(लेखक आईआईएमसी, नई दिल्ली में हिंदी पत्रकारिता विभाग में प्रोफेसर हैं)
भारत के लोकमंगल का उत्सवी विहानः श्री सीताराम श्री सीताराम श्री सीताराम। सनातन धर्म, संस्कृति कालजयी है। श्री रामजन्म भूमि, अयोध्या के पुनरुद्धार की महान संघर्ष गाथा इसके कालजयी होने का सबसे नूतन प्रमाण है। भारत के लोकजीवन में, भारत के राजनैतिक आदर्श में, भारत के इतिहास और पुराण में, भारत की आध्यात्मिक विचारधारा में और इसके जन-मन में राम जिस गहराई से रचे-बसे हैं, यह स्वयं ही इस बात का प्रमाण है कि राम के बिना भारत के अस्तित्व की कल्पना भी नहीं की जा सकती। राम राष्ट्र हैं, राष्ट्र के प्राण भी हैं।
राम राज्य हैं और राज्य के आदर्श भी हैं। राम भारत के लोक हैं, उसकी मंगलकामना भी हैं, राम घट-घट व्यापी ईश्वर हैं तो राम अयोध्या में सशरीर प्रकट होने वाले रामलला भी हैं। राम ईश्वर भी हैं और माता की गोद में खेलते, मुस्कराते कौशल्यानंदन भी हैं। राम अविनाशी हैं तो अयोध्यावासी भी हैं। वह राजा हैं तो परात्पर ब्रह्म के इष्ट भी हैं। वह शिव-शक्ति के आध्यात्मिक आदर्श के मूर्तिमंत प्राकट्य हैं। विष्णु-लक्ष्मी के संकल्प स्वरूप होकर लोक के निर्भय हो जाने, उसके पालन-पोषण के हेतु होकर वह सीतापति हैं, सियाराम हैं, सीताराम हैं, श्रीराम हैं।
रामरक्षा स्रोत में शिव-पार्वती जी के संवाद में मंत्र आता है- राम रामेति रामेति रमे रामे मनोरमे, सहस्रनाम तत्तुल्यं रामनाम वरानने। शिव स्वयं एकमात्र राम नाम को ही मुक्ति का महामंत्र घोषित करते हैं। महर्षि वाल्मीकि से लेकर गोस्वामी तुलसीदास तक राम नाम ही महामंत्र के रूप में कोटि-कोटि व्याकुल जनों के जीवन में आस-विश्वास बनकर ज्योतित होता दिखाई देता है। ब्रह्मांड में आकाश और पृथ्वी के मंगलदायी महामिलन से व्युत्पन्न और उसके कारण चैतन्य ब्रह्म की सूक्ष्म सारस्वत धारा के संपर्क से निर्मित षोडशमातृका युक्त मानव मष्तिष्क के भीतर ज्ञान की हिलोर लेती लहरें नित्य उठती हैं। षोडश मातृका में निरंतर उठ रही इस निराकार शब्द संसार का एक अद्भुत वैज्ञानिक स्वरूप है, इसे भर्तृहरि कृत वाक्यपदीय नामक ग्रंथ और उसके सूत्रवत कठिन श्लोकों के गहन अध्ययन में समझा जा सकता है। अमेरिका और यूरोप के अनेक बड़े विश्वविद्यालयों के वैज्ञानिक तक वाक्यपदीयम् का अध्ययन कर रहे हैं। वैज्ञानिक मन में जो मौलिक प्रश्न उठते हैं कि पहले अक्षर या शब्द की व्युत्पत्ति मन में होती है या वाक्य की?
इसका उत्तर भर्तहरि की हजारों वर्ष पुरानी पोथी देती है। किंतु इसमें रहस्य वाली बात यह है, जिसे ऋषियों ने अनुभूति से जाना है कि मष्तिष्क के ब्रह्मालय में निराकार विद्युतीय हलचल और उस हलचल से अक्षर और उससे बनने वाले शब्द समेत उसके स्व का संज्ञान करा देने वाला महान शब्द अगर कोई है, तो वह केवल राम नाम ही है। निराकार अक्षर की हलचल शब्द में कैसे बदल जाती है, क्यों बदल जाती है, शब्द वाक्य का रूप क्यों लेता है, कैसे लेता है, चैतन्य से मिलने के बाद मिट्टी और पंचतत्वों से रचित शरीर के मष्तिष्क में विचार कहां से और क्यों जन्म लेते हैं, इन विचारों की अंतिम मंजिल कहां है, कहां जाकर ये अंतिम विश्रांति प्राप्त करते हैं, इन्हें सदा के लिए जागृत और निरंतर जागृत रखने वाला अक्षर-युग्म और शब्द का साकार नाम कौन सा है, जो निराकार अक्षर और शब्द को साकार में परिवर्तित करने वाले मनोमष्तिष्क और कंठ के साथ आकंठ जुड़ा है, निरंतर सांस-सांस में, ओत-प्रोत शरीर में शिव और शक्ति के एकत्व का आभास सदा जागृत रखने वाली उस परम परमात्म ध्वनि का साक्षात्कार सनातन काल से ऋषि-मुनि करते आ रहे हैं, उस निरंतर गूंजती महामंगलकारी ध्वनि को राम रूप में जाना और माना गया है, जो ओंकार रूपी शब्द ब्रह्म को निराकार रूप से साक्षात साकार लोक और विश्व रूप में परिवर्तित कर देती है, उसके पालन-पोषण का हेतु बनती है, उसके जीवन को सार्थकता देते हुए शरीर के जीर्ण हो जाने पर उसे आवागमन के चक्र से मुक्ति भी प्रदान करती है।
आधुनिक संसार अरबों डॉलर खर्च करे, कितनी ही प्रयोगशालाओं में कितने ही वर्ष प्रयोग करे, तब भी शायद उसे राम नाम की महिमा का पता न चल सके और जिस दिन पता चल जाएगा तो उसके सम्मुख चमत्कृत होने के सिवाय कोई रास्ता नहीं बचेगा कि इस अत्यंत छोटे से सरल अक्षर-युग्म राम को वे पहले क्यों नहीं जान सके! यही है वह गॉड पार्टिकल, जिसके प्रकाश में सब कुछ जाना जा सकता है। भारत में जाना जाता रहा है- कलयुग केवल नाम अधारा, सुमिर सुमिर नर उतरहिं पारा।
इक ओंकार सतनाम! यह चिरंतन सत्य है किंतु हमारे ऋषियों ने ही ध्यान के प्रयोग की गहन गुफा में जाकर देखा, तो पाया कि निर्गुण निराकार ओंकार जब साकार होने के यात्रा मार्ग पर बढ़ता है तो उसे ध्वनि और धुन रूपी राम मंत्र के माध्यम से साकार बनना ही पड़ता है। बनना ही पड़ेगा। ओम् के रोम-रोम में राम मंत्र गूंजने लगता है, ओंकार जब राम में बदलता है, तभी सृजन क्रिया मूर्त रूप लेती है, सृष्टि के सृजन और पोषण के लिए और कोई मार्ग ही नहीं है, सिवाय राम मार्ग के। आज जो लोग किन्हीं राजनैतिक कारणों से, विद्वेषवश होकर राम नाम को स्वयं से दूर कर रहे हैं, वे बहुत बड़ी अज्ञानता के शिकार हैं, मूढ़ता की पराकाष्ठा कर रहे हैं, क्योंकि जो ध्वनि निरंतर मन-कंठ- श्वास में रम रही है, उससे पीछा छुड़ा पाना उनके वश में है ही कहां? इसका विकल्प ही कहीं नहीं है, क्योंकि उसे नकार कर स्वयं से ही स्वयं को सदा के लिए जन्म-जन्म के मृत्युपाश में बांधना ही तो है, इसके विपरीत उसे पहचानकर, मानने और निरंतर सुमिरन कर अपने कर्म में जुटे रहने से मुक्ति का रास्ता अवश्य मिल सकता है।
वस्तुतः ऋषियों की अर्चना से प्राप्त हुआ ‘ऋषि-अर्च’ रूपी राम नाम का शोध-रस अथवा (RESE- ARCH, ऋषि-अर्च) ‘रिसर्च-रस’ भारत के महान ज्ञानी अनंत उपकारी उन ऋषियों, मुनियों और संतों की देन है जिन्होंने समस्त वर्ण-जाति-संप्रदाय के परे उस महानतम सत्य को जान लिया था, जिसके सुमिरन, स्मरण, जप और उच्चारण मात्र से जन्मों के बंद मष्तिष्क कपाट खुल जाने की संभावना पैदा हो जाती है। बाकी किसी भी अन्य शब्द में इतनी सरलता नहीं है, लालन-पालन-धारण करने और अंत में मुक्ति देने की ऐसी सहज शक्ति भी नहीं है। इसीलिए राम नाम को कलियुग के लिए हमारे ऋषियों ने-संतों ने मुक्ति का महामंत्र घोषित किया था। मनुष्य या जीव को जो परम गति कठिनतम योग और ध्यान के अभ्यास से प्राप्त हो सकती है। वही गति अति सरल राम नाम के सुमिरन से भी प्राप्त हो सकती है।