राजस्थान के ऐतिहासिक मेहरानगढ़ किले को देश का पहला यूनेस्को ग्लोबल जियोपार्क बनाने की दिशा में काम तेज हो गया है। मेहरानगढ़ म्यूजियम ट्रस्ट और भारतीय राष्ट्रीय कला एवं सांस्कृतिक धरोहर न्यास (इंटेक) मिलकर इस महत्वाकांक्षी परियोजना पर काम कर रहे हैं। परियोजना से जुड़ा अकादमिक और शोध कार्य पूरा किया जा चुका है। अब इसे अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप आगे बढ़ाने की तैयारी है। अगर यह पहल सफल होती है तो जोधपुर को भारत के पहले यूनेस्को ग्लोबल जियोपार्क का दर्जा दिलाने का मौका मिलेगा। इससे राजस्थान ही नहीं, बल्कि पूरे देश में भू-पर्यटन (जियो टूरिज्म) को भी नई दिशा मिल सकती है। इसके लिए जन-जागरूकता बढ़ाने और स्थानीय लोगों की भागीदारी सुनिश्चित करने पर भी जोर दिया जा रहा है।
75 करोड़ साल पुरानी चट्टान पर बसा है मेहरानगढ़ किला
मेहरानगढ़ किला ऐतिहासिक रूप से करीब 565 साल पुराना है, लेकिन जिस पहाड़ी पर यह बना है उसकी भूवैज्ञानिक उम्र लगभग 75 करोड़ वर्ष बताई जाती है। भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण (जीएसआई) ने भी इस क्षेत्र को आधिकारिक रूप से चिह्नित किया है। यहां की अनोखी भूवैज्ञानिक संरचना किले के भीतर और आसपास के हिस्सों में दिखाई देती है।
6 अक्टूबर को चलेगा जागरूकता अभियान
मेहरानगढ़ केवल ऐतिहासिक विरासत ही नहीं, बल्कि भू-विरासत, प्राकृतिक संपदा और सांस्कृतिक विविधता का भी महत्वपूर्ण केंद्र है। इसी पहाड़ी क्षेत्र में स्थित राव जोधा डेजर्ट रॉक पार्क भी प्राकृतिक और जैविक विविधता के लिए जाना जाता है। यूनेस्को ग्लोबल जियोपार्क के दावे को मजबूत करने के लिए 6 अक्टूबर को भू-विविधता दिवस के अवसर पर विशेष जन-जागरूकता अभियान चलाया जाएगा। इसमें भारत सरकार, राजस्थान सरकार और स्थानीय नागरिकों की भागीदारी लेने की योजना है। परियोजना को अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप तैयार करने के लिए इससे जुड़े प्रतिनिधि यूनेस्को हाउस में आयोजित कार्यशाला में भी हिस्सा ले चुके हैं। इसका उद्देश्य मेहरानगढ़ की भूवैज्ञानिक और सांस्कृतिक विरासत को वैश्विक स्तर पर प्रस्तुत करने की तैयारी को मजबूत करना है।
दुनिया में 51 देशों के 241 ग्लोबल जियोपार्क, भारत में एक भी नहीं
यूनेस्को भूवैज्ञानिक महत्व वाले क्षेत्रों को उनकी प्राकृतिक और सांस्कृतिक विशेषताओं के साथ संरक्षित करने के उद्देश्य से ग्लोबल जियोपार्क का दर्जा देता है। इसके लिए संबंधित क्षेत्र की ओर से निर्धारित प्रक्रिया के तहत आवेदन किया जाता है, जिसके बाद यूनेस्को उसका मूल्यांकन करता है। वर्तमान में दुनिया के 51 देशों में 241 ग्लोबल जियोपार्क मौजूद हैं, जबकि भारत में अभी तक एक भी स्थल को यह दर्जा नहीं मिला है। यूनेस्को ने वर्ष 2015 में इंटरनेशनल जियोसाइंस एंड जियोपार्क प्रोग्राम के तहत इस वैश्विक पहल की शुरुआत की थी। वर्ष 2025 में इस कार्यक्रम के 10 साल पूरे होने के मौके पर 11 देशों के 16 नए स्थलों को ग्लोबल जियोपार्क का दर्जा दिया गया था।
मेहरानगढ़ के साथ इन स्थलों के लिए भी प्रयास
भारत में इंटेक लंबे समय से इस दिशा में काम कर रहा है। मेहरानगढ़ के अलावा आंध्र प्रदेश के एर्रा मट्टी डिब्बालू, यानी लाल रेत के टीलों और प्रसिद्ध बोरा गुफाओं सहित अन्य महत्वपूर्ण भूवैज्ञानिक स्थलों को भी यूनेस्को ग्लोबल जियोपार्क के तहत पहचान दिलाने के प्रयास किए जा रहे हैं। यूनेस्को के मानकों के अनुसार ग्लोबल जियोपार्क केवल भूवैज्ञानिक विरासत के संरक्षण तक सीमित नहीं होता। इसमें प्राकृतिक और सांस्कृतिक विरासत को भी साथ लेकर स्थानीय संसाधनों के सतत उपयोग को बढ़ावा दिया जाता है। ऐसे क्षेत्र जलवायु परिवर्तन और प्राकृतिक आपदाओं के जोखिम को लेकर लोगों में जागरूकता बढ़ाने में भी अहम भूमिका निभाते हैं। मेहरानगढ़ को ग्लोबल जियोपार्क का दर्जा मिलने से जोधपुर की ऐतिहासिक पहचान के साथ उसकी भूवैज्ञानिक विरासत को भी अंतरराष्ट्रीय पहचान मिल सकती है और क्षेत्र में जियो टूरिज्म के नए अवसर विकसित हो सकते हैं।