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अदालत ने नहीं टूटने दिया कुछ बनने का सपना

Mon, 28 Jul 2014 03:23 PM IST
जयपुर/ ब्यूरो, अमर उजाला
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संगीन मामले में सजा काट रहे अपने भाई के पेरोल की मांग करने गई मंजू सीरवी का सपना जोधपुर हाईकोर्ट ने नहीं टूटने दिया।
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21 साल की मंजू खुद की पढ़ाई के इंतजाम के लिए हत्या के आरोप में उम्रकैद काट रहे भाई को पेरोल पर छोडऩे की गुहार कर रही थी।

बहस के दौरान मंजू ने अदालत से कहा कि वह कुछ बनना चाहती है, लेकिन मां-बाप बुजुर्ग हैं और वह उसकी पढ़ाई का खर्च नहीं उठा सकते।

ऐसे में भाई को यदि पेरोल दे दी जाएगी, तो वह जेल से बाहर आकर मेरी (मंजू) पढ़ाई जारी रखने के लिए कुछ व्यवस्था कर देगा।

यदि पेरोल नहीं मिली तो पढ़ाई छोडऩी पड़ेगी। मंजू का इतना कहना था कि न्यायाधीश गोविंद माथुर ने जब तक वह पढऩा चाहती है, तब तक का इंतजाम कर दिया।

हाथों-हाथ हो गया, पढ़ाई पर फैसला
न्यायाधीश ने उनकी अदालत में एक अन्य मामले की सुनवाई का इंतजार कर रहे वरिष्ठ अधिवक्ता मघराज सिंघवी की ओर देखते हुए कहा कि वकील साब आप इस मामले में क्या कर सकते हैं?

सिंघवी ने तुरंत कहा कि पेरोल का मामला तो आपको ही तय करना है, लेकिन मैं (सिंघवी) इस बच्ची की, जब तक यह पढऩा चाहे तब तक की शिक्षा पूरी करवाने का जिम्मा लेता हूं। इसके बाद पाली जिले के बाली में स्थित मरुधर महिला शिक्षण संघ कॉलेज में फोन लगाकर मैनेजमेंट से फीस, कॉलेज आने-जाने वाली बस का किराया अन्य खर्च का पता किया और हाथों-हाथ 30 हजार रुपए का चेक काटकर मंजू को सौंप दिया।
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जन्म दिन के दिन मिले अवसर को माना सौभाग्य
सिंघवी ने कहा कि जिस दिन मेरा मेरा बर्थडे था और उसी दिन मुझे एक बेटी को पढ़ाने की जिम्मेदारी लेने मौका मिला। जज साहब के आदेश पर मुझे यह अवसर मिला। यह मेरा सौभाग्य है।
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अपने बेटे क्षितिज बेटी श्वेता की भांति ही मंजू को भी उच्च शिक्षा दिलाने में कोई कमी नहीं रखूंगा। बाली निवासी मंजू सीरवी ने बताया कि उसके मां-बाप मजदूरी करते हैं। एक बहिन छोटी है। भाई के जेल में बंद होने से पढ़ाई जारी रखना मुश्किल हो रहा है। मंजू बाली में ही अध्ययनरत है और उसका शैक्षणिक रिकॉर्ड अच्छा रहा है।
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