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Kota Suicide Case: असफलता नहीं, अपमान के डर से कोटा में खुदकुशी कर रहे छात्र

Wed, 21 Dec 2022 05:44 AM IST
वीरेंद्र शर्मा न्यूज डेस्क, अमर उजाला, कोटा

सार

कोटा में प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे तीन छात्रों ने आत्महत्या की थी। जिसके बाद नई बहस छिड़ गई है। मनोवैज्ञानिक डॉ. हरीश शर्मा कहते हैं छात्रों को अक्सर पढ़ाई के बजाय भावनात्मक तनाव का सामना करना कठिन लगता है। 
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(सांकेतिक तस्वीर) - फोटो : सोशल मीडिया
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विस्तार
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इंजीनियरिंग और मेडिकल समेत देश के कुछ सबसे प्रतिष्ठित कॉलेजों में प्रवेश पाने के सपने के साथ लाखों छात्र हर साल राजस्थान के कोचिंग हब कोटा आते हैं, लेकिन विशेषज्ञों के अनुसार इनमें से कई व्यस्त दिनचर्या, साथियों के दबाव और उम्मीदों के बोझ में खुद को उलझा हुआ पाते हैं। किसी परीक्षा में असफल होने के डर से नहीं, बल्कि इसके परिणाम यानी असफलता के बाद अपमान और निरादर के डर से वे अपने जीवन को समाप्त करने के रास्ते पर चल पड़ते हैं।
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हाल ही में, यहां प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे तीन छात्रों की आत्महत्याओं ने छात्रों को चरम कदम उठाने के लिए मजबूर करने वाले कारकों पर एक नई बहस छेड़ दी है। शहर के जाने-माने मनोवैज्ञानिक डॉ. हरीश शर्मा कहते हैं, छात्रों को अक्सर पढ़ाई के बजाय भावनात्मक तनाव का सामना करना कठिन लगता है। पालन-पोषण की शैली 1970 के दशक जैसी ही है, जबकि बच्चे के पास आधुनिक दिमाग है और वह उसे जो कुछ भी करने के लिए कहा जाता है, उसे वैज्ञानिक आधार पर परखता है। कई बार माता-पिता बच्चे से कुछ ऐसा करवाते हैं जो नहीं करना चाहता। ऐसे में दूसरों के साथ-साथ खुद की अपेक्षाओं का बोझ उसे हतोत्साहित करता है। 

कोचिंग संस्थान नहीं हैं जिम्मेदार 
न्यू मेडिकल कॉलेज हॉस्पिटल के मनोरोग विभाग के प्रमुख डॉ. चंद्रशेखर सुशील कहते हैं, माता-पिता को अपने बच्चों को डॉक्टर और इंजीनियर बनाने के लिए दबाव डालने के बजाय चाहिए कि वे बच्चों का पहले अभिरुचि परीक्षा कराएं और फिर तय करें कि उनके लिए सबसे अच्छा क्या है। मुझे नहीं लगता है कि बच्चों की खुुदकुशी के पीछे कोचिंग संस्थानों की ज्यादा भूमिका है। हमें यह स्वीकार करना होगा कि जेईई और एनईईटी बहुत कठिन परीक्षाएं हैं और इसलिए शिक्षण और सीखने को भी समान स्तर का माना जाता है।
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