मुझे राम के ईश्वरीय-अवतारी रूप से ज्यादा प्रिय है उनका मर्यादा पुरुषोत्तम वाला रूप। उसमें भी सबसे ज्यादा लगाव उनके उदात्त स्वरूप से है, जो निराला की कविता 'राम की शक्तिपूजा' में कायदे से उभरा है। 'उदात्त' यानी गरिमा, विनम्रता, उदारता, गंभीरता और आत्मानुशासन से भरा व्यक्तित्व। ऐसा व्यक्तित्व जो तीव्रतम क्रोध में भी विनम्रता नहीं खोता है, हताशा के चरम पर जाकर भी आत्मविश्वास जुटा लेता है, डबडबाई आंखों के साथ भी वाक्-संतुलन बनाए रखता है। जिसे पता है कि उसकी हार-जीत सिर्फ उसकी न होकर पूरे समुदाय की है, जो लोक-मर्यादा में अपना अस्तित्व विलय कर देता है।
कृष्ण का ध्यान आते ही एक मित्र की छवि उभरती है, पर राम बड़े भाई बनकर कल्पनाओं में आते हैं। वे गलती होने पर डांटते हैं, समझाते हैं, सही राह दिखाते हैं। वे स्वयं भी नैतिक राहों की तलाश में आजीवन जुटे रहते हैं। इसीलिए उन्हें रावण जैसे शत्रु से भी सीखने में गुरेज नहीं है। न उन्हें कैकेयी जैसी विमाता से नफरत है और न ही भरत के पास सत्ता चले जाने का तनाव।
आधुनिक विमर्शों में राम के व्यक्तित्व पर कई सवाल उठाए गए हैं। सीता निर्वासन, अग्निपरीक्षा और शंबूक-वध प्रमुख आक्षेप हैं। ये दुविधाएं वाल्मीकि और भवभूति के दौर की हैं, तुलसीदास और निराला ने राम को इन प्रसंगों से मुक्त रखा है। मैं जिन राम के प्रति श्रद्धा रखता हूं, जिनके जैसा बनना चाहता हूँ, वे यही मर्यादा पुरुषोत्तम और उदात्त राम हैं।
राम के कई रूप हैं। आदिकवि वाल्मीकि, भवभूति, कबीरदास, रैदास और तुलसीदास के पास आकर वे कवि दृष्टि के अनुसार नवीन होते गए हैं। 20 वीं सदी में मैथिलीशरण गुप्त, निराला और नरेश मेहता ने उन्हें आधुनिक मानव-दृष्टि में ढाला है।