राजस्थान के 10 नगर निगमों के नतीजे सोमवार को सामने आएंगे। इन नतीजों से सिर्फ शहरों की स्थानीय सरकार तय नहीं होगी, बल्कि भाजपा और कांग्रेस के बीच शहरी सियासत में किसका पलड़ा भारी है, इसकी तस्वीर भी साफ होगी। खास बात यह है कि इन 10 निगमों के दायरे में दोनों दलों के कई बड़े नेता और मंत्री आते हैं। ऐसे में जीत-हार का असर स्थानीय राजनीति से आगे 2028 के विधानसभा चुनाव की तैयारियों तक दिखाई दे सकता है।
इनमें जयपुर और अजमेर के नतीजों पर सबसे ज्यादा नजर रहेगी। जयपुर राजधानी है और यहां भाजपा के सामने मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा, दोनों उपमुख्यमंत्री दीया कुमारी और प्रेमचंद बैरवा, कैबिनेट मंत्री राज्यवर्धन राठौड़ समेत कई विधायक हैं। वहीं कांग्रेस की ओर से रफीक खान, अमीन कागजी, मनीष यादव, विद्याधर सिंह, शिखा मील बराला और प्रशांत शर्मा जैसे चेहरे हैं। ऐसे में जयपुर का परिणाम दोनों दलों के लिए सीधे राजनीतिक शक्ति परीक्षण की तरह देखा जा रहा है।
जयपुर में भाजपा के बड़े चेहरे, कांग्रेस के सामने राजधानी बचाने की चुनौती
जयपुर के अलग-अलग विधानसभा क्षेत्रों में भाजपा के पास मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा, डिप्टी सीएम दीया कुमारी, डिप्टी सीएम प्रेमचंद बैरवा और कैबिनेट मंत्री राज्यवर्धन राठौड़ के अलावा बालमुकुंद आचार्य, गोपाल शर्मा, कालीचरण सराफ, कैलाश चंद वर्मा, महेंद्र पाल मीणा और हंसराज पटेल जैसे विधायक हैं।
कांग्रेस के पास भी जयपुर में मजबूत राजनीतिक चेहरे हैं। रफीक खान, अमीन कागजी, मनीष यादव, विद्याधर सिंह, शिखा मील बराला और प्रशांत शर्मा की विधानसभा सीटों के प्रदर्शन का असर नगर निगम के नतीजों पर भी दिखाई दे सकता है। यानी सवाल सिर्फ यह नहीं है कि नगर निगम में किस दल के कितने पार्षद जीतते हैं। बड़ा सवाल यह भी है कि राजधानी में किस पार्टी का राजनीतिक आधार मजबूत नजर आता है।
अजमेर में सबसे बड़ा सवाल, क्या 36 साल बाद कांग्रेस की वापसी होगी?
जयपुर के बाद सबसे ज्यादा दिलचस्पी अजमेर के नतीजों को लेकर है। इसकी वजह सिर्फ भाजपा का मजबूत राजनीतिक नेटवर्क नहीं, बल्कि कांग्रेस का 36 साल से शहरी सत्ता से बाहर रहना भी है। अजमेर में विधानसभा अध्यक्ष वासुदेव देवनानी, कैबिनेट मंत्री सुरेश रावत, विधायक अनीता भदेल, शंकर सिंह रावत, शत्रुघ्न गौतम, वीरेंद्र सिंह और रामस्वरूप लांबा जैसे भाजपा के कई बड़े चेहरे हैं। इसके अलावा ओंकार सिंह लखावत भी अजमेर की राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका रखते हैं। डिप्टी सीएम दीया कुमारी यहां की प्रभारी मंत्री हैं, जबकि डिप्टी सीएम प्रेमचंद बैरवा का अजमेर लोकसभा क्षेत्र से जुड़ाव है।
अजमेर की राजनीतिक अहमियत इसलिए भी बढ़ जाती है, क्योंकि आरएसएस के चित्तौड़गढ़ प्रांत का मुख्यालय भी यहीं है। ऐसे में भाजपा के लिए यह सिर्फ एक नगर निगम का चुनाव नहीं माना जा रहा है। दूसरी तरफ कांग्रेस के पास अजमेर शहर से विधायक विकास चौधरी का चेहरा है। ऐसे में कांग्रेस के सामने बड़ा सवाल है कि क्या वह 36 साल के लंबे अंतराल के बाद शहर की सत्ता में वापसी कर पाएगी? क्या इस बार अजमेर में 36 साल पुराना राजनीतिक समीकरण बदलेगा या भाजपा अपना दबदबा कायम रखेगी? नतीजों में इसका जवाब मिलेगा।
अलवर में भाजपा के कई दिग्गज, कांग्रेस के पास भी बड़े चेहरे
अलवर में भाजपा की ओर से केंद्रीय मंत्री भूपेंद्र यादव, कैबिनेट मंत्री संजय शर्मा, विधायक जसवंत यादव, रमेश खींची, देवी सिंह शेखावत, खुशवंत सिंह और महंत बालकनाथ जैसे बड़े चेहरे हैं। कांग्रेस की ओर से पूर्व केंद्रीय महासचिव भंवर जितेंद्र सिंह, नेता प्रतिपक्ष टीकाराम जूली, दीपचंद खैरिया, ललित यादव, मांगीलाल मीणा और कांति प्रसाद मीणा का राजनीतिक प्रभाव है। इसलिए अलवर में मुकाबला भाजपा के बड़े नेटवर्क और कांग्रेस के पुराने राजनीतिक आधार के बीच माना जा रहा है।
भरतपुर में कांग्रेस के पास विधायक नहीं, भाजपा का मजबूत नेटवर्क
भरतपुर मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा का गृह जिला है। यहां भाजपा के पास शैलेश सिंह, गृह राज्य मंत्री जवाहर सिंह बेड़म, बहादुर सिंह कोली, नोक्षम चौधरी और जगत सिंह जैसे प्रमुख चेहरे हैं। कांग्रेस के पास यहां कोई विधायक नहीं है। हालांकि निर्दलीय ऋतु बनावत और आरएलडी के डॉ. सुभाष गर्ग की राजनीतिक मौजूदगी मुकाबले को अलग रंग देती है। इसलिए भरतपुर में भाजपा के प्रदर्शन पर खास नजर रहेगी।
जोधपुर में गहलोत बनाम भाजपा के दिग्गजों की परीक्षा
जोधपुर में भाजपा की ओर से केंद्रीय मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत, जोगाराम पटेल, पब्बाराम विश्नोई, अतुल भंसाली, भैराराम सियोल, बाबू सिंह राठौड़ और देवेंद्र जोशी जैसे चेहरे हैं। वहीं कांग्रेस के सबसे बड़े नामों में पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत शामिल हैं। गीता बरवड़ भी कांग्रेस की ओर से प्रमुख राजनीतिक चेहरा हैं। ऐसे में जोधपुर का परिणाम भाजपा और अशोक गहलोत के प्रभाव की भी परीक्षा माना जाएगा।
कोटा में भाजपा के सामने धारीवाल का राजनीतिक प्रभाव
कोटा में लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला, शिक्षा मंत्री मदन दिलावर, ऊर्जा मंत्री हीरालाल नागर, विधायक संदीप शर्मा और कल्पना देवी भाजपा की ओर से प्रमुख चेहरे हैं। कांग्रेस की तरफ से पूर्व मंत्री शांति धारीवाल और चेतन पटेल का प्रभाव है। कोटा में मुकाबला इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि यहां भाजपा के पास सरकार और संगठन दोनों का मजबूत चेहरा है, जबकि कांग्रेस के पास शहर की राजनीति में लंबे समय से प्रभाव रखने वाला धारीवाल कैंप है।
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उदयपुर और पाली में भाजपा का भारी राजनीतिक वजन
उदयपुर में सांसद मन्नालाल रावत, विधायक ताराचंद जैन, फूल सिंह मीणा, उदयलाल डांगी, शांता अमृतलाल मीणा, प्रतापलाल गोमेती और बाबूलाल के साथ प्रभारी मंत्री हेमंत मीणा भाजपा के प्रमुख चेहरे हैं। कांग्रेस की ओर से दयाराम परमार और पुष्कर लाल डांगी प्रमुख नाम हैं। पाली में भाजपा के प्रदेशाध्यक्ष मदन राठौड़, सांसद पीपी चौधरी, कैबिनेट मंत्री अविनाश गहलोत, कैबिनेट मंत्री जोराराम कुमावत और विधायक शोभा चौहान जैसे नेताओं की राजनीतिक प्रतिष्ठा जुड़ी है। ऐसे में यहां भी भाजपा के प्रदर्शन को संगठन की ताकत से जोड़कर देखा जाएगा।
बीकानेर में केंद्रीय मंत्री अर्जुनराम मेघवाल की प्रतिष्ठा
बीकानेर में केंद्रीय मंत्री अर्जुनराम मेघवाल के साथ सिद्धि कुमारी, जेठानंद व्यास, अंशुमान सिंह भाटी, कैबिनेट मंत्री सुमित गोदारा, ताराचंद सारस्वत और डॉ. विश्वनाथ मेघवाल भाजपा के प्रमुख चेहरे हैं। कांग्रेस की ओर से सुशीला रामेश्वर डूडी प्रमुख नाम हैं। यहां निगम का परिणाम भाजपा के लिए अपने मजबूत राजनीतिक नेटवर्क को साबित करने का मौका है।
10 निगमों का नतीजा, 2028 से पहले बड़ा राजनीतिक संकेत
इन 10 नगर निगमों के नतीजों को सिर्फ स्थानीय चुनाव मानना मुश्किल है। भाजपा के कई मंत्री, सांसद और विधायक सीधे इन शहरों से जुड़े हैं, जबकि कांग्रेस के पास भी अपने-अपने क्षेत्रों में पुराने और प्रभावशाली चेहरे हैं। ऐसे में नगर निगम चुनाव के नतीजे दोनों दलों के लिए शहरी जनाधार का संकेत देने के साथ-साथ 2028 के विधानसभा चुनाव से पहले राजनीतिक माहौल का भी अंदाजा देंगे। राजधानी जयपुर से लेकर अजमेर, अलवर, भरतपुर, जोधपुर, कोटा, उदयपुर, पाली और बीकानेर तक आने वाले नतीजे बताएंगे कि राजस्थान के शहरों में फिलहाल किस दल का दबदबा है।