साधु चरित सुभ चरित कपासू।
निरस बिसद गुनमय फल जासू।।
यानी, संतों का चरित्र कपास के चरित्र के समान शुभ है, जिसका फल नीरस, विशद और गुणमय होता है।
60 फीट ऊंची दीवारें। किसी चक्रवर्ती सम्राट के महल जैसी। लाल किले जैसे पत्थर से बनीं दीवारों के बीच पिलर और शिखर वाली दीवार से भी ऊंचा गेट। स्टील वाले दरवाजे और भीतर बड़ा सा आंगन। फिर चहारदीवारी से सटकर बने छोटे-छोटे कमरे और बीच में बड़ी सी इमारत। यह अयोध्या की बड़ी छावनी है।
यहां के महंत जगदीश दास महाराज 15 साल के थे, जब घर छोड़ा था। 14 साल वृंदावन में एक आश्रम में सेवा की और 28 साल की उम्र में उनके गुरु के निधन के बाद उन्हें यहां बुलाकर गद्दी पर बैठा दिया गया। वह कान्यकुब्ज ब्राह्मण परिवार से थे और छावनी का प्रमुख कान्यकुब्ज होना जरूरी है। महाराज कहते हैं अगर कोई और ब्राह्मण इस गद्दी पर बैठा भी, तो धड़ाम से गिर जाएगा, निभ नहीं पाएगा। वो खुद को बीस बिसवा बताते हुए सर्वश्रेष्ठ ब्राह्मण होने का दावा भी करते हैं।
अयोध्या की बाकी छावनी, मंदिर, मठों के गद्दीनशीन, महंत, महाराज और पुजारियों के साथ सिक्योरिटी और गार्ड चलते हैं। लेकिन अकेली यही छावनी है, जहां एक भी गार्ड नहीं।
बड़ी छावनी वाले महंत कहते हैं, हम बाहर घूमेंगे तो द्वेष होगा, किसी के बारे में अच्छा बुरा निकलेगा। फिर दुश्मनी होगी। गार्ड की जरूरत पड़ेगी। लेकिन यहां के महाराज तो पिछले 30 साल से छावनी के बाहर नहीं गए हैं। उन्हें लगता है बाकी अखाड़ों-छावनियों के झगड़े इसलिए हैं क्योंकि वहां भाई-भतीजों को उत्तराधिकारी बना दिया जाता है।
वह कहते हैं, उनके यहां एक परिवार, भाई-भतीजा तो दूर छावनी की गद्दी पर बैठे अब तक के 6 महाराज अलग-अलग 6 जिलों के हैं। हमारी छावनी में कभी झगड़े नहीं हुए और पुलिस-थाने की जरूरत नहीं पड़ी। हालांकि बड़ी छावनी के पास अयोध्या में सबसे ज्यादा जमीन है और उससे जुड़े कई केस अदालत में लंिबत हैं। यूं भी अयोध्या के कोर्ट में सबसे ज्यादा केस मंदिर-मठों के ही हैं। यहां मठ, महंत, मनी और मर्डर की लंबी कहानी है। पर इसी सबसे बचने के लिए महाराज जगदीश दास ने 13 साल के कौशलेंद्र को अपना उत्तराधिकारी घोषित कर दिया है। वह उसे छावनी चलाने के तौर-तरीके लिखा-पढ़ा और सिखा रहे हैं। वह न तो उनका भतीजा है, न ही रिश्तेदार। फिलहाल उसके हिस्से छावनी के हजार देवी देवताओं के विग्रह वाले हजारा मंदिर में और 400 साल पुराने सनातन भगवान की सेवा करने का काम है।
बड़ी छावनी बनने की कहानी भी कम अद्भुत नहीं। यहां के सबसे पहले महाराज रघुबर दास को अंग्रेजी फौज ने जबरदस्ती पकड़कर अपने यहां सैनिक बना लिया था। एक बार रामनवमी पर वह सरयू स्नान करने गए। वहां ध्यान लगाकर बैठे तो समय का पता नहीं चला। जब छावनी लौटे तो देखा उनके नाम पर तो कोई ड्यूटी कर रहा था। रजिस्टर में उनके हस्ताक्षर भी थे और जब वह सरयू तट पर बैठे थे, तब रघुबर दास बनकर कोई अंग्रेजी सेना के गोले दाग रहा था। वह समझ गए कि यह उनके प्रभु श्रीराम हैं। उसी दिन वह नौकरी छोड़कर यहां आ गए और संतों के लिए छावनी बना दी।
इस छावनी के नियम कायदे थोड़े ज्यादा कठिन हैं। रात दस बजे दरवाजा बंद हो जाता है। मोजे-जूते साथ रहते हैं, इसलिए ठंड में भी नंगे पैर जाना होता है। महंत खुद भी मोजे नहीं पहनते और बर्फ से ठंडे संगमरमर की जमीन पर खुले पैर चलते-फिरते हैं। सुशील शर्मा 27 साल से महाराज जी की सेवा कर रहे हैं। पहले सरकारी नौकरी करते थे। कहते हैं अयोध्या में इतनी गरीबी थी कि संतों का कोई ठिकाना नहीं था। अन्न को तरसते थे। इसलिए रघुबर दास जैसे संतों ने छावनी बनाई जहां संतों की सेवा ही धर्म है और पूजा भी।
अयोध्या में चार छावनी हैं। तपस्वी जी की छावनी, रघुनाथ दासजी की बड़ी छावनी, मणिराम दासजी की छोटी छावनी व नयाघाट पर तुलसीदास की छावनी। इनमें वर्षों पहले हजारों संत रहते थे। आजकल मणिराम की छावनी में सबसे ज्यादा 500 संत रहते हैं। बाकी तीनों में 100-200 संत। वैसे तो सारे देश में छावनी में सैनिक रहते हैं, लेकिन अयोध्या में यह संतों का ठिकाना है।