फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

राजस्थान हाईकोर्ट का अहम फैसला: रिटायरमेंट से पहले तारीख बढ़ाने की अर्जी को नजरअंदाज नहीं कर सकती सरकार

Tue, 20 Oct 2026 04:11 PM IST
Sourabh Bhatt न्यूज डेस्क, अमर उजाला, जयपुर

सार

राजस्थान हाईकोर्ट ने कहा कि स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति प्रभावी होने से पहले कर्मचारी तारीख बढ़ाने का अनुरोध करे, तो सरकार को उस पर विचार करना होगा। हालांकि, याचिका में बहाली की मांग नहीं होने पर कोर्ट बहाली का आदेश नहीं दे सकती।

विज्ञापन
राजस्थान हाईकोर्ट - फोटो : सोशल मीडिया
विज्ञापन

विस्तार
वॉट्सऐप चैनल फॉलो करें

सरकारी कर्मचारी स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति की तारीख आने से पहले अपना फैसला बदलने या सेवानिवृत्ति की तारीख आगे बढ़ाने का अनुरोध करता है, तो सरकार उसकी अर्जी को नजरअंदाज नहीं कर सकती। राजस्थान हाईकोर्ट ने एक मामले में अहम फैसला सुनाते हुए कहा कि ऐसे अनुरोध पर सक्षम प्राधिकारी को विचार करना जरूरी है। हालांकि, अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि याचिका में बहाली की मांग नहीं की गई हो, तो कोर्ट कर्मचारी को दोबारा सेवा में लौटने का आदेश नहीं दे सकती।

मुख्य न्यायाधीश जस्टिस संजय के. अग्रवाल और जस्टिस इंद्रजीत सिंह की खंडपीठ ने एच.के. मीणा और राजस्थान सरकार की ओर से दायर अपीलों पर सुनवाई करते हुए यह व्यवस्था दी। अदालत ने एकलपीठ के 25 जनवरी 2017 के आदेश में संशोधन करते हुए मीणा की बहाली का आदेश रद्द कर दिया, लेकिन 30 अक्टूबर 2014 के स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति आदेश को निरस्त करने का फैसला बरकरार रखा।

स्वास्थ्य में सुधार के बाद तारीख बढ़ाने की मांग

एच.के. मीणा वाणिज्यिक कर विभाग में सहायक वाणिज्यिक कर अधिकारी के पद पर कार्यरत थे। उन्होंने स्वास्थ्य कारणों से स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति के लिए आवेदन किया था। राज्य सरकार ने 23 जुलाई 2014 को उनकी सेवानिवृत्ति की तारीख 31 जुलाई से बढ़ाकर 31 अक्टूबर 2014 कर दी थी।

बाद में मीणा ने स्वास्थ्य में सुधार का हवाला देते हुए 29 अक्टूबर 2014 को सेवानिवृत्ति की तारीख छह महीने और बढ़ाने का अनुरोध किया। सरकार ने 30 अक्टूबर को यह मांग खारिज कर दी और उन्हें 31 अक्टूबर की दोपहर से स्वैच्छिक सेवानिवृत्त कर दिया। मीणा ने सेवानिवृत्ति आदेश वापस लेने के लिए भी आवेदन दिया, लेकिन सरकार ने उस पर निर्णय नहीं लिया। इसके बाद उन्होंने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।

विज्ञापन


यह भी पढें- अजमेर: स्टेशन मास्टर के 1,200 से अधिक पदों पर भर्ती की प्रक्रिया जल्द, अजमेर आरआरबी को जिम्मेदारी

एकलपीठ ने दिया था बहाली का आदेश

एकलपीठ ने 25 जनवरी 2017 को मीणा का सेवानिवृत्ति आदेश रद्द करते हुए राज्य सरकार को चार सप्ताह में उन्हें सेवा में बहाल करने का निर्देश दिया था। हालांकि, 30 अक्टूबर 2014 से 25 जनवरी 2017 तक के वेतन, वार्षिक वेतनवृद्धि और वरिष्ठता से जुड़े लाभों को केवल पेंशन के उद्देश्य तक सीमित रखा गया था।

इस फैसले को मीणा और राज्य सरकार, दोनों ने चुनौती दी। मीणा ने सेवा में निरंतरता और अन्य लाभ मांगे, जबकि सरकार ने बहाली के आदेश पर आपत्ति जताई।

सेवानिवृत्ति से पहले किए अनुरोध पर विचार जरूरी

खंडपीठ ने राजस्थान सिविल सेवा (पेंशन) नियम, 1996 के नियम 50 का विश्लेषण करते हुए कहा कि स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति के लिए सामान्य तौर पर कम से कम तीन महीने का लिखित नोटिस देना होता है और सक्षम प्राधिकारी की स्वीकृति जरूरी होती है।

अदालत ने कहा कि नियमों में सेवानिवृत्ति की तारीख बढ़ाने के लिए अलग से स्पष्ट प्रक्रिया नहीं दी गई है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि कर्मचारी ऐसा अनुरोध नहीं कर सकता। मीणा ने सेवानिवृत्ति प्रभावी होने से पहले ही तारीख बढ़ाने की मांग कर दी थी। ऐसे में सरकार को उनकी अर्जी पर विचार करना चाहिए था।

खंडपीठ ने माना कि एकलपीठ ने 30 अक्टूबर 2014 के सेवानिवृत्ति आदेश को रद्द करके सही किया था।

सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का भी उल्लेख

हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के यूनियन ऑफ इंडिया बनाम गोपाल चंद्र मिश्रा मामले का हवाला देते हुए कहा कि सामान्य सिद्धांत के तहत भविष्य की तारीख से प्रभावी होने वाले त्यागपत्र या इसी तरह के सेवा समाप्ति संबंधी निर्णय को प्रभावी होने से पहले वापस लिया जा सकता है, बशर्ते इस पर कोई कानूनी, संविदात्मक या संवैधानिक रोक न हो।

खंडपीठ ने भारत अमरतलाल कोठारी बनाम दोसुखान समदखान सिंधी और यूनियन पब्लिक सर्विस कमीशन बनाम नसीर-उद-दीन वानी मामलों में सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का भी उल्लेख किया।

याचिका में बहाली नहीं मांगी, इसलिए आदेश निरस्त

खंडपीठ ने फैसले में कहा कि मीणा ने अपनी मूल याचिका में सेवानिवृत्ति आदेश रद्द करने और उनके आवेदन पर विचार करने की मांग की थी, लेकिन सेवा में बहाली की स्पष्ट राहत नहीं मांगी थी। अदालत ने स्पष्ट किया कि याचिका में जिस राहत की मांग नहीं की गई, वह राहत नहीं दी जा सकती। इसी आधार पर एकलपीठ का बहाली संबंधी आदेश निरस्त कर दिया गया। हालांकि, 30 अक्टूबर 2014 का सेवानिवृत्ति आदेश रद्द करने का फैसला बरकरार रखा गया।

खंडपीठ ने एकलपीठ के आदेश में इसी सीमा तक संशोधन करते हुए दोनों अपीलों का निस्तारण कर दिया। अदालत ने पक्षकारों को अपना-अपना खर्च वहन करने का निर्देश दिया।

विज्ञापन
और पढ़ें...
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें