट्यम नृत्यांगना से बातचीत पर आधारित)