फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

राजस्थान हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: 11 साल पुराना बर्खास्तगी आदेश रद्द; सूचना सहायकों को मिलेगी राहत

Tue, 13 Oct 2026 09:20 PM IST
तरुणेंद्र कुमार चतुर्वेदी न्यूज डेस्क, अमर उजाला, जयपुर

सार

राजस्थान हाईकोर्ट ने मेघालय के महात्मा गांधी विश्वविद्यालय से पीजीडीसीए करने वाले सूचना सहायकों को सेवा से हटाने के 11 साल पुराने सरकारी आदेश को रद्द कर दिया है। न्यायमूर्ति गणेशराम मीणा ने राज्य सरकार को याचिकाकर्ताओं को मूल नियुक्ति तिथि से नियमित सेवा में मानते हुए सभी वेतन, भत्ते और अन्य लाभ देने का निर्देश दिया।
विज्ञापन
राजस्थान हाईकोर्ट, जयपुर - फोटो : सोशल मीडिया
विज्ञापन

विस्तार
वॉट्सऐप चैनल फॉलो करें

राजस्थान उच्च न्यायालय ने मेघालय के महात्मा गांधी विश्वविद्यालय से कंप्यूटर अनुप्रयोग में स्नातकोत्तर डिप्लोमा (पीजीडीसीए) करने वाले सूचना सहायकों को सेवा से पृथक करने संबंधी 11 वर्ष पुराने सरकारी आदेश को रद्द कर दिया है। अदालत के इस निर्णय से लंबे समय से संघर्ष कर रहे कर्मचारियों को बड़ी राहत मिली है।
विज्ञापन


न्यायमूर्ति गणेशराम मीणा ने राजाराम मीणा और पांच अन्य अभ्यर्थियों की याचिका को स्वीकार करते हुए यह फैसला सुनाया। अदालत ने राज्य सरकार को निर्देश दिया कि याचिकाकर्ताओं को उनकी मूल नियुक्ति तिथि से ही नियमित सेवा में माना जाए। इसके साथ ही उन्हें समस्त देय वेतन, भत्ते और सेवा संबंधी अन्य लाभ प्रदान किए जाएं। उच्च न्यायालय ने सरकार को 100 दिनों के भीतर इन कर्मचारियों को सभी वित्तीय व सेवा लाभ सौंपने के आदेश दिए हैं।

सुनवाई के दौरान उच्च न्यायालय ने कहा कि कई वर्षों तक सफलता और निष्ठापूर्वक सेवा दे चुके कर्मचारियों को अचानक नौकरी से बाहर करना उनके जीवन को तबाह करने जैसा है। अदालत ने टिप्पणी की कि लंबी सेवा के कारण ये कर्मचारी अब अन्य सरकारी भर्तियों के लिए निर्धारित अधिकतम आयु सीमा पार कर चुके हैं। पीठ ने स्पष्ट किया कि अभ्यर्थियों का चयन और नियुक्ति उनके शैक्षणिक दस्तावेज का अधिकारियों द्वारा पूरा सत्यापन करने के उपरांत ही की गई थी।
विज्ञापन


प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन
अदालत ने कहा कि सरकार ने कर्मचारियों की नियुक्ति निरस्त करने से पहले उन्हें अपनी जांच रिपोर्ट की प्रति तक नहीं दी। किसी जांच रिपोर्ट को सौंपे बिना और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के विपरीत जाकर अचानक नियुक्तियां रद्द करना पूरी तरह अवैध, मनमाना और अनुचित था। याचियों के अधिवक्ता विभूतिभूषण शर्मा ने अदालत को बताया कि याचिकाकर्ताओं ने मेघालय के महात्मा गांधी विश्वविद्यालय से दूरस्थ शिक्षा के माध्यम से पीजीडीसीए डिप्लोमा किया था। इसी आधार पर उन्होंने वर्ष 2013 में निकली भर्ती में आवेदन किया था।

अधिवक्ता ने तर्क दिया कि आवेदन के समय महात्मा गांधी विश्वविद्यालय दूरस्थ शिक्षा परिषद (डीईसी) और यूजीसी से मान्यता प्राप्त था। कोटा या अन्य केंद्रों पर केवल फॉर्म जमा करने या फीस देने मात्र से किसी अवैध अध्ययन केंद्र से कोर्स करना नहीं कहा जा सकता, क्योंकि परीक्षा और अध्ययन सामग्री विश्वविद्यालय ही देता था। इसके अलावा, सरकार ने जिस आंतरिक जांच रिपोर्ट के आधार पर नियुक्तियां रद्द कीं, उसकी प्रति अभ्यर्थियों को नहीं दी गई, जो प्राकृतिक न्याय का उल्लंघन था।

विश्वविद्यालय की मान्यता पर सरकारी तर्क
उधर, राज्य सरकार का कहना था कि नियुक्तियों के बाद यूजीसी ने पंचायती राज विभाग को लिखा था कि राज्य अधिनियम से बनी यूनिवर्सिटी केवल अपने राज्य की सीमा में नियमित पढ़ने वाले छात्रों को ही डिग्री या डिप्लोमा दे सकती हैं। राजस्थान पंचायती राज विभाग की आंतरिक जांच में महात्मा गांधी यूनिवर्सिटी सहित कुछ अन्य संस्थानों की दूरस्थ शिक्षा की डिग्रियों को संदिग्ध पाया गया था।

ये भी पढ़ें- अंधे कत्ल का पर्दाफाश: बांसवाड़ा से लापता छात्रा को रतलाम में गला दबाकर मारा, आरोपी प्रेमी यूपी से गिरफ्तार
विज्ञापन


नोटिस और अंतिम अदालती फैसला
पुनर्विचार के दौरान सरकार ने ऐसी यूनिवर्सिटी से प्राप्त डिप्लोमा को सरकारी नौकरी के लिए अवैध माना। इसके बाद 26 नवंबर 2014 को याचिकाकर्ताओं को नोटिस देकर दस्तावेज मांगे गए। अभ्यर्थियों ने इस नोटिस को उच्च न्यायालय में चुनौती दी। अदालत ने 12 जनवरी 2015 के अंतरिम आदेश से अभ्यर्थियों के खिलाफ किसी विपरीत कार्रवाई पर रोक लगा दी थी। अब उच्च न्यायालय ने 11 साल पुराने निरस्तीकरण आदेश को पूरी तरह रद्द करते हुए याचिकाकर्ताओं के हक में अंतिम फैसला दिया है।
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें