राजस्थान के लोक कलाकारों का कावा ब्रास बैंड कॉमनवेल्थ यानी राष्ट्रमंडल खेलों के दौरान ग्लासगो में अपनी संगीत की धुनों से भारत का परचम लहराएगा। भारत का यह अकेला बैंड है जिसे स्कॉटिश आर्ट कांउसिल ने इन खेलों में प्रस्तुति के लिए दावत दी है।
यूं तो कावा बैंड के कलाकार दुनिया के बहुतेरे हिस्सों में अपनी कला का जलवा बिखेरते रहे हैं मगर वे राष्ट्रमंडल खेलों में अपने हुनर की नुमाइश को लेकर बहुत ख़ुश हैं क्योंकि वे इन खेलों में भारत का प्रतिनिधित्व करेंगे।
इस बैंड से जुड़े कलाकार कहते है, "ये बुलावा, संगीत की उस परंपरा को सम्मान और सलाम है जिसे फनकार सदियों से सहेजे हुए हैं।"
कावा बैंड के संस्थापक हमीद खान कावा इसे एक बड़ी उपलब्धि बताते हुए कहते हैं। उन्होंने कहा, ''ये एक ख़ूबसूरत ख़्वाब के हक़ीक़त में बदलने की तरह है। हमारी मेहनत कामयाब हुई। कलाकारों ने महीनों जीतोड़ मेहनत की है। हमने ख़ुद संगीत की धुनें कंपोज़ की हैं। हमें ख़ुशी होगी जब माटी के संगीत का माधुर्य खिलाड़ियों में खेल का जज्बा पैदा करेगा।''
पेरिस में प्रस्तुति
बैंड के कला निदेशक कावा ने एक लम्बा वक्त फ्रांस के पेरिस में संगीत की प्रस्तुति में गुजारा है। फिर उन्हें लगा कि लोक कला के लिए कुछ और किया जाना चाहिए, और फिर उन्होंने इस बैंड की बुनियाद रखी।
पिछले बीस साल में कावा बैंड के कलाकारों ने विश्व के अनेक प्रुमख उत्सवों, समारोहों और आयोजनों में अपने प्रदर्शन से हाज़िरी दर्ज करवाई है जिसमें पिछला फ़ीफ़ा विश्व कप भी शामिल है।
ये कलाकार जब राजस्थान की रंग बिरंगी पोशाक में मंच पर अवतरित होते हैं तो लोग अभिभूत हो जाते हैं। बैंड के एक कलाकार हसन कहते हैं कि जब भारत और राजस्थान की कला अपने पट खोलती है, लोग मंत्र मुग्ध हो जाते है।
स्कॉटलैंड के ग्लासगो में ये कलाकार एक दिन में तीन तीन बार अपने फन का मुजाहिरा करेंगे। इसमें राजस्थान का मशहूर कालबेलिया नृत्य भी शामिल है। इसके लिए बैंड की सदस्य छेनू सपेरा ने ख़ास तैयारी की है। छेनू कहती हैं, ''लोग जब भारत की कला की सराहना करते हैं तो दिल को सुकून मिलता है।''
अंग्रेज़ों का बैंड
ब्रास बैंड दुनिया को भारत की देन नहीं है। ये 1757 की बात है जब औपनिवेशिक भारत को अंग्रेज़ों ने ब्रास बैंड से रूबरू कराया। फिर ये ब्रास बैंड भारत के जनजीवन का हिस्सा बन गया।
अब ब्रास बैंड भारत से राजस्थान की झांकी लेकर उसी सरज़मीं पर जा रहा है लेकिन लोक कला के रंगो के साथ इस बैंड में तुरही, शहनाई और ढोल जैसे पारंपरिक साज है।
हमीद ख़ान कहते हैं, "ये हमारे लिए चिंता का सबब है कि अब इन वाद्यों का इस्तेमाल कम होने लगा है। हमारी कोशिश है कि इन वाद्य यंत्रों को सलामती और सहारा मिले। बाक़ी बैंड बॉलीवुड की धुनें बजाते है, हम अपनी धुनें ख़ुद कंपोज़ करते हैं।"
गली-कूचों से निकले इन कलाकारों ने जब अपने संगीत का सफ़र शुरू किया तो उनके पास साधन नहीं थे लेकिन ये इन कलाकारों की साधना थी जो उन्हें दुनिया के बड़े-बड़े मक़ाम और मंचों तक ले गई।