राजस्थान के चुनावी इतिहास में इससे पहले समाजवादी पार्टी (सपा) को ऐसा आगाज नहीं मिला, जैसा इस चुनावी साल की शुरुआत में मिला है। यह आगाज इशारा कर रहा है कि यदि पदोन्नति में आरक्षण समाप्त करने के मुद्दे को सपा ने पकड़कर रखा, तो कांग्रेस, भाजपा के राजनीतिक समीकरण बिगड़ सकते हैं।
प्रदेश में राज्य कर्मचारियों की संख्या लगभग 6 लाख से ज्यादा है और उनमें से लगभग 5 लाख ऐसे हैं, जो सामान्य वर्ग से आते हैं। पदोन्नति में आरक्षण के मामले में राज्य सरकार की बेरुखी और भाजपा की चुप्पी से इस वर्ग की नाराजगी अब खुलकर सामने आ गई है। यह वर्ग सपा को एक मजबूत विकल्प के रूप में देखने लगा है।
200 विधानसभा सीट वाले राजस्थान में अगर सपा बीस प्रतिशत सीटें भी अपने कब्जे में ले लेती है, तो इस प्रदेश में अच्छी खासी हलचल मच सकती है और कोई बड़ी बात नहीं होगी कि सपा के समर्थन के बिना बड़े दल सरकार नहीं बना पाएं।
लोहा गरम है...
गोपालगढ़ और सूलवाल जैसे प्रकरणों में अल्पसंख्यकों का गुस्सा अभी ठंडा नहीं हुआ है। ऐसे में इस सारे असंतोष और विरोध को नया राजनीतिक मंच सपा के जरिए मिलने जा रहा है। हालांकि राजस्थान में कांग्रेस और भाजपा के बीच ही टक्कर होती है, लेकिन इस बार लोगों को आशा है कि यूपी में परचम फहरा चुकी समाजवादी पार्टी राजस्थान में खेल बना और बिगाड़ सकती है।
उम्मीद का आधार
सपा को उम्मीद है कि अगर प्रदेश की यादव बाहुल्य 12-13 सीटों पर मुस्लिम वोट बैंक के साथ पदोन्नति में आरक्षण के मुद्दे को सही ढंग से बढ़ाया गया, तो पार्टी के लिए अच्छी शुरुआत हो सकती है। यही कारण है कि पार्टी के रणनीतिकार राज्य कर्मचारियों पर डोरे डाल रहे हैं। भाजपा के वोट बैंक में सवर्णों की संख्या अधिक है। अगर सपा विधानसभा चुनाव में उतरती है तो सवर्णों का झुकाव उधर होने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।
इन इलाकों में सपा दिखा सकती है प्रभाव
उत्तर प्रदेश सीमा से सटे विधानसभा क्षेत्र- मुंडावर, बहरोड़, बानसूर, तिजारा, अलवर शहर, अलवर ग्रामीण, किशनगढ़बास, डीग कुम्हेर, कामां, कोटपूतली, विराटनगर, शाहपुरा, धौलपुर।