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Ayodhya Ram Mandir: वेद और लोक का समन्वय है गोस्वामी तुलसीदास की रामकथा

Mon, 22 Jan 2024 06:15 PM IST
अमर शर्मा प्रो. उमापति दीक्षित

सार

गोस्वामी तुलसीदास के साहित्य के गंभीर अध्ययन से पता चलता है कि वह अपने समय के सर्वाधिक क्रांतिकारी और प्रगतिशील लोकनायक थे। उन्होंने निर्गुनियां संतों के समान समग्र व्यवस्था पर सीधे चोट भले न की हो, वर्गाश्रम व्यवस्था को ध्वस्त करने का नारा भले ही बुलंद न किया हो अर्थात् उनकी भूमिका ध्वंसात्मक भले ही न रही हो, किंतु उन्होंने अपनी सर्जनात्मक प्रतिभा से समाज के सारे संबंधों को जोड़ा है, उत्तर दक्षिण की धुरी को एकता के सूत्र में बांधा है और ‘बहुजन हिताय’ की अपेक्षा ‘सर्वजनहिताय’ की कामना की है। संत निवृत्तिमार्गी थे और गोस्वामी जी निवृत्ति-प्रवृत्ति की अतिशयता से बचकर मध्यमार्ग पर चलने के पक्षधर।
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Ramlala - फोटो : Amar Ujala
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विस्तार
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- प्रो. उमापति दीक्षित
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शब्दकोषों में ‘लोक’ शब्द के अनके अर्थ मिलते हैं। लोक से तात्पर्य है- जनसामान्य। लोकसाहित्य, लोकभाषा, लोकगीत, लोककथा आदि प्रयोगों में ‘लोक’ विशेषण दूसरे अभिप्राय का द्योतक है। भारतीय साहित्य में लोक और वेद के द्वारा लोकरीति और वेदरीति अथवा लोक-वेद-विधि में भेद बताया गया है। महाभारत में लोक-वेद-विधि में विरोध को बताने वाले काव्यों का उल्लेख मिलता है- ‘‘वेदाच्च वैदिकाः शब्दोः सिद्धा लोकाच्च लौकिकाः।’’ इस दृष्टि से लोक का तात्पर्य है वेद से भिन्न अथवा जो वेद में नहीं है। तब वैदिक साहित्य के अतिरिक्त समस्त साहित्य चाहे वह वाल्मीकि का हो या कालिदास का, भारवि माघ भवभूति का हो या तुलसी सूर केशव का, सभी लौकिक कहलाएगा। किंतु आज जिस अर्थ में ‘लोक’ शब्द प्रयुक्त होता है, उस हिसाब से उपर्युक्त समस्त साहित्य लौकिक साहित्य नहीं कहलाएगा।

‘लोक’ शब्द अंग्रेजी के ‘फोक’ के पर्याय के रूप से आया है। अपने संकुचित अर्थ में लोक शब्द बहुत कुछ नागर संस्कृति या शिष्ट संस्कृति से अशिक्षित अथवा अर्द्धशिक्षित जनसमुदाय में प्रचलित मान्यताओं और विश्वासों का प्रतीक बन गया है। इस दृष्टि से लोक मनुष्य समाज का वह वर्ग है जो आभिजात्य संस्कार, शास्त्रीयता और पांडित्य की चेतना और अंहकार से शून्य है और जो एक परंपरा के प्रवाह में जीवित रहता है। ऐसे लोक की अभिव्यक्ति में जो तत्व मिलते हैं, वे लोकतत्व कहलाते हैं। सामान्य जन में उच्छ्वसित भावनाओं और विचारों तथा प्रचलित रीति-रिवाजों और संस्कारों का उद्घाटन लोकतत्व का केंद्र बिंदु है। जनमानस के सहज नैसर्गिक जीवन की अभिव्यक्ति ‘लोकतत्व’ की विशेषता है। अतः वह केवल ग्राम्यता या मूढ़ विश्वासों का प्रतीक न होकर, उन समस्त विधि-विधानों का द्योतक है जो शास्त्रसम्मत नहीं हैं। तुलसी साहित्य में वेद के साथ लोक शब्द का प्रयोग इस तथ्य का संकेत करता है कि गोस्वामी जी ने शास्त्रसम्मत नियमों और नीतियों के साथ लोकप्रचलित मान्यताओं और परंपराओं को भी महत्त्व दिया है। अर्थात् वह केवल अतीत से बंधे नहीं हैं, बल्कि वर्तमान के प्रति सचेत हैं।
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गोस्वामी जी के साहित्य के गंभीर अध्ययन से पता चलता है कि वह अपने समय के सर्वाधिक क्रांतिकारी और प्रगतिशील लोकनायक थे। उन्होंने निर्गुनियां संतों के समान समग्र व्यवस्था पर सीधे चोट भले न की हो, वर्गाश्रम व्यवस्था को ध्वस्त करने का नारा भले ही बुलंद न किया हो अर्थात् उनकी भूमिका ध्वंसात्मक भले ही न रही हो, किंतु उन्होंने अपनी सर्जनात्मक प्रतिभा से समाज के सारे संबंधों को जोड़ा है, उत्तर दक्षिण की धुरी को एकता के सूत्र में बांधा है और ‘बहुजन हिताय’ की अपेक्षा ‘सर्वजनहिताय’ की कामना की है। संत निवृत्तिमार्गी थे और गोस्वामी जी निवृत्ति-प्रवृत्ति की अतिशयता से बचकर मध्यमार्ग पर चलने के पक्षधर।

नाथसिद्धों और संतों ने जिस ढंग से समाज पर प्रहार किया था, वेदमार्ग को हेय बताया था, परिवार-व्यवस्था पर चोट की थी, उसका समाज पर प्रतिकूल प्रभाव भी पड़ा। प्रेम के उदात्त स्वरूप के विकास में बाधा पड़ी और ‘सब नर करहिं परस्पर प्रीती’ के स्थान पर कटुता और वैमनस्य की भावना बढ़ी। इसके विपरीत गोस्वामी जी ने उस प्रशस्त मार्ग को अपनाया जिसमें वेद और लोक का समन्वय था, जिसके द्वारा समाज के सारे संबंधों पिता-पुत्र, सेवक-स्वामी, पति-पत्नी, भाई-भाई को आदर्श रूप प्रदान किया गया। संतों ने संसार की नश्वरता पारिवारिक और सामाजिक संबंधों की क्षणभंगुरता दिखाकर लोकचित्त को भीरु और पलायनवादी बनाने का प्रयास किया। गोस्वामी जी ने कर्मक्षेत्र में निरंतर संघर्ष करते हुए, दुष्प्रवृत्तियों का दमन करते हुए परलोक के साथ इस लोक को भी समुन्नत बनाने का परामर्श दिया।

उन्होंने कहा-
घर कीन्हें घर जात है, घर राखे घर जाय।
तुलसी घर बन बीच ही, रहिय प्रेम पुर छाय।। (दोहावली)

गोस्वामी जी ने ‘कहब बेदमत लोकमत नृपनय निगम निचोरि’, ‘लोक बेदमत मंजुल कूला’, आदि के द्वारा जिस विराट समन्वयकारिणी भूमिका की उद्भावना की है, उसके मूल में उनकी लोक-कल्याण की भावना ही निहित थी। उनके काव्य में कथा और शिल्प, विधेय और विधान दोनों में शास्त्रीय परंपराओं और लोक धाराओं का अद्भुत सामंजस्य मिलता है। उनकी काव्य परंपरा और प्रगतिशीलता के सह अस्तित्व का अनुपम उदाहरण है। तुलसी काव्य की लोकप्रियता तथा आधुनिक परिप्रेक्ष्य में सार्थकता का मुख्य कारण है, वैदिक परंपराओं की स्वीकृति के साथ सामान्यजन में उच्छ्वसित भावनाओं का प्रकाशन, संतमत और लोकमत के समन्वय से ही उनका काव्य काल और स्थिति की सतत परिवर्तनशीलता में भी शिक्षित और अशिक्षित, ग्रामीण और नागर, बुध और अबुध जनों में समान रूप से समादृत है। वस्तुतः जब युगद्रष्टा कलाकार लोकमंगल की उदात्त भावना से परिचालित होकर सर्जना करता है तो उसकी कृति में शिष्ट संस्कृति के साथ लोकसंस्कृति के तत्व स्वयमेव सामहित हो जाते हैं। जहां एक ओर शिष्ट संस्कृति से आदर्श जीवनमूल्यों की स्थापना होती है, वहीं लोकसंस्कृति जीवन को गहराई से समझने परखने का आधार प्रदान करती है। 

गोस्वामी जी की रामकथा ठीक वही नहीं है जो परंपरागत है। रमेश कुंतल मेघ के शब्दों में उन्होंने रामकथा का मध्यकालीनीकरण किया हैं। मध्यकालीनीकरण का तात्पर्य ‘उन आदर्शों तथा धारणाओं की स्वीकृति से है जो पौराणिक चेतना से विकसित होने के बावजूद उनसे भी पृथक् तथा परवर्ती है और जो तत्कालीन समाज में परिव्याप्त हैं।’ इस मध्यकालीनीकरण के द्वारा गोस्वामी जी ने अतीत को वर्तमान से जोड़ा है, वेदशास्त्र अनुप्राणित शिष्ट संस्कृति को लोकमानस की सहज व स्वाभाविक पद्धति में स्थानांतरित किया है। उनका ‘रामचरितमानस’ लोकमत-प्रधान ग्रंथ है, जिसमें जनसमुदाय की प्रवृत्तियों, रीतिरिवाजों, उत्सवों, त्योहारों आदि का सम्यक् समावेश मिलता है। उन्होंने मुनिमानस के साथ जनमानस को संपृक्त किया है। मानस में सामाजिक जीवन की व्यापक दृष्टि अपनाई गई है। कथानायक राम केवल परब्रह्म के अवतार अथवा राजपुत्र नहीं हैं अपितु उनके प्रत्येक कर्म में लोकधर्म की छाप है। राम के जन्म, नामकरण, यज्ञोपवीत, राज्याभिषेक, विवाहादि संस्कार के वर्णन में लोकमान्य रीतियों का अनुसरण किया गया है। तुलसीकाव्य में वर्णित वास्तुकला, चित्रकला, शोभायात्रा, अस्त्र-शस्त्र आदि समसामयिक हैं। जानकीमंगल, पार्वतीमंगल, रामललानहछू आदि लोकरीति संपन्न काव्य हैं। 

मध्यकालीन धार्मिक आंदोलन की प्रमुख विशेषता है- वेदमत और लोकमत का समन्वय। आठवीं शताब्दी से प्रारंभ इस आंदोलन का न केवल धार्मिक अपितु सांस्कृतिक और सामाजिक महत्व है। भाषा और विचार दोनों दृष्टियों से संपूर्ण धार्मिक आंदोलन लोकाभिमुख हो रहा था। सामाजिक दृष्टि से यही न्याय और समता का आंदोलन है। यह वर्णाश्रम-व्यवस्था में पिसती, ऊंच.नीच की भेदभावना में कराहती तथाकथित अस्पृश्य समझी जाने वाली जाति का आंदोलन है जो वर्गवैषम्य के अन्यायपूर्ण जुए को उतार फेंकने के लिए व्याकुल हो रही थी। 

राजनैतिक और सामाजिक दृष्टि से यह युग अत्यंत कोलाहलपूर्ण और अशांत था। उत्तर भारत निरंतर आक्रमण का सामना कर रहा था। मुसलमान के रूप में जो नई जाति आई थी, वह पूर्ववर्ती आक्रमणकारियों से भिन्न थी। इसके पहले आने वाले शक, हूण, गुर्जर, मंगोल आदि सभी भारतीय वर्ण-व्यवस्था में हिल मिल गए थे। किंतु इस्लाम के रूप में एक ऐसी जाति का उदय हुआ था, जो किसी भी प्रकार यहां के मूल निवासियों से धार्मिक समझौता करने पर तैयार नहीं थी, अपितु उनके लिए बड़ी चुनौती बनी हुई थीं। यह चुनौती दो प्रकार के प्रभाव दिखा रही थी। 

उच्च वर्ण रक्षा की भावना से संकीर्णता और पाखंड से घिरता जा रहा था तथा मुसलमानों से सताए जाने के कारण अपने से कमजोर निम्नवर्ग के प्रति अधिक कठोर हो गया था। निम्नवर्ण के लोग मुसलमानों से सताए ही जाते थे, स्वधर्मियों के द्वारा भी हेय दृष्टि से देखे जाते थे। दूसरी ओर इस्लाम के रूप में उनके सामने एक ऐसा संप्रदाय था जो समता का संदेश दे रहा था। दक्षिण की स्थिति इससे कुछ भिन्न थी। वहां बाहरी आक्रमण का खतरा नहीं था। किंतु चिंतामुक्त सामंती व्यवस्था अपने पंजे अधिक मजबूत करती जा रही थी। ब्राह्मण और सामंत मिलकर अपनी प्रभुता और सामाजिक श्रेष्ठता को बनाए रखने में तत्पर थे। इसलिए अन्य जातियों पर उनका अत्याचार और शोषण बढ़ गया था। अन्य वर्गों को इन लोगों ने आर्थिक दृष्टि से पंगु और सामाजिक दृष्टि से हेय बना दिया था। इसलिए स्वाभाविक था कि पिछड़ी हुई और शोषित जातियों में इनके प्रति आक्रोश उभरता। अतः दक्षिण के धार्मिक आंदोलन के मूल में ही समता और न्याय का स्तर प्रमुख रूप से सुनाई पड़ता है, वैदिक मान्यताओं के प्रति अनादर का भाव मिलता है, शास्त्रीय ज्ञान के प्रति उपेक्षा का व्यवहार मिलता है और उच्च वर्ण की भेदमूलक नीति के प्रति आक्रोश दिखाई पड़ता है।
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वैसे इस समता मूलक नए आंदोलन के जनक शंकराचार्य और रामानुजाचार्य जैसे ब्राह्मण ही थे, किंतु इसके बढ़ावा देने वाले अधिकांश संत तथाकथित पिछड़े वर्ग से ही आए थे। दक्षिण में अनके संत निम्न वर्ण के थे। महाराष्ट्र के संतों में राका कुम्हार, सांकता माली, नरहरि सुनार, जोगा तेली, शामा चूड़ीवाला, बंका और चोखा महार और कान्होपात्रा वेश्या थी। कश्मीर की संत लल्ला मेहतर जाति की थी। हिंदी के निर्गुनियां संतों में अनेक पिछड़ी जाति के थे। सामाजिक और धार्मिक दृष्टि से उपेक्षित और हेय जातियों में उत्पन्न इन संतों में वैदिक परंपरा के प्रति न तो आस्था थी और न उसके अध्ययन के प्रति रुचि। इन संतों ने सामाजिक विसंगतियों पर प्रबल आघात किया है, धार्मिक रूढ़ियों को नकारा है और आर्थिक वैषम्य का विरोध किया है। अतः इन्हें सच्चे अर्थों में प्रगतिशील माना जाता है और आधुनिक संदर्भ में इनका काव्य अधिक सार्थक स्वीकारा जाता है। इस संदर्भ में कुछ विद्वान् तो यहां तक कह देते हैं कि इन संतों ने समाज को कम से कम चार सौ वर्ष आगे बढ़ाया है अर्थात् उनके विचार आधुनिक परिवेश में अधिक सार्थक और ग्राह्य हैं, जबकि तुलसीदास ने अपने प्रतिगामी विचारों से चार सौ वर्ष पीछे धकेला है, वे प्रतिगामी थे। वस्तुतः ऐसे विचारक संत शिरोमणि गोस्वामी तुलसीदासजी के साथ न्याय नहीं कर सके।
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