भारत निर्वाचन आयोग ने राजस्थान समेत पांच राज्यों के चुनाव कार्यक्रम की घोषणा कर आदर्श आचार संहिता लागू कर दी है। यह किसी कानून से नहीं बल्कि राजनीतिक दलों की सहमति से बनी है। समय के साथ इसमें कई बदलाव हुए और सभी दल इसका पालन करते हैं।
राज्य में चुनाव की अधिसूचना जारी होते ही आदर्श आचार संहिता लागू हो जाती है। नतीजे आने तक यह आचार संहिता जारी रहेगी। इस दौरान कोई भी प्रत्याशी सरकारी गाड़ी, विमान या बंगले का इस्तेमाल चुनाव प्रचार के लिए नहीं कर सकता। साथ ही सार्वजनिक धन का इस्तेमाल किसी भी पार्टी या नेता को फायदा पहुंचाने के लिए नहीं किया जा सकता। हर राजनीतिक दल, प्रत्याशी, नेता या समर्थकों को रैली करने से पहले पुलिस की अनुमति लेनी होगी। इस दौरान निर्वाचन आयोग की हर राजनीतिक दल की गतिविधि पर नजर रहती है। सरकारी घोषणा, लोकार्पण और शिलान्यास नहीं किया जा सकता। चुनावी रैली में धर्म या जाति के नाम पर वोट नहीं मांगे जा सकते। कोई भी प्रत्याशी सरकारी मशीनरी या मतदाताओं को पैसों का प्रलोभन नहीं दे सकता। यदि इन नियमों का उल्लंघन होता है तो जिले का मुख्य निर्वाचन अधिकारी यानी कलेक्टर निर्देश जारी कर प्रत्याशी या राजनीतिक दल के खिलाफ एफआईआर दर्ज करवा सकता है।
1960 में लागू हुई थी पहली बार आचार संहिता
1960 में केरल के विधानसभा चुनावों में पहली बार आदर्श आचार संहिता लागू हुई थी। इसमें बताया गया था कि प्रत्याशी और राजनीतिक दल को क्या करना चाहिए और क्या नहीं। 1962 के आम चुनावों में निर्वाचन आयोग ने इसे सभी राजनीतिक दलों को दिया था। 1967 के चुनावों में पहली बार इसका सख्ती से पालन किया गया। तब से अब तक यह सिलसिला जारी है। निर्वाचन आयोग और अदालतों ने समय-समय पर आदर्श आचार संहिता में बदलाव किए हैं। चुनावी खर्च की सीमा तय की गई है।
प्रत्याशियों के चुनावी खर्च की गणना शुरू होगी
निर्वाचन आयोग ने विधानसभा और लोकसभा चुनावों में प्रत्याशी के चुनावी खर्च पर सीमा तय कर रखी है। 2022 में चुनाव आयोग ने लोकसभा चुनावों के लिए राज्यों के आधार पर 54 से 70 लाख रुपये की सीमा को बढ़ाकर 70 से 95 लाख रुपये तय किया था। विधानसभा चुनावों में खर्च की सीमा को 20 से 28 लाख रुपये (राज्यों के आधार पर) से बढ़ाकर 28 से 40 लाख रुपये तय किया गया था। इसके लिए वर्ष 2020 में चुनाव खर्च की सीमा का अध्ययन करने के लिए चुनाव आयोग ने समिति का गठन किया था। कोविड-19 महामारी के कारण वर्ष 2020 में 10% की वृद्धि के अलावा उम्मीदवारों के लिए खर्च सीमा में अंतिम बड़ा संशोधन वर्ष 2014 में किया गया था। समिति ने पाया कि वर्ष 2014 के बाद से मतदाताओं की संख्या और लागत मुद्रास्फीति सूचकांक में काफी वृद्धि हुई है।
चुनावी खर्च में क्या-क्या होता है शामिल
चुनावी खर्च वह राशि है जो एक उम्मीदवार चुनाव अभियान के दौरान कानूनी रूप से खर्च करता है। इसमें सार्वजनिक बैठकों, रैलियों, विज्ञापनों, पोस्टर, बैनर, वाहनों और विज्ञापनों पर खर्च शामिल होता है। जन-प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 77 के तहत प्रत्येक उम्मीदवार को नामांकन की तिथि से लेकर परिणाम घोषित होने की तिथि तक किए गए सभी व्यय का अलग और सही खाता रखना होता है। चुनाव संपन्न होने के 30 दिनों में उम्मीदवारों को चुनाव आयोग के समक्ष अपना व्यय विवरण प्रस्तुत करना होता है। यदि उम्मीदवार ने गलत विवरण प्रस्तुत किया तो अधिनियम की धारा 10 के तहत चुनाव आयोग उसे तीन साल के लिए अयोग्य घोषित कर सकता है।