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Ayodhya Ram Mandir: महाकवियों के साहित्य में सीता-राम

Mon, 22 Jan 2024 07:06 PM IST
अमर शर्मा देवांशु झा ‘पद्मनाभ’

सार

निराला के राम इस भव के राम हैं। साधु-साधु साधक धीर धर्म धन-धन्य राम भी हैं, पुरुषोत्तम नवीन भी हैं। निराला ने राम की दृष्टि से सीता को देखा है। और सीता में सिर्फ राम ही राम को देखा है। निराला संपूर्ण रामायण नहीं लिखते। राम-रावण युद्ध के क्षणों का उद्वेग रचते हैं, जो कि विलक्षण हैं। वाल्मीकि और तुलसी रामकथा कहते हैं। वाल्मीकि के राम तुलसी के राम से भिन्न अवश्य हैं, परंतु मूलत: अपने गुणों में समान हैं। दोनों में राम और सीता एक दूसरे के पर्याय हैं।
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Ramlala - फोटो : Amar Ujala
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विस्तार
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- देवांशु झा ‘पद्मनाभ’
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यदि त्वं प्रस्थितो दुर्गं वनमद्यैव राघव
अग्रतस्ते गमिष्यामि मृद्गंती कृशकंटकान
(यदि आप वन जा रहे हैं राघव, तो मुझे भी अपने साथ ले चलें। मैं वन में आपके आगे चलती हुई कांटों को साफ करूंगी।)

निराला सरोज स्मृति में अपनी 19 वर्षीया बेटी की मृत्यु पर लिखते हैं-
तू गई स्वर्ग क्या यह विचार-
जब पिता करेंगे मार्ग पार
यह, अक्षम अति, तब मैं सक्षम
तारूंगी कर गह दुस्तर तम..
(अर्थात, तू मुझसे पहले स्वर्ग क्या यह सोचकर गई कि जब अक्षम पिता रास्ता पार करेंगे, तब तुम उस दुस्तर अंधकार को काटोगी...!)

ये दोनों अभिव्यक्तियां कितनी भावप्रवण हैं! यहां सीता एक रूपक हैं। भिन्न रूपों में भासती हैं। कोई पत्नी रूप में सीता को देखता है, कोई पुत्री रूप में कल्पना करता है। वाल्मीकि के राम सीता को वनगमन से रोकने का यथासंभव प्रयास करते हैं। अंत में हारकर उन्हें साथ ले जाने को तैयार हो जाते हैं। स्वर्णमृग को पकड़ने गए राम जब देर तक नहीं लौटते और मारीच रूपी माया अपने स्वरों से खेल करती है, तब सीता व्यग्र होकर  विवेकशून्य हो जाती हैं। लक्ष्मण को राघव की वीरता पर अपूर्व विश्वास है, वे जानते हैं कि राम लौटेंगे, किंतु राम की परिणीता यहां हार जाती हैं। यह देवी सीता का मन नहीं, बल्कि अपने प्रिय के प्रेम में डूबी किसी स्त्री का मन है। इसलिए वे कहती हैं-
गोदावरीं प्रवेक्ष्यामि हीना रामेण लक्ष्मण
आबंधिष्येथवा त्यक्ष्ये विषमे देहात्मन:
पिबामि वा विषं तीक्ष्णं प्रवेक्ष्यामि हुताशनम
न त्वहं राघवादन्यं कदापि पुरुषं स्पृशे
(अर्थात, गोदावरी में कूद जाऊंगी, गले में फांसी लगाकर मर जाऊंगी, किसी पर्वत से नीचे छलांग लगाऊंगी, तीव्र विषपान कर लूंगी अथवा प्रचंड अग्नि में भस्म हो जाऊंगी, किंतु राघव के अतिरिक्त किसी अन्य पुरुष को स्पर्श नहीं करूंगी।)
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रावण जब सीता को हर लेता है, तब वे अपने राममय मन के विश्वास और धनुर्भंग करने वाले पुरुषोत्तम के शौर्य को स्मरण कर कहती हैं-
अपहृत्य शचीं भार्यां शक्यमिंद्रस्य जीवितुम
नहि रामस्य भार्यां मामानीय स्वस्तिमान भवेत..
यह सीता का राम के प्रति कैसा प्रेम है! ..कैसा विश्वास!!  जो उनसे यह कहलवाता है कि मूर्ख रावण, इंद्र की पत्नी शची का अपहरण करने वाला एक बार बच भी सकता है, किंतु राम की भार्या को हरने वाला नहीं बच सकता। उसे ब्रह्मा भी नहीं बचा सकते..!

राम की शक्तिपूजा में निराला लिखते हैं-
फूटी स्मिति सीता ध्यान-लीन राम के अधर
फिर विश्वविजय भावना हृदय में आई भर
ऊहापोह में डूबे राम सीता के प्रेम में पगे हैं। इसलिए उत्ताल तरंगाघात में भी विश्वविजय की भावना से भर उठते हैं। यह सीता के लिए कुछ भी करने का भाव है। या यह-
लख शंकाकुल हो गए अतुल बल शेष शयन
खिंच गए दृगों में सीता के राममय नयन
यह उस क्षण में बैठे राम हैं, जो रावण से युद्ध जीतने की संभाव्यता पर गहन विचार कर रहे हैं और उन्हें लगता है कि महाशक्ति रावण की सहायता कर रही हैं। ऐसे क्षण में राम हताश हो जाते हैं। उनकी आंखों में सीता की वे आंखें हैं, जिनमें केवल राम ही राम हैं। सीता के राममय नयन! 

और राम  जब वाटिका में सीता को नहीं पाते तब-
अस्ति कच्चित्त्वयादृष्टा सा कदंबप्रिया प्रिया...
कदंब, मेरी सीता तुम्हारे पुष्पों से बहुत प्रेम करती थी। वह कहीं तुम्हारे आस-पास तो नहीं? पुन: राम को लगता है कि सीता परिहास कर कहीं छिप गई हैं, तो वे कहते हैं कि यह परिहास ठीक नहीं है, तुम सामने आ जाओ।
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लक्ष्मण से पूछते हैं। राम धीरोदात्त हैं तथापि धीर गंवा देते हैं। किंतु सीता की तरह लक्ष्मण को कोसते नहीं। केवल विलाप करते हुए पूछते हैं-
स्वर्गोपि हि तया हीन: शून्य एव मतो मम
तन्मामुत्सृज्य हि वने गच्छायोध्यापुरीं शुभाम
(अर्थात, सीता के बिना तो स्वर्ग भी सूना लगेगा। लक्ष्मण तुम मुझे यहीं छोड़कर अयोध्या लौट जाओ, मैं विदेहराज को क्या उत्तर दूंगा?)

मया विहीना विजने वने सा
रक्षोभिराहृत्य विकृष्यमाणा
नूनं विनादं कुररीव दीना
सा मुक्त मुक्तवत्यायतकांतनेत्रा
(अर्थात, मेरे बिना सीता को राक्षसों ने घसीटा होगा, उसे बहुत पीड़ा पहुंचाई होगी, तब वह बेचारी कुररी की तरह विलाप करती रही होगी।)

तुलसी तो और सूक्ष्म हो जाते हैं-
पूछत चले लता तरु पाती
सीता चितव स्याम मृदु गाता
परम प्रेम लोचन न अघाता
मैं पुनि समुझि दीखि मन माहीं।
पिय बियोग सम दुखु जग नाहीं
जय बिनु देह नदी बिनु बारी।
तैसिअ नाथ पुरुष बिनु नारी।

हनुमान को सामने पाकर सीता की मनोदशा देखिए-
बचनु न आव नयन भरे बारी।
अहह नाथ हौं निपट बिसारी।

या राम का संदेश-
कहेउ राम वियोग तव सीता।
मो कहुं सकल भएल बिपरीता।
नव तरु किसलय मनहुं कृसानू।
कालनिसा सम निसि ससि भानू।।

सीता कहती हैं-
अवगुन एक मोर मैं माना।
बिछुरत प्रान न कीन्ह पयाना।।
नाथ सो नयनन्हि को अपराधा।
निसरत प्रान करहिं हठिबाधा।।

निराला के राम पुरुषोत्तम तो हैं, किंतु उनके संशय मनुज जैसे हैं। इसलिए जानकी के प्रेम में डूबे राम बार-बार कांप उठते हैं-
स्थिर राघवेंद्र को हिला रहा फिर-फिर संशय
रह-रह उठता जग जीवन में रावण जय भय

या यह-
ऐसे क्षण अंधकार घन में जैसे विद्युत
जागी पृथ्वी तनया कुमारिका छवि अच्युत

या-
जानकी हाय उद्धार प्रिया का हो न सका
वह एक और मन रहा राम का जो न थका 

निराला के राम इस भव के राम हैं। साधु-साधु साधक धीर धर्म धन-धन्य राम भी हैं, पुरुषोत्तम नवीन भी हैं। निराला ने राम की दृष्टि से सीता को देखा है। और सीता में सिर्फ राम ही राम को देखा है। निराला संपूर्ण रामायण नहीं लिखते। राम-रावण युद्ध के क्षणों का उद्वेग रचते हैं, जो कि विलक्षण हैं। वाल्मीकि और तुलसी रामकथा कहते हैं। वाल्मीकि के राम तुलसी के राम से भिन्न अवश्य हैं, परंतु मूलत: अपने गुणों में समान हैं। दोनों में राम और सीता एक दूसरे के पर्याय हैं।
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