उच्चतम न्यायालय के न्यायमूर्ति जेएस वर्मा ने साल 1992 में किहोतो होलाहान के फैसले में साफ तौर से यह कहा था कि अपवाद को छोड़कर कोई भी अदालत विधानसभा अध्यक्ष को इस मामले में तब तक कोई आदेश नहीं दे सकती, जब तक कि वह विधायकों की अयोग्यता को लेकर कोई निर्णय नहीं ले लेते। इस फैसले से यह साफ होता है कि अदालतों को इस तरह के मामलों में अपनी भूमिका सीमित रखनी चाहिए। वर्तमान मामले में दसवीं अनुसूची के अंतर्गत 2 (1) (अ) की वैधता को इस आधार पर चुनौती दी गई है कि यह संविधान के अनुच्छेद 19 (1) (अ) में दी गई अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का उल्लंघन है।
सोमवार को अदालत में होनी है सुनवाई
सोमवार को राजस्थान उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश इंद्रजीत मोहंती की खंडपीठ में इस मामले की सुनवाई होनी है। पायलट खेमे के अधिवक्ता साल्वे ने अदालत के सामने बहस पूरी कर ली है। अपनी दलीलों मे उन्होंने कहा कि कांग्रेस के बागी विधायकों ने न तो पार्टी के खिलाफ कोई बयान दिया है और न ही दल बदला है। उन्होंने संविधान के अनुच्छेद 19 (1) (अ) में प्रदत अभिव्यक्ति की आजादी के अधिकार की शक्तियों का उपयोग करके एक नेता के खिलाफ बयान दिया है। ऐसे में उन्हें कानून के खिलाफ नोटिस जारी किया गया है। उन्होंने इस नोटिस को संविधान के अनुच्छेद 19 (1) (अ) का उल्लंघन बताया है। ऐसे में यह देखना होगा कि अदालत से पायलट खेमे को राहत मिलती है या नहीं। सभी की नजरें अदालत के आदेश पर टिकी हुईं हैं।