राजस्थान में चुनावी हार के बाद सत्तारूढ़ कांग्रेस की अंतर्कलह सतह पर आ गई है। राज्य के खाद्य मंत्री रमेश मीणा ने हार के कारणों का पता लगाने की मांग की है। उधर कृषि मंत्री लाल चंद कटारिया ने इस्तीफे की पेशकश कर दी है। पार्टी का एक वर्ग मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के पुत्र के चुनाव लड़ने पर सवाल उठा रहा है। राज्य में लोकसभा की सभी 25 सीटों पर कांग्रेस को हार का मुँह देखना पड़ा है।
खबरें ये भी हैं कि पार्टी कार्यसमिति में भी इस पर चर्चा हुई। इस पर गहलोत ने पत्रकारों से कहा, "मीडिया ने संदर्भ से हटा कर खबरें प्रकाशित की हैं। जब किसी बात का संदर्भ बदल दो तो उसका अर्थ भी अलग हो जाता है। ये पार्टी का आंतरिक मामला है।"
गहलोत ने कहा कि पार्टी प्रमुख राहुल गाँधी को कहने का पूरा अधिकार है कि किस नेता की कहाँ कमी रही और कहाँ निर्णय में चूक हुई। जब परिणामों की समीक्षा हो रही है तो स्वाभाविक है कि वो बताए कहाँ कमी रही है।
राज्य में लोकसभा चुनावों में पराजय के बाद मुख्यमंत्री गहलोत और उप-मुख्यमंत्री पायलट समेत अनेक नेता दिल्ली में डेरा डाले हुए हैं। इस बीच जयपुर से कांग्रेस प्रत्याशी रहीं ज्योति खंडेलवाल ने आरोप लगाया है कि कुछ नेताओं ने उन्हें हराने के लिए काम किया और इससे बीजेपी को मदद मिली।
खंडेलवाल ने इस बाबत पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व को शिकायत की है। खाद्य मंत्री मीणा ने बीबीसी से कहा, "सभी की बराबर की जिम्मेदारी है। अभी मैं कह दूँ कि किसी एक विशेष व्यक्ति ने काम नहीं किया तो यह ठीक नहीं होगा। 25 लोक सभा सीट और 200 विधानसभा सीटों पर सभी ने मिल कर काम किया है। मगर अब हमें ब्लॉक स्तर से लेकर विधानसभा, जिला, प्रदेश और सत्ता संगठन सभी स्तर पर विचार करना चाहिए कि कहां क्या कमी रही।
राजस्थान पिछले साल दिसंबर माह में संपन्न विधानसभा चुनावों में कांग्रेस ने 200 में से 99 सीटें जीतकर बीजेपी को सत्ता से बाहर का रास्ता दिखा दिया था। मगर पांच महीने बाद जब लोकसभा चुनाव हुए तो कांग्रेस को करारी हार का सामना करना पड़ा।
राज्य में सियासत पर नजर रखने वाले स्थानीय पत्रकार अवधेश अकोदिया कहते हैं, "कांग्रेस का प्रदर्शन 2014 के लोकसभा चुनावों से भी खराब रहा। पहले यह माना जा रहा था कि अगर चुनाव बेरोजगारी या किसानों के मुद्दों पर आधारित होगा तो बीजेपी और कांग्रेस में कुछ मुकाबला होगा मगर देखते-देखते चुनाव भावनात्मक मुद्दों पर चला गया।"
अकोदिया कहते हैं, "राष्ट्रवाद केंद्रीय मुद्दा बन गया और इसमें मोदी का चेहरा अहम हो गया। ऐसे में चुनाव का पूरा रंग ही बदल गया। विधानसभा चुनावों में अलग मुद्दे थे। मगर लोकसभा चुनावों में वे मुद्दे पीछे छूट गए और इसका बीजेपी को लाभ मिला।''
राजस्थान में कांग्रेस के नेता मंच और सभा जलसों में अपनी एकता की तस्वीर प्रस्तुत करते रहे। लेकिन हकीकत इससे उलट थी। पार्टी में गुट विभाजन साफ दिखाई देता था और इसका पार्टी के प्रदर्शन पर बुरा असर पड़ा।
स्थानीय पत्रकार राजीव जैन कहते हैं, "इन चुनावों में बीजेपी का प्रचार अभियान अधिक संगठित और नियोजित नजर आया। बीजेपी ने कांग्रेस के मुकाबले ज्यादा अच्छी रणनीति तैयार की और इसका उसे फायदा भी मिला।" जीत का श्रेय लेने के लिए तो बहुत दावेदार होते हैं। लेकिन हार तो यतीम होती है। इसीलिए राज्य की सत्तारूढ़ कांग्रेस पार्टी में पराजय के लिए सब एक दूसरे को जिम्मेदारी ठहरा रहे हैं।