न जाने कितने ही युग-वर्ष, मास, कल्प बीत गए, कितनी ही कथाएं, कितने ही चरित्र हमारी चेतना से उठकर चुपचाप चले गए, लेकिन राम त्रेतायुग में जैसे थे, वैसे के वैसे ही ठहर गए। ऐसे ठहरे, कि साक्षात अभी-अभी भीगे नयनों से हम उन्हें वन जाते हुए देख आए हों। जैसे कि सारी की सारी साकेत नगरी ही शोकनिमग्न हुई पड़ी हो और हम उसके साक्षी हों।
रामकथा के अनेकानेक प्रसंगों में सबसे विह्वल करने वाला प्रसंग उनका वनगमन है। उस प्रसंग के साथ दशरथ का दाशरथिक दुख जुड़ा है, कौशल्या का हताश क्रंदन है! पूरी अयोध्यापुरी का आकुलकंठ है, जबकि समर्थ राम के पास इस शोक से बचने के सारे साधन थे। स्वयं दशरथ कह चुके थे-
अयोध्यायां त्वमेवाद्य भवराजा निगृह्य माम
मैं विवश हूं, तुम नहीं! मेरे प्रति विद्रोह कर अयोध्या के अधिपति बन जाओ राम! किंतु राम किसी और मिट्टी के ही बने थे। उन्होंने कह दिया कि आप हजार वर्षों तक अयोध्या के नृपति बने रहें, मुझे तो वन ही जाना है। इसमें राम का एक सूक्ष्म कटाक्ष भी है। जैसे पिता से कह रहे हों कि माता कैकेयी के हठ से आपका पुरुषार्थ और विवेक मारा ही गया, तो फिर मुझे भी क्यों अपनी कर्तव्यनिष्ठा से विमुख कर धर्मच्युत करना चाहते हैं! एक मोह ने आपको विवश किया... दूसरे मोह से मेरे पुरुषार्थ की मृत्यु होगी!
राम सीता और लक्ष्मण के साथ रथ पर आरूढ़ हुए। पीछे से माता-पिता रोते-बिलखते हुए आते दिखे-
अन्वीक्षमाणो रामस्तु विषण्णं भ्रांतचेतसम।
राजानं मातरं चैव ददर्शानुगतौ पथि।।
अर्थात, राम ने हृदय को वज्र बनाकर कहा, रथ को शीघ्रता से हांके! अपने माता-पिता को इस तरह से क्रंदन कर पीछे दौड़ते हुए देखना भला वे कैसे सहन कर पाते।
राम ओझल हो गए। किंतु उन्होंने केवल खुद को दिलासा दिया था। वे ओझल अपनी ही आंखों से हुए थे। अभी तो राम अयोध्या की आत्मा में धंसे हुए थे। एक विशाल जनसमूह धूल-धूसरित विकल प्राण उनके पीछे विक्षिप्त होकर बहा जा रहा था, जैसे अंधड़ में सूखी पत्तियां बहा करती हैं।
राम यानी विवेक! राम यानी परदु:खकातरता! राम यानी स्वयं को क्लांत कर दूसरों को विश्रांति देना! तमसा नदी के तट पर वे भोरवेला में जागे। लक्ष्मण और सीता से चुपचाप नदी पार करने को कहा। वे चाहते थे कि उनके पीछे-पीछे चली आई अयोध्या की जनता के जागने से पहले ही तमसा का तट त्याग दिया जाए। अन्यथा अयोध्या के जनसमूह को भी व्यर्थ ही वृक्षों के नीचे और घाटों पर सोने का दुख भोगना होगा-
अतो भूयोपि नेदानीमिक्ष्वाकुपुरवासिन:
स्वपेयुरनुरक्ता मा वृक्ष मूलेषु संश्रिता:
अर्थात, तमसा नदी के तट से वापस अयोध्या लौटे जनों को देखकर उनकी स्त्रियां धिक्कार उठीं। जैसे उनका निज विवेक ही नष्ट हो गया हो-
ते विषं पिबतालोड्य क्षीणपुण्या: सुदुखिता:
राघवं वानुगच्छध्वमश्रुति वापि गच्छत।
अर्थात, हमारे पुण्य नष्ट हो गए हैं। अब यहां रहना दुख को भोगना है। अब या तो हम विष पीकर अपने प्राण दे दें अथवा अयोध्या को त्याग कर वहां रहें, जहां कैकेयी की छाया भी न हो। यह दुख गोपियों की विरह वेदना से कहां छोटा है?
जो सुमंत्र अब तक राम के साथ थे, उन्हें राम बार-बार अयोध्या वापस लौटने को कह रहे थे। कितनी ही दुहाइयों के बाद सुमंत्र को लौटना पड़ा। वे जब साकेत पहुंचे, तो पूरी नगरी को दुखी देखा। आनंदविहीन अयोध्या नि:शब्द निविड़ अंधकार में डूबी हुई थी-
सा शून्यामिव निशब्दां दृष्टवा परमदुर्मना:
सुमंत्र को देखकर हजारों हजार लोग उनकी ओर दौड़ पड़े। राम कहां हैं, पूछने लगे। सुमंत्र का उत्तर सुनकर हा राम हा राम के आर्त्तनाद से आकाश कांपने लगा। दशरथ का दुख दहक उठा। वे कहने लगे कि अब राम तो लौटेंगे नहीं, मुझे ही वन ले चलो-
हा राम रामानुज हा हा वैदेही तपस्विनी..
राम का वनगमन सामूहिक विरह, विछोह की सबसे घनीभूत भावना है। वह इस तरह की सबसे प्राचीन घटना भी है। किसी एक मनुष्य के वनवास पर संसार कभी इतना विकल न हुआ। किसी एक मनुष्य को दंड दिए जाने से हजारों हजार हृदय इस तरह से विदीर्ण नहीं हुए। राम का वनगमन विरह और दुख के भाव पर लिखे हजारों पृष्ठों के शाश्वत साहित्य की प्रस्तावना भी है, प्रथम अध्याय भी और उपसंहार भी। उसे त्याग कर उस शाश्वत साहित्य का पारायण संभव नहीं है।
राम का वनगमन एकल और सामूहिक दुख का राग है। उसके केंद्र में मनुष्य की मनुष्यता है। उसकी कर्तव्यनिष्ठा, धर्मपरायणता और तितिक्षा है। इन सबसे ऊपर अपार करुणा है।