होली का डांडा रुपने के बाद उदयपुर के मंदिरों में फाग के गीत और चंग की थाप सुनाई देने लगी है। ठाकुर जी को भजन सुनाए जा रहे हैं तो वहीं गुलाल भी अर्पित किया जा रहा है।
माघ पूर्णिमा पर होलिका रोपण के साथ ही फल्गुन का आरम्भ हो चुका है। सर्दी अभी भी चमक रही है, लेकिन मंदिर में अबीर गुलाल उड़ने लगा है। माघ पूर्णिमा पर शहर के बड़ी होली और राजमहलों में होलिका रोपण हो चुका है। एक माह बाद पूर्णिमा को होलिका दहन होगा। बड़ी होली पर पूजा-अर्चना व अनुष्ठान के साथ होली रोपी गई। इसके बाद अब होली के शृंगार के लिए गोबर के जेवर बनाएं जाएंगे और कण्डे भी तैयार किए जाएंगे। फाल्गुन को सर्दी की विदाई मान अब खान-पान भी बदलने लगा है। भोजन में छाछ व दही का उपयोग बढ़ गया है।
बसंत पंचमी के साथ ही ठाकुरजी को फाग खिलाने की परम्परा है। इसके साथ ही वैष्णव और शैव मंदिरों में गुलाल और अबीर के झपाटे उड़ना शुरू हो जाते हैं। कई मंदिरों में भगवान को फागणिया धारण करवाया जाता है। राजभोग आरती से पहले गुलाल उड़ाई। मंदिर में बसंत पंचमी से चल रहे विरह के गीतों की गूंज माघ पूर्णिमा के साथ थम जाती है और फाग के गीत शुरू हो जाते हैं।