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Rajasthan Politics: एक नेता, दो पार्टियां और बढ़ती बेचैनी; सवाल वही- मालवीय के आने से क्या बदलेगा?

Sat, 17 Jan 2026 06:31 PM IST
सौरभ भट्ट न्यूज डेस्क, अमर उजाला, जयपुर

सार

राजस्थान की राजनीति में अब इस बात को लेकर मंथन चल रहा है कि महेंद्रजीत मालवीय वापसी से कांग्रेस में क्या बदलाव होगा। क्या मालवीय का चला जाना बीजेपी स्टेट लीडरशिप की विफलता है-
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पूर्व मंत्री मालवीया - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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भगवाधारी पार्टी से मालवीय के एक्जिट और कांग्रेस में वापसी को लेकर राजस्थान में जबरदस्त सियासी हलचल देखने को मिली।बड़ा सवाल यह है कि मालवीय के आने और जाने से बीजेपी और कांग्रेस के ऐसा क्या बदल जाएगा- जिसे लेकर इतना बवाल मचा हुआ है। विधानसभा व लोकसभा चुनावों के बाद राजस्थान की सियासत अब एक बार फिर से किसी नेता की एंट्री और एक्जिट को लेकर उबाल मार रही है। करीब 23 महीने तक बीजेपी में रहे मालवीय की अब कांग्रेस आधिकारिक रूप से घर वापसी हो गई है। शुक्रवार देर रात एआईसीसी ने मालवीय की कांग्रेस में वापसी को आधिकारिक रूप से सहमति दे दी।
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लेकिन मालवीय को लेकर राजस्थान की राजनीति में इतनी चर्चा किस लिए हुई। ऐसा क्या हुआ कि मालवीय के बीजेपी छोड़ने के ऐलान के कुछ घंटो बाद ही उनके ठिकानों पर एसीबी पहुंच गई। बीजेपी मालवीय के एक्जिट से इतनी बेचैन क्यों हो गई?
मालवीय के बीजेपी छोड़ने के ऐलान के एक सप्ताह के भीतर ही उनकी कांग्रेस में आधिकारिक वापसी हो गई। वहीं बीजेपी में अब तक कोई मालवीय कोई स्पष्ट बयान नहीं आ पाया। एक तरह से बीजेपी इस मुद्दे को लेकर दुविधा में नजर आई। लेकिन मालवीय को लेकर दोनों  ही पार्टियों का इतना स्ट्रोंग रिएक्शन समझने लायक है। इसकी बड़ी वजह है वागड़ में बाप का तेजी से बढ़ता प्रभाव। बीएपी के बढ़ते जनाधार के चलते कांग्रेस और बीजेपी दोनों के लिए वागड़ और उदयपुर अंचल में सियासी चुनौतियां अब काफी बढ़ चुकी हैं। आदिवासी वोट बैंक छिटकने के चलते विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की परफॉर्मेंस काफी कमजोर रही। मालवीय के बीजेपी में आने के बाद उनकी विधानसभा सीट बागीदौरा पर हुए उपचुनाव में कांग्रेस खिसक कर तीसरे नंबर पर आ गई। उपचुनाव में यह सीट ‘बाप’ पार्टी के खाते में चली गई। वागड़ में बाप का जनाधार कितनी तेजी से बढ़ा है, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि 2018 में बाप के पास मात्र एक विधायक था और 2023 में यहां इसके विधायकों की संख्या बढ़कर 4 हो गई है। इसका सबसे ज्यादा खामियाजा कांग्रेस ने ही उठाया है। 
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कौन है महेंद्रजीत मालवीय

महेंद्रजीत सिंह मालवीय ने 1998 में कांग्रेस के टिकट पर बांसवाड़ा लोकसभा सीट से चुनाव जीतकर सांसद का पद संभाला। इसके बाद 2003 में उन्होंने बागीदौरा विधानसभा सीट से चुनाव लड़ा, लेकिन जनता दल युनाईटेड के जीतमल खांट से हार गए। इसके बाद हुए चार चुनावों में उन्होंने लगातार जीत हासिल की और बागीदौरा से चार बार विधायक बने। चौथी बार विधायक बनने के तीन महीने बाद ही उन्होंने कांग्रेस छोड़कर भाजपा में शामिल हो गए और अपने विधायक पद से इस्तीफा दे दिया। मार्च 2024 में भाजपा में शामिल होने के बाद उन्हें डूंगरपुर-बांसवाड़ा लोकसभा सीट से चुनाव लड़ाया गया। हालांकि, उन्होंने इस चुनाव में करारी हार का सामना किया और भारत आदिवासी पार्टी (BAP) के राजकुमार रोत के खिलाफ करीब ढाई लाख वोटों से चुनाव गंवा दिया।


अस्तित्व कायम रखने के लिए कद्दावर नेता चाहिए-
वरिष्ठ पत्रकार मनीष गोधा का मानना है कि बीजेपी को मालवीय के एक्जिट से नुकसान होगा। उन्होंने कहा कि मालवीय का नाम बड़ा है। कांग्रेस ने वर्षों तक मालवीय के भरोसे वागड़ में काम किया है। मालवीय के जाने के बाद कांग्रेस ने वहां नई लीडरशिप पर काम तो किया लेकिन वैसी मजबूती नहीं मिल पाई। बीजेपी ने क्यों मालवीय को खोया। इसकी वजह यह भी है कि बीजेपी की लोकल लीडरशिप मालवीय को एक्सेप्ट नहीं कर पा रही थी। इस वजह से मालवीय बीजेपी में एडजेस्ट नहीं हो रहे थे। बीजेपी एक तरह से मालवीय को लेकर दुविधा में थी।
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लीडरशिप अलग होती तो मालवीय बीजेपी में रुक सकते थे
 वरिष्ठ पत्रकार त्रिभुवन कहते हैं कि स्थानीय बीजेपी में मालवीय को लेकर विरोध था। लेकिन स्टेट लीडरशिप मजबूत होती हो इस विरोध को थामा जा सकता था। वसुंधरा राजे अगर यहां सीएम होती तो शायद मालवीय को बीजेपी छोड़कर नहीं जाने देंती। राजनीति में जब भी खेमा बदला जाता है तो एक वाक्य बोला जाता है - दम घुट रहा था। लेकिन यहां मालवीय वाकई में ही उपेक्षा का शिकार थे। कांग्रेस के कार्यक्रमों में जहां वे अग्रिम पंक्ति में नजर आते थे वहीं बीजेपी में पांचवी-छठी पंक्ति में जाकर उन्हें जगह मिलती थी। फिर एक बार और है कि राजस्थान में हर पांच साल में सत्ता परिवर्तन का रिवाज है। उन्होंने यह भी सोचा होगा कि दो साल बीजेपी में निकल गए अब कांग्रेस में आएंगे तो हो सकता है कि सरकार बने तो कुछ बड़ी जिम्मेदारी मिल जाए। वैसे भी बीजेपी में उन्हें दो मौके मिले और वे दोनों बार फेल साबित हुए इसलिए बीजेपी में उनके लिए ज्यादा कुछ बचा भी नहीं था।

डूंगरपुर व बांसवाड़ा विधानसभा सीटों की स्थिति (2008–2023)

डूंगरपुर जिले की 4 सीटें
सीट 2008 2013 2018 2023
डूंगरपुर कांग्रेस भाजपा कांग्रेस कांग्रेस
सागवाड़ा कांग्रेस भाजपा बीजेपी बीजेपी
चौरासी कांग्रेस भाजपा बीजेपी बीएपी
आसपुर कांग्रेस भाजपा भाजपा बीएपी

बांसवाड़ा जिले की 5 सीटें
सीट 2008 2013 2018 2023
घाटोल निर्दलीय भाजपा भाजपा कांग्रेस
बांसवाड़ा कांग्रेस भाजपा कांग्रेस बीएपी
बागीदोरा कांग्रेस कांग्रेस कांग्रेस बीएपी
कुशलगढ़ जनता दल भाजपा निर्दलीय कांग्रेस
गढ़ी कांग्रेस भाजपा भाजपा बीजेपी

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