इंफोसिस फाउंडेशन की चेयरपर्सन और अंग्रेजी-कन्नड़ भाषाओं में अपने अनुभवों पर आधारित बुक राइटिंग के लिए पहचानी जाने वालीं लेखिका सुधा मूर्ति जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल के 16वें संस्करण के मौके पर मीडिया से बात कर रही थीं। मूर्ति ने कहा कि मेरा मानना है कि हमारे बच्चों को इलेक्ट्रॉनिक गैजेट्स का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए, क्योंकि यह उनकी आंखों को प्रभावित करता है। गैजेट्स का बड़ा असर यह होगा कि वो किताब पकड़ने जैसी साधारण चीजों का भी आनंद नहीं लेंगे और ये गैजेट्स आप लोगों को बहुत ज्यादा विचलित कर देंगे। इसलिए कम से कम 10 से 14 साल की उम्र तक उन्हें किताबों को पढ़ना चाहिए। मेरा मानना है कि 16 साल की उम्र के बाद फिर बच्चों पर ही छोड़ दें कि क्या वो अपनी पढ़ने की आदत को जारी रखना चाहते हैं।
ऑनलाइन क्लासेस से ध्यान देने का समय भी अब कम हो गया
72 साल की सुधा मूर्ति ने कहा कि आज के माहौल में बच्चों की परवरिश करना आसान नहीं है, खासकर कोविड पीरियड के बाद, जब स्कूलों ने उनके लिए ऑनलाइन क्लासेस अटेंड करना अनिवार्य कर दिया। लंबे समय तक यह उन बच्चों की आंखों को प्रभावित करेगा। बच्चों का ध्यान देने का समय भी अब कम हो गया है। जयपुर सिर्फ भारत या जयपुर की नहीं, दुनियाभर के बच्चों की बात है। क्योंकि यह हर जगह पर हो रहा है। हालांकि, उन्होंने यह भी कहा कि भले ही बच्चों के पढ़ने की आदतों में गिरावट आई है, फिर भी युवा पीढ़ी से काफी उम्मीदें हैं, क्योंकि उनकी नॉलेज इकट्ठा करने की आदत अभी भी बरकरार है।
युवा पीढ़ी 'पैसा और पावर' के बहकावे में न आए
सुधा मूर्ति ने कहा कि युवा पीढ़ी को 'पैसा और पावर' के बहकावे में नहीं आना चाहिए, बल्कि 'कड़ी मेहनत और ईमानदारी' पर फोकस करना चाहिए। अगर आप वास्तव में जीवन को समझते हैं, तो पैसा और पावर से आपको प्रभावित नहीं होना चाहिए। लेकिन इसके लिए एक मजबूत दिमाग की जरूरत है। पावर और पैसों के साथ मत बहो, छोटी चीजों का आनंद लो और कड़ी मेहनत, ईमानदारी से काम करो। इसका फल आपको तुरंत नहीं मिलेगा, लेकिन आगे चलकर आप कुछ अच्छा क्रिएट कर सकते हैं।
मुझे लिखने के बीच में व्यवधान पसंद नहीं
अपनी लेखन प्रक्रिया पर बात करते हुए उन्होंने स्वीकार किया कि जब वह लिखती हैं, तो लोग, फोन कॉल और खाना उनका ध्यान भटकाते हैं। सुधा ने बताया कि मैं सुबह 5 से 8 बजे तक लिखती हूँ। क्योंकि मुझे सुबह कोई फोन नहीं आता है। जब मैं लिख रही होती हूं, तो अकेली रहना चाहती हूं। मुझे लिखने के बीच में व्यवधान पसंद नहीं है, क्योंकि इससे सोचने-विचारने की प्रक्रिया प्रभावित होती है। इसलिए मैं कुछ नहीं खाती, उस समय लोगों से बात भी नहीं करती। क्योंकि विचार करके लिखना बहुत डीप प्रोसेस होता है। उस वक्त मुझे पानी या नारियल पानी पीना पसंद है, इससे ज्यादा कुछ नहीं।
लिखने की तुलना में सोचने में वक्त ज्यादा लगता है
'द गोपी डायरीज़' की लेखिका सुधा मूर्ति ने बताया कि एक किताब का पार्ट लिखने में मुझे करीब 15 दिन लग जाते हैं। रिसर्च करने और कैरेक्टर डवलपमेंट ( चरित्र विकास ) में तीन साल तक का वक्त लग सकता है। आम तौर पर मैं जो लिखना चाहती हूं, उसे 15-20 दिनों में लिख लेती हूं, क्योंकि मैं साल भर सोचती रहती हूं। जब मैं अपने कुत्ते गोपी के बारे में लिखती हूं, तो सिर्फ 3-4 घंटे लगते हैं, क्योंकि गोपी मेरे सामने बैठता है और मैं उसे समझ सकती हूँ। गोपी क्या सोचता है, मैं उसे देख सकती हूँ। कुल मिलाकर लिखने की तुलना में सोचने में वक्त ज्यादा लगता है। क्योंकि लेखन उन विचारों को फिजिकल रूप में ला रहा होता है।
प्रधानमंत्री की सास के तौर पर जानते हैं लोग
सुधामूर्ति ने अपने दामाद ऋषि सुनक के ब्रिटेन के प्रधानमंत्री बनने पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि मेरी जिन्दगी में इससे कोई खास असर नहीं पड़ा है। यह जरूर है कि अब लोग मुझे ब्रिटेन पीएम की सास के नाम से जानते हैं। उनका नजरिया भी बदलने लगा है, लेकिन मुझे इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है। मेरी ऋषि से केवल हाल-चाल पूछने तक ही बातचीत होती है।
मेरे लिए भारतीय होना गर्व की बात
सुधा मूर्ति ने कहा कि मेरे खुदके बच्चे भी विदेश में सेटल्ड हैं। कोई बच्चा अगर विदेश में जाकर पढ़ाई या नौकरी करता है, तो यह फैसला उसके परिवार या उसे ही लेना होता है। बच्चे जहां भी रहें, उन्हें इंडियन कल्चर की जानकारी होनी चाहिए। बच्चे विदेश में रहते हैं, तो कुछ मुश्किल होती है। लेकिन यह जीवन चक्र है। मेरे लिए भारतीय होना और भारत में रहना गर्व की बात है।