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Ayodhya Ram Mandir: गुरु वशिष्ठ ने राम ही क्यों रखा दशरथ पुत्र का नाम?

Wed, 10 Jan 2024 10:59 PM IST
अमर शर्मा सुनीता शर्मा

सार

राम ऐसा नाम है जिसे प्रत्येक व्यक्ति जहां चाहे ले सकता है। ये प्रभु का एकमात्र ऐसा नाम है जो उल्टा उच्चारण करने पर भी फलदायी है। हिंसक दस्यु रत्नाकर ने मरा मरा बोल कर महर्षि बाल्मिकि की पदवी प्राप्त कर ली। राम नाम केवल एक शब्द मात्र नहीं है, यह अनंत वात्सल्यमय प्रभु का नाम है। अपनी मधुरता , सुगमता और सार्वजनिकता की दृष्टि से ये नाम अद्वितीय है।
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Ramlala - फोटो : Amar Ujala
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विस्तार
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- सुनीता शर्मा
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ब्रह्मऋषि वशिष्ठ के लिए श्री विष्णु देह अवतार का नामकरण करने की अद्भुत समस्या थी। शास्त्र कहते हैं गुण के अनुरूप नामकरण किया जाना चाहिए पर जो निर्गुण है उसके नाम का आधार क्या होना चाहिए यदि निर्गुण सगुण हो चुका हो तो समस्या और जटिल हो जाती है।

जिसमें अंनत गुण हों और प्रत्येक गुण पूर्ण हो, उसका नामकरण किसा गुण को आधार मान कर किया जाए? संसार में समस्त व्यवहार का आधार नाम ही है। भगवान विष्णु ने भक्तों की प्रार्थना पर निराकार से साकार रूप धारण किया।
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गुरु वशिष्ठ ने राजा दशरथ से कहा- महाराज यह श्याम शिशु आनंद का समुद्र है। समस्त सुख केंद्रभूत हो कर इसमें निवास करते हैं। यह अपने आनंद सिंधु के एक बिंदु से ही त्रैलोक्य को सुख का वितरण कर देता है। इस सुख के निवास स्वरूप बालक का नाम है- राम। यह नाम समस्त लोकों को विश्राम देने वाला है।

जो आनंद सिंधु सुखरासी।
सीकर तें त्रैलोक सुपासी।।
सो सुख धाम राम अस नामा।
अखिल लोक दायक विश्रामा।।

नारद मुनि ने भगवान राम से वरदान मांगा था कि प्रभु आपके अनेक अनुपम नाम हैं और श्रुतियों में सब एक से बढ़ कर एक बताए गए हैं। लेकिन राम नाम उन सब नामों में श्रेष्ठ हो भक्ति की पूर्णिमा में ये नाम चंद्रमा के समान सुशोभित हो और अन्य नाम तारागणों के समान रहें। भक्त के हृदय आकाश में तारों और चंद्रमा का यह अनुपम दृश्य शोभा पाता रहे ---

जद्धपि प्रभु के नाम अनेका।
श्रुति कह अधिक एक ते एका।।
राम सकल नामन्ह ते अधिका।
होउ नाथ अघ खग गन बधिका।।

भगवान राम ने अपने नाम राम की महिमा सबसे अधिक होने का वरदान नारद ऋषि को दे दिया था। राम नाम समस्त नामों में सरल और अक्षर मात्रा की दृष्टि से लघु प्रतीत होता है। भगवान विष्णु ने अनेक अवतार लिए प्रत्येक अवतार में उनका नाम अलग अलग है। सभी नाम को अपनी महिमा है सबसे संक्षिप्त नाम है- राम।

प्रणव अक्षर ऊं के अतिरिक्त कोई नाम इतना छोटा नहीं है। प्रणव को एकाक्षर ब्रह्म कहते हैं, किंतु ऊं का उच्चारण भी राम की तरह सरल नहीं है। अपनी सरलता और लघुता से निरंतर दूसरों को गौरव प्रदान करना प्रभु और उनके राम नाम की विशेषता है। ईश्वर का कोई भी नाम राम नाम के समान सरलता से उच्चारित नहीं हो सकता। अधिकांश अवतारों के नाम संयुक्त अक्षर या स्वर वर्ग के अक्षरों से निर्मित है। स्वयं भगवान राम के अनेक नामों में राम नाम सरल और सुलभ है। गोस्वामी तुलसी दास जी ने श्री रामचरित मानस में राम नाम को अधिक महत्व दिया है। तुलसीदास जी कहते हैं-

बंदऊं नाम राम रघुबर को।
हेतु कृसानु भानु हिमकर को।।
आखर मधुर मनोहर दोऊ।
बरन विलोचन जन जिय जोऊ।।

गोस्वामी तुलसीदास जी राम नाम को मधुर और मनोहर बताते हैं। रकार और मकार मधुरता का स्वयंसिद्ध प्रमाण है। र और म वर्णमाला के दो दिव्य नेत्र माने गए हैं। राम नाम अपनी समग्रता के कारण निर्गुण और सगुण दोनों का ही बोधक है। सगुण साकार परंपरा के भक्तों की ही भांति निर्गुण निराकारवादी संत परंपरा में भी राम नाम की महिमा है। गोस्वामी तुलसी दास राम नाम की वंदना करते हैं, तो निर्गुण संत कबीर भी राम नाम की महिमा का बखान करते हैं। भगवान कृष्ण के अनन्य उपासक मीराबाई, सूरदास भी राम नाम की महिमा के बिना श्याम की महिमा नहीं गाते-

सूरदास जी कहते हैं-

जो तू राम नाम चित धरतौ।
अबको जन्म आगिलौ तेरो दोऊ जन्म सुधरतो।।
जम को त्रास सभी मिट जातो भक्त नाम तेरो परतो।
कृष्ण दीवानी मीरा वैसे तो गिरधर के रंग में रंगी हैं, लेकिन वे भी गाती हैं –
पायो जी मैंने राम रतन धन पायो।
वस्तु अमोलक दी मेरे सतगुरु किरपा कर अपनायो।।

मीरा राम नाम को सभी पापों से छुटकारा दिलाने वाला मानती है तभी उन्होनें गाया-

मेरो मन रामहि राम रटै रे।
राम नाम जप लीजै प्राणी, कोटिक पाप कटे रे।।
राम नाम रस पीजै मनुआ राम नाम रस पीजै।
तज कुसंग सत्संग बैठ नित हरि चर्चा सुनि लीजै।।

राम ऐसा नाम है जिसे प्रत्येक व्यक्ति जहां चाहे ले सकता है। ये प्रभु का एकमात्र ऐसा नाम है जो उल्टा उच्चारण करने पर भी फलदायी है। हिंसक दस्यु रत्नाकर ने मरा मरा बोल कर महर्षि बाल्मिकि की पदवी प्राप्त कर ली। राम नाम केवल एक शब्द मात्र नहीं है, यह अनंत वात्सल्यमय प्रभु का नाम है। अपनी मधुरता , सुगमता और सार्वजनिकता की दृष्टि से ये नाम अद्वितीय है।

जैसा कि हम पहले भी बता चुके हैं गुरू वशिष्ठ ने राम नाम के लिए तीन विशेषणों का प्रयोग किया- आनंद , सुख और सुपास। आनंद निरपेक्षता का प्रतीक है, एक सहज रस स्थिति का परिचायक है। किंतु सुख सापेक्ष स्थिति का परिचायक है। सुख का विपरीत दुख है। जीवन में सुख-दुख आते-जाते रहते हैं। आनंद का संबंध अंतरहृदय से है और सुख भौतिक है, बाहरी वस्तुओं से प्राप्त होता है। आनंद सिंधु निर्गुण रूप का प्रतीक है और सुख सगुण साकार मायानाथ रूप का प्रतीक है। इससे भक्तों को अपार सुख की अनुभूति होती है।

सगुण साकार रूप में राम दशरथनंदन राम है। इस नाम के साथ उनके रूप और उनकी लीला की स्मृति आती है। निर्गुण निराकारवादी संतों का राम नाम आनंद स्वरूप है। भक्तों को राम नाम से सुख और आनंद दोनों मिलते हैं।

राजा दशरथ के नंदन के नामकरण के अवसर पर ही गुरू वशिष्ठ ने राम नाम की व्यापक महिमा के विषय में बता दिया था -

जो आनंद सिंधु सुखरासी।
सीकर तें त्रैलोक सुपासी।।
सो सुख धाम राम अस नामा।
अखिल लोक दायक विश्रामा।।

राम नाम आनंद का सिंधु, सुख की राशि, त्रैलोक्य सुपासी, सुख धाम और अखिल लोक दायक विश्रामा– इन पांच गुणों से युक्त है। इन नामों की सांसरिक व्याख्या भी की गई है-
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प्यास लगे तो आनंद सिंधु का जल पिएं, भूख लगे तो सुख राशि से तृप्त हों, वस्त्र आदि अन्य सुविधाओं की अपेक्षा हो तो त्रैलोक्य सुपासी से उसको मांग लें, निवास के लिए गृह की आवश्यकता हो तो सुख धाम में निवास करें, आनंद और सुख के वातावरण में विश्राम की उपलब्धि स्वाभाविक है। अंत में अखिल लोकदायक विश्रामा से नाम माहत्म्य का उपसंहार किया गया है।

संदर्भ- श्री रामचरितमानस और मानस चिंतक डॉ. राम किंकर
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