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Thar Mahotsav: दस साल बाद 'थार महोत्सव' से पर्यटन को मिलेंगी सांसे, स्थानीय कलाकारों ने कहा-महोत्सव उद्देश्य से भटक गया

Mon, 07 Mar 2022 06:14 PM IST
रोमा रागिनी न्यूज डेस्क, अमर उजाला, जयपुर

सार

 एक दशक बाद थार महोत्सव का आयोजन होने जा रहा है। महोत्सव का उद्देश्य स्थानीय कला और परंपरा को लोगों तक पहुंचाना है लेकिन महोत्सव से लोक कलाकार ही खुश नहीं हैं।
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दस साल पहले हुए थार महोत्सव की तस्वीर - फोटो : Amar Ujala Digital
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विस्तार
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बाड़मेर जिले की कला, संस्कृति एवं पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए आयोजित होने वाला थार महोत्सव 10 साल बाद होने जा रहा है। तीन दिवसीय यह आयोजन 28 से 30 मार्च तक आयोजित होगा। महोत्सव के कारण हजारों को रोजगार मिलता था। बीते दशक भर से यह संगीत से लबरेज शाम उदासीनता के स्याह अंधेरों में खो चुकी है। स्थानीय कलाकारों का कहना है कि उन्हें अपने ही घर में अनदेखा कर दिया जाता है। 

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पश्चिमी राजस्थान की लोक कला, संस्कृति, परंपरा, लोकगीत-संगीत, लोकजीवन , थार की जीवन शैली, इतिहास से दुनिया को रूबरू करने के उद्देश्य से वर्ष 1986 में जिला प्रशासन ने थार महोत्सव की शुरुआत की थी। उद्देश्य यही था कि विदेशी पर्यटक थार की संस्कृति से जुड़े। बाड़मेर का थार महोत्सव आसपास के जिलों में भी अपनी पहचान नहीं बना पाया है।
 

थार महोत्सव का पोस्टर - फोटो : Amar Ujala Digital
आज तक महोत्सव की निर्धारित तारीख तय नहीं
बता दें कि बाड़मेर प्रशासन आज तक महोत्सव की कोई निश्चित तारीख निर्धारित नहीं की है, जो भी जिले में नया कलेक्टर आया उसने अपनी मर्जी और सुविधा के अनुसार तारीखे तय की और यह सिलसिला आज भी चलता आ रहा हैं। जिससे महोत्सव का रंग हर बार फीका रह जाता है। आज तक के आयोजन में थार महोत्सव के आयोजन की कमेटी में ज्यादातर लोग वो हैं, जो थार की लोक कला और संस्कृति के बारे में भी कुछ नहीं जानते। प्रशासनिक अधिकारी अपना-अपना टाइम पास करने के उद्देश्य से कभी राजा हसन तो कभी कैलाश खेर को मोटी रकम देकर कार्यक्रम आयोजित करने के लिए बुलाते रहे हैं। 

बाड़मेर-जैसलमेर लोक गीत संगीत का खजाना है। यहां लोक गायकी और संगीत से जुड़े नायब हीरे जड़े हैं, जिन्होंने राजस्थान की लोक कला और संस्कृति को सातवें आसमान तक और सात समुन्दर पार तक पहुंचाया। यहां के लोक कलाकारों को अपने ही महोत्सवों में मौका नहीं मिलता। ऐसे में तीन दिन के आयोजन में लोक कला की बजाय बॉलीवुड का संगीत आयोजन की इतिश्री किया जाता है।

 

पूर्व थार श्री और श्रीमती - फोटो : Amar Ujala Digital
पड़ोसी जिले का मरू महोत्सव विश्व विख्यात
एक तरफ जैसलमेर का मरू महोत्सव है, जिसने कम समय में पूरे विश्व में अपनी अलग पहचान बना ली है। जिसका मूल कारण स्थानीय लोक कलाकार हैं, जिन्होंने अपने कला से मरू महोत्सव को नई ऊंचाइयां प्रदान की। वहीं दूसरी तरफ थार महोत्सव है, जो तीस साल में अपनी कोई पहचान नहीं बना पाया, जिसका जिम्मेदार प्रशासन की उदासीनता है। 
 
इधर, कुछ दिनों से  थार महोत्सव का आयोजन कवायद को शुरू किया गया है, मगर पूरे बाड़मेर शहर में इसकी कहीं कोई न चर्चा हैं और न इसके प्रति आकर्षण। हर बार शहर में मात्र चार बैनर लगाए जाते रहे हैं। प्रचार के लिए सबसे दुखद पहलू यह है कि इन बैनरों में राजस्थान और थार की लोक संस्कृति को स्थान देने की बजाय बॉलीवुड कलाकारों को प्रमुखता दी जाती है। थार महोत्सव के आयोजन का उद्देश्य ही खत्म होता जा रहा है। 

थार महोत्सव की फाइल फोटो - फोटो : Amar Ujala Digital
आय के नाम पर कुछ भी नहीं
बाड़मेर में आयोजित होने वाले थार महोत्सव में विदेशी और देशी पर्यटक न के बराबर शामिल होते हैं। प्रशासन को कार्यक्रम में पड़ोसी जिले जैसलमेर से विदेशी पर्यटकों को ले आने के लिए कैम्प करने पड़ते हैं। बाड़मेर जिला प्रशासन बाड़मेर में कार्यरत कंपनियों के सीएसआर फंड पर आश्रित है, जबकि पर्यटन विभाग से मिलने वाली राशि अपर्याप्त होती हैं। स्थानीय होटल संचालको को इसमें शामिल करने से थोड़ी बहुत आयोजन की सार्थकता साबित होती हैं ।

 

क्या कहते हैं लोक कलाकार
बाड़मेर के निवासी इंडियन आइडल फेम मोती खान इन दिनों मुंबई में एक रियलिटीशो की शूटिंग में व्यस्त हैं। दूरभाष पर बातचीत में मोती खान ने कहा कि 'बाड़मेर-जैसलमेर में लोक कला का समंदर है। जिससे निकलने वाली सुर सरिता ने मुंबई से लंदन तक सुर रसिको की प्यास बुझाई हैं। बदकिस्मती यह हैं कि बाड़मेर में जहां कला का बड़ा संगम होना चाहिए, उस तरफ कोई ध्यान नहीं दे रहा। मजबूरन कलाकारों को दूसरे क्षेत्रों की ओर जाकर अपना हुनर आजमाना पड़ता है। महोत्सव का एक दशक से बंद होना दुखद है। वहीं अंतरराष्ट्रीय लोककलाकार फकीरा खान कहते हैं कि 'थार महोत्सव नए और पुराने लोक कलाकारों के लिए संजीवनी से कम नहीं था लेकिन एक दशक से इसका बंद होना दुखद है।

कलाकारों को मलाल-'उद्देश्य से भटक गया हैं महोत्सव'
थार महोत्सव से जुडे़ लोक कलाकारों का कहना है कि पश्चिमी राजस्थान की ऐतिहासिक भव्यता, लोक संस्कृति, लोक गायकी, गीत-संगीत और थार की जीवन शैली को देश-दुनिया से रुबरु कराने के मकसद से शुरु हुआ महोत्सव अपने उद्देश्य से भटक गया है।

अंतरराष्ट्रीय लोक कलाकार फकीरा खान ने कहा कि थार महोत्सव की शुरूआत के साढ़े तीन दशक बाद भी बाड़मेर की सीमाएं नहीं लांघ पाया है। पड़ोसी जिले जैसलमेर के मरु महोत्सव की तर्ज पर शुरु किए गए इस महोत्सव का असली मकसद देशी-विदेशी पर्यटकों को बाड़मेर लाकर उन्हें थार की समृद्ध संस्कृति से रुबरु कराना था, लेकिन यह महोत्सव देशी-विदेशी पर्यटकों को थार से जोड़ने की बजाय स्थानीय प्रशासनिक अमले के मनोरंजन का साधन बनकर रह गया है। कलाकारों का कहना है कि दुनिया के दूसरे देशों में थार की लोक कला का जादू बिखेरने वाले लोक कलाकार अपने घर में दर्शक दीर्घा में बैठकर बाहर के कलाकारों की प्रस्तुतियां देख रहे हैं। अपने घर में अनदेखी हमें अच्छी नहीं लगती।

अपने घर में ही बेगाने हैं हम
लोक कलाकार फकीरा खान बताते हैं कि थार महोत्सव में हमारी स्थिति घर की जोगी जोगटा और आन गांव का सिद्ध जैसी हो गई है। बकौल फकीरा खान थार महोत्सव में प्रस्तुति के लिए बड़े सेलिब्रिटिज को बुलाया जाए, थार की धरती पर सबका स्वागत है, लेकिन अपने ही घर में हमें अपनी अनदेखी अच्छी नहीं लगती है। फकीरा के मुताबिक, सात समन्दर पार दुनिया के दूसरे देशों में लोग हमारी प्रस्तुतियों पर झूम उठते हैं और हमें वहां बड़ा मान-सम्मान मिलता है, लेकिन अपने ही घर में हम बेगाने हैं।
 
 
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विदेशी पर्यटकों के लालच में देशी पर्यटकों की उपेक्षा
चार बार मिस्टर थार रह चुके इंद्र प्रकाश पुरोहित के अनुसार बाड़मेर में थार महोत्सव में विदेशियो की संख्या नगण्य रहती है। जिसके कारण स्थानीय प्रशासन इस महत्वपूर्ण आयोजन को नजरअंदाज करता हैं। जबकि राजस्थान आने वाले देसी पर्यटकों का कोई मान नहीं हैं। अगर देश के पर्यटकों को आकर्षित करें तो भी यह आयोजन विश्वविख्यात हो सकता हैं। पुरोहित के अनुसार देशी कलाकार को बुलाना तो दूर की बात प्रशासन थार महोत्सव के मौके पर इस आयोजन के सबसे बडे़ खिताब थारश्री से नवाजे गए लोगों को भी याद नहीं करता है। ऐसे में अब यह सम्मान भी बेमाना लगता है। 
यहां हैं पर्यटन की संभावनाएं
बाड़मेर जिले में तिलवाड़ा पशु मेला, कनाना गैर मेला, महाबार के मखमली धोरे, नाकोड़ा का धार्मिक पर्यटन, मुनाबाव का बॉर्डर, किराडू के मंदिर, हैण्डीक्राफ्ट, बीसू के मंदिर, पचपदरा के नमक के पिरामिड, सिवाना का किला, हल्देश्वर की पहाडि़यां, गेर नृत्य, मांगणिहार गायकी और यहां की पशु समृद्धि के साथ ही मरू उद्यान भी पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र हो सकते हैं। यहां मोटर बाइकिंग का भी पूरा माहौल है। जैसलमेर आने वाले पर्यटकों को यहां के लिए आकर्षित किया जा सकता है।
 
सबकी मदद से होगा आयोजन-कलेक्टर
बाड़मेर जिला कलेक्टर लोकबन्धु के अनुसार 28 मार्च को तिलवाड़ा पशु मेले से इस महोत्सव का आगाज होगा। उनके अनुसार स्थानीय लोगों, निजी कंपनियों, बीएसएफ, आर्मी की मदद से यह आयोजन होगा।
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