इला अरुण ने कहा कि मेरे लिए थिएटर एक जिंदगी है, एक मंदिर है। मैं रेलगाड़ी से चर्च गेट तक जाती थी, आज भी थिएटर के हालात ठीक नहीं हैं। आज के यूथ का भी थिएटर को सपोर्ट नहीं है। एक हजार रुपये बर्गर और पिज्जा में खर्च कर देंगे। युवाओं का रुझान मॉल की तरफ है। 300 रुपये खर्च करके थिएटर में जाना पसंद नहीं करते। उधर, पिछले 40 साल से सरकार की मदद भी नहीं मिल रही है, जिसके चलते थिएटर आगे नहीं बढ़ रहा है।
सिंगर इला अरुण ने कहा, 'चोली के पीछे' मेरा सिग्नेचर ट्यून बन चुका है। थिएटर मेरे लिए मंदिर है। सिंगर इला अरुण ने थिएटर से जुड़े अपने अनुभव शेयर कीं। उन्होंने कहा कि 42 साल से मैं अपना काम कर रही हूं, बिना सरकारी मदद के। लेकिन आज मैं यह कहना चाहूंगी कि लोग पिज्जा बर्गर और मॉल में जाकर अपना पैसा और समय बर्बाद करते हैं, लेकिन थिएटर में आना पसंद नहीं करते।
इस सत्र में एमके रैना, अंजुला बेदी और आसद लल्लीजी ने भी अपने विचार साझा किए। सभी ने इस बात पर सहमति जताई कि थिएटर एक महत्वपूर्ण कला है, लेकिन इसे बचाए रखने के लिए सरकार और समाज दोनों को मिलकर प्रयास करने की जरूरत है।
इला अरुण ने अपनी बात समाप्त करते हुए कहा, थिएटर मेरे लिए मंदिर है। मैं चाहती हूं कि युवा इसकी ओर आकर्षित हों और इस कला को जीवित रखें। जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल इस तरह के सत्र कला और संस्कृति को बढ़ावा देने का एक महत्वपूर्ण मंच साबित हो रहा है।