राजस्थान हाईकोर्ट में वकीलों की हड़ताल
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राजस्थान हाईकोर्ट ने राज्य बाल अधिकार संरक्षण आयोग के अध्यक्ष और सदस्यों की नियुक्ति में हो रही देरी पर नाराजगी जताई है। कोर्ट ने कहा कि नियुक्ति प्रक्रिया को पूरा करने में दो साल से अधिक समय बीत चुका है, जबकि आयोग के अध्यक्ष और सदस्यों का कार्यकाल ही तीन साल का होता है।
जस्टिस विनीत कुमार माथुर और जस्टिस चंद्रशेखर शर्मा की खंडपीठ ने सोमवार को मामले की सुनवाई करते हुए राज्य सरकार को नियुक्ति प्रक्रिया जल्द से जल्द पूरी करने के निर्देश दिए। कोर्ट ने इसके लिए अधिकतम चार सप्ताह का समय दिया है।
निर्धारित अवधि में प्रक्रिया पूरी नहीं होने पर बाल अधिकार विभाग के सचिव को व्यक्तिगत रूप से कोर्ट में उपस्थित होना होगा। सुनवाई के दौरान सामने आया कि राज्य सरकार ने नियुक्तियों की प्रक्रिया शुरू की थी, लेकिन 29 जून को मुख्यमंत्री कार्यालय ने फाइल लौटाकर अतिरिक्त नामों की सूची मांगी थी।
इसके बाद चयन समिति की दोबारा बैठक हुई और नए सिरे से नामों का चयन किया गया। प्रक्रिया पूरी होने के बाद फाइल फिर मुख्यमंत्री कार्यालय भेजी गई, जहां वह विचाराधीन बताई गई। कोर्ट ने कहा कि अध्यक्ष और सदस्यों की नियुक्ति की प्रक्रिया में दो साल से अधिक समय लग चुका है, जबकि उनका कार्यकाल तीन साल का ही है। खंडपीठ ने कहा कि राज्य के बच्चों के हित में आयोग का गठन जल्द से जल्द किया जाना जरूरी है।
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कोर्ट ने यह भी टिप्पणी की कि आयोग के प्रभावी रूप से काम नहीं करने से राज्य के बच्चों को कई तरह की परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। इससे पहले 25 मई को कोर्ट ने राज्य सरकार को चार सप्ताह में नियुक्ति की प्रगति बताने के निर्देश दिए थे।
साथ ही आदेश की पालना नहीं होने पर संबंधित विभाग के सचिव को व्यक्तिगत रूप से उपस्थित रहने को कहा था। 13 जुलाई को राज्य सरकार ने प्रगति रिपोर्ट पेश कर सचिव की व्यक्तिगत उपस्थिति से छूट मांगी थी। सरकार की ओर से कोर्ट को भरोसा दिलाया गया था कि नियुक्ति प्रक्रिया जल्द पूरी कर ली जाएगी। मामले की अगली सुनवाई 16 नवंबर को होगी।