राजधानी जयपुर के सबसे प्राचीन और ऐतिहासिक किले आमेर स्थित शिला माता मंदिर में आज से चैत्र नवरात्र की विशेष पूजा शुरू हो गई है। कछवाहा शासक राजा मानसिंह द्वारा स्थापित यह प्राचीन मंदिर न केवल ऐतिहासिक धरोहर है, बल्कि देवी शिला देवी के प्रति अटूट श्रद्धा का प्रमुख केंद्र भी है। नवरात्र के दौरान यहां विशेष व्यवस्थाएं की जाती हैं और हजारों श्रद्धालु मां के दर्शन के लिए पहुंचते हैं। मान्यता है कि इस पावन समय में की गई पूजा हर मनोकामना पूर्ण करती है, जिससे मंदिर का धार्मिक महत्व और भी बढ़ जाता है। जानिए इस मंदिर का इतिहास और इसकी मान्यताओं के बारे में इस रिपोर्ट में
इतिहास के अनुसार, राजा मानसिंह बंगाल के राजा केदार पर विजय के बाद देवी की प्रतिमा को जेस्सोर से आमेर लेकर आए थे और यहीं इसकी स्थापना की। मंदिर की प्रतिमा संगमरमर की शिला पर उत्कीर्ण है और दक्षिणमुखी है, जो इसे विशेष बनाती है।
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नवरात्र पर दर्शन का विशेष महत्व
आमेर किले के भीतर स्थित यह मंदिर अपनी अद्भुत स्थापत्य कला, ऐतिहासिक विरासत और धार्मिक महत्व के कारण श्रद्धालुओं व पर्यटकों के लिए प्रमुख आकर्षण बना हुआ है। इतिहास के अनुसार, मंदिर में 1972 तक पशु बलि की परंपरा जारी रही, लेकिन जैन धर्म के अनुयायियों के विरोध के बाद इस प्रथा को भी पूरी तरह बंद कर दिया गया। आज यह मंदिर श्रद्धा और आस्था का प्रमुख केंद्र है, जहां बिना किसी बलि के पूजा-अर्चना की जाती है।
मंदिर के द्वार पर नवदुर्गा रूप
आमेर स्थित शिला देवी मंदिर में प्रवेश करते ही श्रद्धालुओं का ध्यान सबसे पहले इसके भव्य मुख्य द्वार पर जाता है, जो शुद्ध चांदी से निर्मित है। इस द्वार पर मां दुर्गा के नौ रूप-शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चंद्रघंटा, कूष्मांडा, स्कंदमाता, कात्यायनी, कालरात्रि और सिद्धिदात्री-की सुंदर नक्काशी की गई है, जो इसे विशेष धार्मिक महत्व प्रदान करती है।
इसके साथ ही द्वार पर दस महाविद्याओं-काली, तारा, षोडशी, भुवनेश्वरी, छिन्नमस्ता, त्रिपुर, भैरवी, धूमावती, बगुलामुखी, मातंगी और कमला- के स्वरूप भी आकर्षक ढंग से उकेरे गए हैं। यह शिल्पकला मंदिर की समृद्ध परंपरा और उत्कृष्ट कारीगरी को दर्शाती है। मुख्य द्वार के ऊपर लाल पत्थर से निर्मित भगवान गणेश की प्रतिमा स्थापित है, जो मंदिर में प्रवेश करने वाले भक्तों के लिए मंगल और शुभता का प्रतीक मानी जाती है।