महिला चिकित्सालय में प्रसूता की मौत
जयपुर के महिला चिकित्सालय में एक प्रसूता की इलाज के अभाव में मौत ने एक बार फिर सरकारी अस्पतालों की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े कर दिए हैं। मृतका के पति विनोद के अनुसार उनकी पत्नी को 19 तारीख की रात अस्पताल में भर्ती कराया गया था। सुबह डिलीवरी के बाद उसकी तबीयत बिगड़ गई लेकिन डॉक्टरों ने घंटों इंतजार कराया। आरोप है कि महिला पूरी रात तड़पती रही और स्टाफ ने इलाज करने के बजाय परिजनों को बाहर बैठाए रखा।
रात 10 बजे हालत गंभीर होने के बावजूद डॉक्टरों की टीम सुबह सक्रिय हुई। तब तक स्थिति बिगड़ चुकी थी। ब्लीडिंग इतनी ज्यादा थी कि 20 यूनिट ब्लड चढ़ाना पड़ा और महिला की बच्चेदानी भी निकालनी पड़ी। इस सबके बावजूद प्रसूता की जान नहीं बचाई जा सकी।
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परिजनों का आरोप है कि एक तो डॉक्टरों ने समय पर इलाज नहीं किया और उल्टे उन्हें धमकाया गया। वहीं अस्पताल अधीक्षक आशा वर्मा ने सफाई देते हुए कहा कि अस्पताल में बहुत मरीज आते हैं, हर किसी को बचाना संभव नहीं है। गायनी विशेषज्ञों का कहना है कि डिलीवरी के बाद ब्लीडिंग की स्थिति में यदि 2-3 घंटे के भीतर इलाज न मिले तो मरीज डीआईसी में चला जाता है, जहां मौत लगभग तय हो जाती है।
महिला चिकित्सालय में पहले भी ऐसी लापरवाही की शिकायतें सामने आ चुकी हैं। सवाल यह है कि क्या सरकारी अस्पतालों में अब जिंदगी सिर्फ किस्मत पर निर्भर रह गई है, या सिस्टम कभी अपनी जिम्मेदारी समझेगा?