सार
Achleshwar Mahadev Mandir: आज श्रावण मास का दूसरा सोमवार है। श्रावण मास में हर कोई भगवान शिव की भक्ति में डूबा रहता है। हम आज सिरोही जिले के माउंटआबू के एक ऐसे अद्भुत शिव मंदिर की बात करने जा रहे हैं, जहां पर शिवलिंग नहीं, भगवान शिव के अंगूठे की पूजा अर्चना होती है। जहां सालभर भक्तों की भीड़भाड़ बनी रहती है।
देश में भगवान शिव के कई मंदिर है। इन मंदिरों में भगवान शिव की शिवलिंग के रूप में पूजा होती है। राजस्थान के सिरोही जिले में एक प्राचीन शिव मंदिर ऐसा भी है, जहां भगवान शिव के अंगूठे की पूजा होती है। जी हां, हम बात कर रहे हैं माउंट आबू के अचलगढ़ स्थित अचलेश्वर महादेव मंदिर की। इस मंदिर का इतिहास 5 हजार वर्ष पुराना बताया जाता है। माउंटआबू ऋषि वशिष्ठ की तपस्थली है। इस मंदिर के बारे में शिवपुराण व स्कंद पुराण के अर्बुद खंड में भी उल्लेख किया हुआ है। मंदिर में कई प्राचीन प्रतिमाएं है। मंदिर के प्रवेश द्वार पर दो हाथी की मूर्तियां बनी हुई है। अंदर मुख्य मंदिर के अलावा कई छोटे मंदिर बने हुए हैं। मुख्य मंदिर में एक शिलालेख लगा है जिसे प्राचीन भाषा में लिखा हुआ है।
कितना भी जल अर्पित करें कभी नही पता चला कि ये कहां जाता है
मंदिर के अंदर 108 छोटे शिवलिंग भी बने हुए हैं। आसपास कई प्राचीन प्रतिमाएं स्थापित है। गर्भ गृह में अर्बुद नाग की प्रतिमा के बीच में गहरी खाई बनी हुई है। इस खाई के अंदर भगवान शिव के अंगूठे की पूजा होती है। इस खाई में जितना भी जल अर्पित किया जाता है। ये खाई कभी भरती नहीं है। गर्भ गृह में महाराजा कुम्भा द्वारा स्थापित कालभैरव समेत देव प्रतिमाएं स्थापित है।
खाई में गाय के गिरने से अर्बुदांचल पर्वत को किया था स्थापित
मंदिर के पुजारी ने बताया कि मंदिर हजारों वर्ष पुराना है। इंद्रदेव ने यहां एक ब्रह्म खाई बना दी थी। वशिष्ठ आश्रम में नंदिनी गाय रहती थी। जो खाई में गिर जाती थी. ऋषि ने देवी सरस्वती का आह्वान कर गाय को बाहर निकाला। आज भी वशिष्ठ आश्रम में गाय के मुख से जलधारा बहती है। देवों ने ऋषि से कहा कि आपके आश्रम के बाहर गहरी खाई है, इसका कोई उपाय करों। तब यहां अर्बुदांचल पर्वत को यहां स्थापित किया गया।
अर्बुद नाग को लाकर ब्रह्म खाई पर स्थापित किया गया। बाद में भूकंप आने लगे, तो देवता ऋषि वशिष्ठ के पास गए। ऋषि ने समाधि ध्यान कर देखा कि महादेव के निवास नहीं करने से अर्बुद सांप के हिलने-डूलने की वजह से यहां भूकंप आ रहे थे। तब यहां भगवान शिव के अंगूठे को स्थापित किया गया। तब से अर्बुदांचल पर्वत यहां अचल हो गया। इसलिए इस मंदिर का नाम भी अचलेश्वर महादेव मंदिर हो गया।