विभिन्न धर्मों की पूजा पद्धतियां अलग-अलग हैं। सनातन परंपरा वाले आस्थावान हिंदू मंदिरों में ही पूजा-पाठ करते हैं। यहां तक कि हर आस्थावान हिंदू के घरों में भी मंदिर की जगह निर्धारित होती है। घरों के मंदिरों में रोज सुबह-शाम पूजा करने की परंपरा आज भी पूरी तरह जीवंत है। इसी तरह बहुत से लोग नियमित तौर पर मोहल्लों में बने मंदिरों में पूजा-पाठ के लिए जाते हैं। कभी हम देश भर में बने प्रसिद्ध मंदिरों में पूजा-अर्चना करने के लिए सपरिवार सुदूर की यात्राएं भी करते हैं।
सिख समुदाय पूजा-पाठ गुरुद्वारों में करता है। मंदिर और गुरुद्वारों में अंतर यही है कि गुरुद्वारों में प्रतिमाओं को नहीं, गुरुग्रंथ को ही पूजा जाता है। मुस्लिम समुदाय मस्जिदों में नमाज अदा करता है। मुस्लिम समुदाय में प्रतिमाओं की अभ्यर्थना की परंपरा नहीं है, लिहाजा मस्जिदों में प्रतिमाएं नहीं होतीं। ईसाई समुदाय चर्चों में प्रार्थना करता है। वहां यीशु और उनकी माता इत्यादि की प्रतिमाएं होती हैं।
इसके अलावा दुनिया भर में विभिन्न समुदायों, जातियों, सभ्यताओं में ईश्वर के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने के लिए अलग अलग तरह के स्थान और निर्माण किए गए हैं। जहां तक मंदिर परंपरा का प्रश्न है, तो मंदिर शब्द का निर्माण हुआ है मंद धातु से। संस्कृत की मंद धातु की व्यापक अर्थवत्ता है। मूलतः मंद में जड़ता का भाव है। ईश्वर की महिमा के अनुरूप ही मंदिर भी महिमा वाला शब्द है। जड़ता का यही भाव मंद से बने मंदर में प्रमुखता से उभरा है। मंदार नाम से पर्वत को भी संबोधित किया गया है। यह अद्भुद अनुभव है कि पूरी तरह जागृत ईश्वरीय सत्ता के निवास के लिए बनाए जाने वाले मंदिर के मूल में जड़ता का भाव निहित है।
वैशेषिक दर्शन में महर्षि कणाद ने सूत्र रूप में इसका वर्णन लिखा। कणाद ऋषि थे और ये ‘उच्छवृत्ति’ थे और धान्य के कणों का संग्रह कर, उसी को खाकर तपस्या करते थे। इसीलिए इन्हें ‘कणाद’ या ‘कणभुक्त’ कहते थे। वहीं, यह भी माना गया कि कण अर्थात परमाणु तत्व का सूक्ष्म विचार करने के कारण उन्हें ‘कणाद’ कहते हैं। किसी का मत है कि दिन भर ये समाधि में रहते थे और रात्रि को कणों का संग्रह करते थे। उन्होंने कणों को मंदार पर्वत के समान स्थिर और उनमें ईश्वर के सभी गुणों की उपस्थिति का प्रतिपादन भी किया।
यह विचार आगे चलकर पाशुपत दर्शन का आधार भी बना। इस प्रकार के मंद से मंदार यानी पर्वत बनने के पीछे वही प्रणाली काम कर रही है, जिसने अचल शब्द में पर्वत की अर्थवत्ता स्थापित की। वैशेषिक दर्शन में ईश्वर को अपरिवर्तनीय बताते हुए जड़ या अचल भी बताया गया है। इस तरह मंदार यानी पर्वत के समान बने ईश्वर के आवास को कहा गया मंदर या मंदिर। इसका एक अन्य प्रत्यर्थ प्राचीनकाल से ही पर्वतों की उपत्यिकाओं में मनुष्य के आश्रय तलाशने से भी निकाला गया। शुरुआती दौर में मानव पहाड़ी कंदराओं में ही निवास करता था। वैदिक और पौराणिक मनीषा भी यही कहती रही है कि पर्वतों में ही देवी-देवताओं का वास रहता है। आज भी भारत के बहुत से प्रमुख मंदिर पहाड़ों अथवा पहाड़ियों पर ही स्थित हैं। आस्था में इतनी शक्ति होती है कि शारीरिक रूप से अपेक्षाकृत अशक्त सनातनी भी एक ही सांस में दुर्गम पहाड़ों पर चढ़ कर अपने इष्ट की आराधना करने पहुंच जाते हैं। जम्मू-कश्मीर में वैष्णोदेवी मंदिर समेत दुर्गम स्थानों पर स्थित कई मंदिरों के दर्शन के लिए आज हेलीकॉप्टर जैसी आधुनिक सुविधाओं की व्यवस्था कर दी गई है, लेकिन पहले ऐसा नहीं था।
मैदानी क्षेत्रों का विकास हुआ, तो बौद्ध युग में अपने दार्शनिकों के अस्थि और अन्य भौतिक अवशेषों को विशाल स्तूपों में संरक्षित करने की परंपरा प्रारंभ हुई। जैसे-जैसे आर्यावर्त का विकास हुआ, धीरे-धीरे देश भर में मंदिरों के निर्माण की परंपरा विकसित होने लगी। विभिन्न काल खंडों में स्थापत्य की अलग-अलग शैलियों में मंदिरों का निर्माण हुआ। प्राचीन काल के मंदिरों में कई पुरातन लिपियों में शिलापट्ट लगाए गए थे, जो आज भी उपलब्ध हैं। इनमें मंदिर बनवाने वालों का उल्लेख किया जाता था, साथ ही मंदिरों की विशिष्टताओं को भी उकेरा जाता था।
भारत में मंदिर यानी प्रासाद निर्माण के नियमों के वर्णन प्राचीन शिल्प शास्त्रों में मिलते हैं। अपराजितपृच्छा, वास्तुमंडन, विष्णुधर्मोत्तर पुराण और बृहत्संहिता के 53 से 60 अध्याय तक और 77, 79, 86 अध्यायों में मंदिर निर्माण की शैली की जानकारी दी गई है। अपराजितपृच्छा देवताओं के शिल्पी विश्वकर्मा और उनके पुत्र अपराजित के बीच वार्तालाप है। इसके रचियता भुवनदेवाचार्य हैं।
मंदिर निर्माण पर पहला लिखित ग्रंथ- समरांगण सूत्रधार 64 विद्याओं के ज्ञाता राजा भोज ने लिखा था। नौवीं-10वीं शताब्दी में लिखे गए ग्रंथ पर चित्तौड़ के राणा कुंभा के सूत्रधार यानी वास्तुकार ने 14वीं शताब्दी में टीका की। उन्होंने दो पुस्तकें लिखीं राजमंडन और राजवल्लभ। दसवीं सदी के लगभग भारत के विभिन्न भागों में जो शैलियां जिन-जिन शासकों द्वारा अपनाई गईं, वे उनके नामों से जानी गईं। वैसे मूलतः भारत में तीन प्रकार के शिल्पों का स्वरूप हमें पुरातत्व के संदर्भ में देखने को मिलता है। ये गांधार, मथुरा और अमरावती शैली कहलाती हैं।
मथुरा शैली बाद में नागर शैली के रूप में देखी गई, जो कि उत्तर भारत में ज्यादा प्रचलित हुई। नागर शैली में भी परमार और गुर्जर प्रतिहार शैलियां पाई जाती हैं और इन दोनों का मिश्रण भी पाया जाता है। मथुरा का कृष्णजन्म भूमि मंदिर, गुजरात का सोमनाथ मंदिर और उदयपुर का जगदीश मंदिर विशुद्ध नागर शैली में बने हैं। नागर शैली में भी पर्वतीय और मैदानी इलाकों का वास्तु थोड़ा अलग होता है। जैसे उत्तराखंड, हिमाचल और जम्मू-कश्मीर में मौसम और जलवायु के अनुसार मूल शैली में परिवर्तन कर दिए गए। जैसे कि चार धामों में पहला बद्रीनाथ मंदिर नागर शैली में पहाड़ी मौसम के अनुसार परिवर्तन कर बनाया गया है।
भगवान राम श्री विष्णु का अवतार हैं। विष्णु मंदिर पंचायतन शैली में बनते हैं। इसमें मुख्य देवता गृभ गृह में प्रतिष्ठित किए जाते हैं और चारों दिशाओं में भगवान शिव, देवी, गणपति और सूर्य के मंदिर बनाए जाते हैं। नागर शैली में मंदिर का आकार रथ के समान होता है। माना जाता है भगवान रथ पर सवार होकर मंदिर में आते हैं। मंदिर निर्माण में 10 दिशाओं को आधार बनाया जाता है। चार मुख्य दिशाएं और उनके बीच की चार दिशाएं। इसलिए मंदिरों में आठ दिग्पालों की स्थापना की जाती है। बाकी दो दिशाएं नीचे यानी धरती और ऊपर यानि आसमान।
अयोध्या में भव्य राम मंदिर ने नया इतिहास रच दिया है। राम मंदिर का अस्तित्व आने वाली कई सदियों तक रहेगा। अयोध्या का राम मंदिर पूरी दुनिया में भारतीय चेतना की अनंतिम मूर्त उपस्थिति का साक्ष्य बना रहेगा। राम मंदिर से राष्ट्र निर्माण और फिर सकारात्मक विश्व चेतना के निर्माण की राह आसान होगी।