मेरे तट पर कारसेवकों के मृत शरीरों की अंत्येष्टि मुझे बहुत दुख दे रही थी। राजनीति का हाल देख मैं दंग थी। मुलायम सिंह यादव ‘मौलाना मुलायम’ कहे जा रहे थे। वे खुश थे क्योंकि यह शब्द उन्हें मुस्लिमों का मसीहा बना चुका था। उन्हें वोट का गणित सधता दिख रहा था। कारसेवकों पर गोलियों से पनपी नाराजगी भाजपा की संभावनाएं जगा रही थी। वीपी सिंह सरकार गिरी और चंद्रशेखर प्रधानमंत्री बने। तीन महीने में वे भी पूर्व हो गए और मुलायम को भी त्यागपत्र देना पड़ा।
आप जानना चाह रहे होंगे कि 30 अक्तूबर और 2 नवंबर 1990 के बाद अयोध्या में क्या हुआ। चहुंतरफा दबाव पर कारसेवक रिहा कर दिए गए। मंदिर समर्थकों को शांतिपूर्ण सत्याग्रह की अनुमति मिली। मुलायम सरकार ने ही सत्याग्रह करने वालों को अयोध्या से बस में बैठाकर प्रतीकात्मक गिरफ्तारी की और उनके गांव पहुंचाया। मृत कारसेवकों के अस्थिकलशों के साथ श्रद्धांजलि सभाएं हुईं। फिर 14 जनवरी 91 को उन्हें संगम में प्रवाहित कर राममंदिर निर्माण के लिए संघर्ष जारी रखने का एलान हुआ। इस दौरान बतौर प्रधानमंत्री चंद्रशेखर ने हिंदू-मुस्लिम पक्ष के प्रतिनिधियों की वार्ताएं कराकर समाधान निकालने की कोशिश की। सफलता नहीं मिली। इनकी एक अलग कहानी है।
- इधर श्रीराम जन्मभूमि न्यास और विहिप पर मंदिर बनवाने के लिए आंदोलन का दबाव बढ़ रहा था। विहिप ने 4 अप्रैल 1991 को दिल्ली के वोट क्लब पर सरकार को चेतावनी देते हुए रैली की। उसी दिन मुलायम सिंह यादव ने मुख्यमंत्री पद से त्यागपत्र दे दिया। चुनाव हुए। केंद्र में भाजपा मुख्य विपक्षी दल बन गई।
- कांग्रेस की वापसी हुई और पीएम बने पीवी नरसिम्हाराव। प्रदेश में कल्याण सिंह के नेतृत्व में भाजपा की सरकार बनी। शपथ के बाद कल्याण सिंह ने पूरे मंत्रिमंडल के साथ रामलला के दर्शन किए। संत और आम लोग इतने से कहां संतुष्ट होते। मंदिर के नाम पर बनी सरकार से वे मंदिर ही चाहते थे। उन्हें कानूनी पेचीदगियों व राजनीतिक बंदिशों से कोई मतलब नहीं था।
- भाजपा सरकार पर राममंदिर निर्माण का दबाव बढ़ने लगा। सरकार ने अक्तूबर 1991 में ‘श्रीराम जन्मभूमि न्यास’ को 42 एकड़ भूमि रामकथा कुंज बनाने के लिए पट्टे पर दे दी। तीर्थयात्रियों की सुविधा के लिए उसने खुद भी 2.77 एकड़ भूमि अधिग्रहीत की। संघ परिवार व भाजपा नेतृत्व की मंशा इस भूमि पर मंदिर बनाकर लोगों को संतुष्ट करने की थी।
- सरकार ने भूमि का समतलीकरण कराना शुरू ही किया कि हाईकोर्ट और सर्वोच्च न्यायालय में इसके विरुद्ध याचिकाएं दायर हो गईं। सर्वोच्च न्यायालय ने अपने यहां की याचिका को भी शीघ्र निस्तारण के निर्देश के साथ हाईकोर्ट भेज दिया जिसने भूमि अधिग्रहण को सही ठहराया, पर स्थायी निर्माण पर रोक लगा दी। जून 1992 तक इन याचिकाओं का निस्तारण नहीं होने पर न्यास ने दूसरी कारसेवा की घोषणा कर दी।
- जुलाई 1992 की 9 तारीख से श्रीराम जन्मभूमि न्यास ने 60 दिवसीय सर्वदेव अनुष्ठान शुरू किया, जहां सिंहद्वार का शिलान्यास हुआ था। कारसेवकों को बुलाकर वहां से भावी मंदिर की नींव की ढलाई शुरू कर दी गई। शिकायतों पर सुप्रीम कोर्ट ने हस्तक्षेप किया और कहा कि यूपी सरकार कारसेवा रोक दे तो वह अधिग्रहण संबंधी मुकदमों पर जल्द ही एकमुश्त निर्णय दे देगा। कल्याण सिंह ने सुप्रीम कोर्ट में बतौर मुख्यमंत्री विवादित ढांचे को कोई नुकसान न होने देने का शपथपत्र भी दिया।
तो शायद बच जाता ढांचा
प्रधानमंत्री राव और मुख्यमंत्री कल्याण सिंह के आग्रह पर विहिप और संतों ने कारसेवा रोक दी। जुलाई से अक्तूबर आ गया, लेकिन कोई निर्णय नहीं हो सका। विहिप पर संतों का दबाव बढ़ता जा रहा था। दिल्ली में 30 अक्तूबर 1992 को पांचवीं धर्मसंसद की बैठक में 6 दिसंबर 1992 को हर हाल में कारसेवा का फैसला किया। भूमि अधिग्रहण पर 4 नवंबर 1992 को सुनवाई पूरी करने के बाद भी हाईकोर्ट ने निर्णय नहीं सुनाया तो कल्याण सिंह सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से आग्रह किया कि वह हाईकोर्ट को निर्देश देकर 6 दिसंबर 1992 से पहले निर्णय दिलाए, लेकिन हाईकोर्ट ने निर्णय के लिए 11 दिसंबर की तारीख तय की।
- संघ और विहिप ने 6 दिसंबर को प्रतीकात्मक कारसेवा से मामला निपटाने की योजना बनाई, जिसमें कारसेवकों को मेरे जल में स्नान करके एक-एक मुट्ठी बालू ले जाकर अधिकृत भूमि पर डालना था। पर, बार-बार अयोध्या बुलाकर यूं ही वापस भेज दिए जा रहे लोग शायद अब इंतजार के मूड में नहीं थे।
- 6 दिसंबर को कारसेवकों की भीड़ अचानक गैंती-फावड़ों के साथ ढांचे पर चढ़ गई और उसे तोड़ना शुरू कर दिया। विहिप, भाजपा और संतों ने लाउडस्पीकरों से कारसेवकों को मनाने की अपील की तो जवाब में शोर हुआ, आप लोग डालो रेता, हम तो कारसेवा करके जाएंगे।
- अधिकारियों ने सीएम कल्याण से गोली चलाने की अनुमति मांगी, पर उन्होंने मना कर दिया। वह भी शायद अब नियति को स्वीकार कर चुके थे...और ढांचा ढह गया। केंद्र ने यूपी सहित मध्य प्रदेश, राजस्थान व हिमाचल प्रदेश की तत्कालीन भाजपा सरकारों को बर्खास्त कर दिया। हालांकि कल्याण ने बर्खास्तगी की घोषणा से पहले ही राज्यपाल को अपनी सरकार का त्यागपत्र सौंप दिया था।