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Rajasthan: चार साल बाद भी अधूरा विस्थापन, बाघों के साये में जी रहे 3,000 ग्रामीण; कौन सुनेगा इनकी पीड़ा?

Mon, 27 Jul 2026 06:00 PM IST
शबाहत हुसैन न्यूज डेस्क, अमर उजाला, बूंदी

सार

राजस्थान के रामगढ़ विषधारी टाइगर रिजर्व में चार साल बाद भी आठ गांवों के करीब 3,000 ग्रामीण पुनर्वास का इंतजार कर रहे हैं। बाघों की बढ़ती आवाजाही से खतरा बढ़ा है, जबकि स्टाफ और बजट की कमी से विस्थापन प्रक्रिया धीमी बनी हुई है।
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सांकेतिक - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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राजस्थान के बूंदी स्थित रामगढ़ विषधारी टाइगर रिजर्व (आरवीटीआर) को अधिसूचित हुए करीब चार वर्ष बीत चुके हैं, लेकिन इसके कोर क्षेत्र में बसे आठ गांवों के लगभग 3,000 निवासी अब भी विस्थापन का इंतजार कर रहे हैं। इस दौरान ग्रामीणों को वन्यजीवों, विशेषकर बाघों के हमलों के खतरे के बीच जीवन बिताना पड़ रहा है।

क्या है मामला?

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दरअसल, रामगढ़ विषधारी को मई 2022 में देश का 52वां और राजस्थान का चौथा टाइगर रिजर्व घोषित किया गया था। इसके बाद वन विभाग ने 481.90 वर्ग किलोमीटर से अधिक के कोर क्षेत्र में स्थित गांवों के स्वैच्छिक पुनर्वास की प्रक्रिया शुरू की थी। रिजर्व का कुल क्षेत्रफल 1,501.89 वर्ग किलोमीटर है, जिसमें कोर और बफर दोनों क्षेत्र शामिल हैं। पुनर्वास के पहले चरण में बफर क्षेत्र के तीन गांव गुलखेड़ी, भेरूपुरा आंतरी और भीमगंज को स्थानांतरित करने के लिए अधिसूचित किया गया। रिजर्व अधिकारियों के अनुसार, गुलखेड़ी गांव के लगभग 70 प्रतिशत परिवार अपने घर खाली कर चुके हैं और 88 मकानों को ध्वस्त किया जा चुका है।

गांव के 215 चिन्हित परिवारों में से 213 ने मुआवजा पैकेज का विकल्प चुन लिया है और विस्थापन की प्रक्रिया शुरू कर दी है, जबकि दो परिवारों ने अभी तक अपना विकल्प तय नहीं किया है। भेरूपुरा में 264 परिवारों में से लगभग 150 परिवारों को तीन लाख रुपये की पहली किस्त मिल चुकी है। हालांकि दूसरी किस्त का भुगतान राज्य बजट से राशि मिलने के बाद ही हो सकेगा। वहीं भारा धुंधला गांव में करीब 60 परिवारों के दस्तावेजों का सत्यापन चल रहा है। इसके साथ ही केशवपुरा, भीमगंज, हरिपुरा और जावोरा की झोपड़ियां गांवों का पुनर्वास अगले चरणों में किया जाएगा।

तीन प्रकार के मुआवजा पैकेज निर्धारित किए गए

  • कैश पैकेज: प्रत्येक पात्र परिवार को 15 लाख रुपये किस्तों में।

  • भूमि पैकेज: वैकल्पिक कृषि भूमि, 3.75 लाख रुपये नकद तथा बड़े भू-स्वामियों को अधिकतम 1.25 बीघा अतिरिक्त भूमि का प्रावधान।

  • डीएलसी पैकेज: गैर-निवासी भू-स्वामियों को जिला स्तरीय समिति (डीएलसी) दरों का 2.5 से 3 गुना तक मुआवजा।

डीसीएफ ने क्या बताया?

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रामगढ़ विषधारी के उप वन संरक्षक (डीसीएफ) अरुण कुमार डी ने बताया कि टाइगर रिजर्व के क्रिटिकल कोर क्षेत्र में आठ राजस्व गांव स्थित हैं। इन परिवारों को मुआवजा पैकेज की पहली किस्त दी जा चुकी है, जबकि दूसरी और तीसरी किस्त के लिए धनराशि का इंतजार है। उन्होंने बताया कि भूमि पैकेज के लिए उपयुक्त जमीन उपलब्ध कराना सबसे बड़ी चुनौती है।

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इसके लिए विभाग ने केंद्र सरकार को खटकर के पास स्थित केशवपुरा वन क्षेत्र की करीब 244 हेक्टेयर भूमि को डि-रिजर्व करने का प्रस्ताव भेजा था, जिसे मई में केंद्रीय मंत्रालय की बैठक में प्रथम चरण की मंजूरी मिल गई। फिलहाल इस भूमि से जुड़े वनाधिकार और राजस्व संबंधी मामलों की प्रक्रिया स्थानीय प्रशासन पूरा कर रहा है। केशवपुरा गांव में 106 परिवार रहते हैं, लेकिन अब तक किसी भी परिवार की व्यक्तिगत पुनर्वास फाइल पूरी नहीं हो सकी है। ग्रामीणों का कहना है कि वन विभाग की ओर से पुनर्वास को लेकर स्पष्ट जानकारी या बैठकें नहीं की गई हैं।

सरकारी शिक्षक क्या बोले?

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सरकारी स्कूल के शिक्षक शंभूदयाल गुर्जर ने कहा कि ग्रामीण बढ़ती बाघों की आवाजाही और सुरक्षा संबंधी चिंताओं के कारण पुनर्वास के लिए तैयार हैं, लेकिन विभाग की ओर से उन्हें पर्याप्त जानकारी नहीं दी जा रही है। उन्होंने कहा कि जंगली जानवरों की बढ़ती आवाजाही के कारण रोजमर्रा की आवाजाही भी भय के माहौल में होती है, इसलिए लोग जल्द, पारदर्शी और न्यायसंगत पुनर्वास चाहते हैं।

वन्यजीव कार्यकर्ता विट्ठल सनाढ्य ने कहा कि समर्पित कर्मचारियों की कमी के कारण पुनर्वास की प्रक्रिया लगातार धीमी बनी हुई है। पिछले चार वर्षों में अपेक्षित प्रगति नहीं हो सकी है। उन्होंने बताया कि इस संबंध में मुख्य वन्यजीव प्रतिपालक और वन मंत्री सहित वरिष्ठ अधिकारियों से अलग टीम गठित करने की मांग की गई थी, लेकिन अब तक इस पर कार्रवाई नहीं हुई। डीसीएफ अरुण कुमार डी ने भी माना कि समर्पित स्टाफ की कमी के कारण पुनर्वास की गति धीमी है। उन्होंने बताया कि स्टाफ संरचना में बदलाव के लिए वरिष्ठ अधिकारियों को पत्र भी लिखा गया है।

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