महज एक दिन बाद राजस्थान विधानसभा चुनावों के लिए मतदान होने वाले हैं। बुधवार को चुनाव प्रचार खत्म हो गया। अब एक दिन राज्य के मतदाता शांत मन से किसे वोट देंगे, इसका फैसला अपने अंतर्मन में करेंगे। लेकिन बीते दिनों में चुनाव प्रचार के दौरान नेताओं के भाषणों और जमीन पर मतदाताओं के बीच चर्चा में रहने वाले मुद्दों के बीच जमीन आसमान का फर्क दिखा। हवाई जहाज और हेलीकॉप्टर में बैठकर हवा में उड़कर लोगों के बीच हवाई भाषण देकर उड़न छू होने वाले नेताओं ने जनता की असली नब्ज कितनी टटोली इसका पता तो 11 दिसंबर को ही चलेगा, लेकिन भाषणों में जमीनी मुद्दे गायब रहे और जुमलों का बोलबाला रहा।
हनुमान की जाति भी बना मुद्दा
नेताओं ने हनुमान जी की जाति से लेकर चौकीदार के कुत्ते तक को चुनावी विमर्श में शामिल किया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मां, उनकी और केद्रीय मंत्री उमा भारती की जाति पर कांग्रेसी नेताओं के बयानों को भाजपा ने भुनाने की कोशिश की तो मां बेटे के जमानत पर होने और एक परिवार की चार पीढ़ियों का हिसाब मांगने को भी चुनाव में घसीटा गया। लेकिन जमीन पर लोगों के बीच कुछ और ही मुद्दे थे जिन पर गली-मोहल्लों और नुक्कड़ों, गांवों और खेतों में मिलने वाले लोगों से जब बात करिए तो पता चलता है कि मंचों से नेताओं के भाषणों और जमीन पर रोजमर्रा की जिंदगी में खटने वालों के बीच दूरी कितनी बढ़ गई है।
दिल्ली से जयपुर,अजमेर,पुष्कर, पाली, जोधपुर, नाथद्वारा, उदयपुर, चित्तौड़, भीलवाड़ा, कोटा, झालावाड़, बूंदी, टोंक होते हुए वापस जयपुर की करीब ढाई हजार किलोमीटर की यात्रा के दौरान जितने भी लोगों से बात हुई, न किसी ने हनुमान जी की जाति की चर्चा की, न राबर्ट वाड्रा के खिलाफ दर्ज जमीन घोटाले से किसी को कोई मतलब दिखाई दिया। न ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय मंत्री उमा भारती की जाति और मोदी की मां को चुनाव में घसीटने वाले कांग्रेसी नेताओं के बयानों पर कोई प्रतिक्रिया किसी ने दी और न ही मां बेटे की जमानत के मुद्दे को लेकर कोई उत्तेजना कहीं दिखाई दी। चार पीढ़ियों का हिसाब भी कोई मांगता नहीं दिखा।
राजस्थान के अपने इस दौरे में जितने भी लोगों से बात हुई तो उनके सबके अपने अलग अलग मुद्दे सुनाई दिए। किसान बिजली की कमी और कर्ज के बढ़ते बोझ से परेशान दिखे। फसलों की सही कीमत और समय पर बिक्री न होने का दर्द भी उन्होंने बयां किया। नौजवानों को सबसे बड़ी चिंता अपने भविष्य को लेकर दिखाई दी। जो नौकरी में हैं, उन्हें डर है कि कब बेदखली न हो जाए और जो पढ़ रहे हैं, उन्हें चिंता है कि इतने पैसे खर्च करने के बाद भी उन्हें पढ़ाई पूरी करने के बाद नौकरी मिलेगी या नहीं। शहरों में व्यापारी और छोटे उद्योग धंधों वाले नोटबंदी और जीएसटी की मार से हुए कारोबारी नुकसान से परेशान दिखे। पर्यटन मौसम होने के बावजूद हाई वे पर ढाबों-होटलों में पसरा सन्नाटा भी पर्यटन उद्योग पर पड़ी नोटबंदी की मार की झलक दिखाता मिला।