राजस्थान में राजनीति की भाषा के गिरते स्तर पर सत्तारूढ़ भाजपा और विपक्ष में बैठी कांग्रेस ने चिंता प्रकट की है। लेकिन, दोनों पार्टियां इसके लिए एक-दूसरे को जिम्मेदार बता रही हैं। समाज शास्त्री कहते हैं कि मौजूदा राजनीति की भाषा ने समाज में भय और आक्रामकता पैदा की है जो समाज को मॉब लिंचिंग तक ले जाती है।
राजनीति में अपनी जगह तलाश रही महिलाओं का कहना है कि भाषा में जब मर्यादा के तट बंध टूटते हैं, तो सबसे अधिक महिलाएं ही निशाने पर रहती हैं।
चुनाव प्रचार के दौरान सत्ता के प्रबल दावेदार दोनों दलों ने चुनाव आयोग से एक-दूसरे के कुछ नेताओं के विवादित बयानों पर शिकायत की है। इनमें से कुछ मामलों में आयोग ने संबंधित नेताओं को नोटिस देकर सफाई भी मांगी है। मगर यह सिलसिला रुक नहीं रहा है।
सत्तारूढ़ भाजपा ने इन चुनावों में कथित रूप से विवादित वाणी निकालते रहे अपने तीन विधायकों के टिकट काट दिए। इनमें धन सिंह रावत मंत्री है और ज्ञान देव आहूजा और बनवारी लाल सिंघल अलवर जिले से विधायक हैं।
मगर भाजपा ने आहूजा को तुरंत पार्टी संगठन में उपाध्यक्ष पद देकर नवाज दिया। वहीं राहुल गांधी के बारे में विवादित बोल बोलने वाले बाड़मेर में बायतु से विधायक कैलाश चौधरी को फिर से उम्मीदवार बनाया है। जानकार कहते हैं कि जिन विधायकों का टिकट काटा गया है, उसके कारण कुछ अलग हैं।
क्यों काटे गए टिकट
भाजपा प्रवक्ता सुधांशु त्रिवेदी से पूछा गया कि क्या इन विधायकों के टिकट विवादित बोल के कारण काटे गए हैं?
त्रिवेदी ने इससे इंकार किया और कहा, ''आप यह कैसे कह सकते हैं? आहूजा को अभी उपाध्यक्ष बनाया गया है, यहां पर कोई भाषा का विषय नहीं है। संगठन अपने अनुसार यह तय करता है कि किस कार्यकर्ता को किस भूमिका में रखना है, भूमिका और दायित्व में परिवर्तन संगठन में एक सहज प्रक्रिया है। इससे अधिक इसमें और कुछ देखने का प्रयास नहीं करना चाहिए।''
हाल ही में कांग्रेस के पूर्व मंत्री सी पी जोशी के भाषण और कुछ अन्य कांग्रेस नेताओं के बयानों की शिकायत की गई है। वहीं कांग्रेस ने भी भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के भाषण के कुछ अंशों पर आपत्ति करते हुए शिकायत की है। लेकिन हर नेता ने विवाद सामने आने के बाद सफाई में कहा उनके बयान को तोड़-मरोड़ कर पेश किया गया है।
कोई कहता है कि सियासत सेवा है तो कोई इसे व्यापार बताता है। मगर व्यापार भी कहता है मीठा बोल पूरा तौल। कांग्रेस प्रवक्ता पवन खेड़ा इस पर कहते हैं कि इस तरह की बदजुबानी पहले कभी राजनीति में नहीं होती थी।
वे स्वर्गीय अटल बिहारी वाजपेयी के दौर को याद कर कहते हैं, ''पहले भाजपा नेता वाजपेयी जी प्रधानमंत्री बने, हमने वो दौर भी देखा है, कभी भी ऐसी बदजुबानी एक-दूसरे के विरुद्ध नहीं होती थी। लेकिन, अब एक नयी परंपरा डाली जा रही है। अफसोस की बात है कि यह सर्वोच्च नेतृत्व से आती है और इस सरकार में हमने देखा है कि जो भी ऐसी जुबान इस्तेमाल करता है, उसकी पदोन्नति हो जाती है।''
साधु संत पीर फकीर सदियों से मीठी जबान का पैगाम देते रहे हैं। मगर सियासत इसे कहां मानती है। भाजपा प्रवक्ता त्रिवेदी ने कहा, ''सभी दलों का दायित्व है कि वे भाषा का स्तर बनाए रखें। जो पार्टियां बड़ी हैं, उनका उत्तरदायित्व भी बड़ा है। इसमें कांग्रेस और भाजपा बड़ी पार्टियां हैं, उनका उत्तरदायित्व और ज्यादा है।''
त्रिवेदी कहते हैं कि भाषा का गिरता स्तर चिंता की बात है मगर वो पूछते हैं कि इसकी शुरुआत कब हुई? वो कहते हैं कि जब सर्वोच्च स्तर पर बैठे लोग खुलेआम अभद्र भाषा का प्रयोग करेंगे तब ऐसी स्थिति उतपन्न होगी ही। याद कीजिए साल 2007 को जब सोनिया गांधी जी ने नरेंद्र मोदी जी के लिए कैसे शब्द इस्तेमाल किये थे।