कब लगी आग?
बताया जा रहा है कि रात 12 बजकर 30 मिनट पर यह आग ट्रॉमा सेंटर में न्यूरो आईसीयू वार्ड के स्टोर में लगी। यहां पेपर, आईसीयू का सामान और ब्लड सैंपलर ट्यूब रखे थे। ट्रॉमा सेंटर के नोडल ऑफिसर और सीनियर डॉक्टर ने बताया कि शॉर्ट सर्किट से आग लगने का अनुमान है। हादसे के समय आईसीयू में 11 मरीज थे। उसके बगल वाले आईसीयू में 13 मरीज थे।
परिजनों का आरोप
परिजनों ने बताया कि घटना रात करीब 12:30 बजे की है। अचानक अंदर से धुआं उठता दिखाई दिया, जिसके बाद अस्पताल का पूरा स्टाफ मौके से भाग गया। इस दौरान मरीजों के साथ मौजूद तीमारदार अपनों-अपनों को लेकर इधर-उधर भागने लगे। परिजनों का आरोप है कि उन्हें लगभग दो घंटे तक कोई सहायता नहीं मिली।
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एक अन्य परिजन ने बताया कि वार्ड के अंदर से तेज बदबू आ रही थी। जब इस बारे में वहां मौजूद अस्पताल कर्मियों को बताया गया, तो उन्होंने लापरवाही भरे अंदाज में कहा कि चाबी आ रही है, उसके बाद देखेंगे। परिजनों का कहना है कि धुएं की जानकारी उन्होंने तीन से चार बार दी, लेकिन कर्मियों ने इसकी अनदेखी की। इसी लापरवाही के कारण कई मरीजों की दम घुटने से मौत हो गई।
हमें अंदर नहीं जाने दिया गया: परिजन
परिजनों ने यह भी आरोप लगाया कि घटना के वक्त न तो कोई डॉक्टर मौजूद था और न ही अन्य चिकित्सा कर्मी। सिर्फ पुलिसकर्मियों ने मौके पर पहुंचकर उनकी मदद की। परिजनों का गुस्सा इस कदर था कि उन्होंने एसएमएस अस्पताल के स्टाफ की लापरवाही को उजागर करते हुए बताया कि सुरक्षाकर्मियों ने समय पर गेट तक नहीं खोला।
उन्होंने सवाल उठाया कि इतनी बड़ी लापरवाही के बावजूद तत्काल कार्रवाई क्यों नहीं की गई। परिजनों ने कहा कि सरकार को क्या फर्क पड़ता है, जलने वाले जल गए, मरने वाले मर गए। उनका आरोप था कि न तो किसी को अंदर जाने दिया गया और न ही किसी को बाहर निकलने दिया गया।
अस्पताल में भर्ती एक मरीज दिलीप सिंह के भाई करण सिंह ने बताया कि मेरे भाई को छत से गिरने से चोट लगी थी, जिसके बाद उसे यहां भर्ती करवाया गया था। उसकी तबीयत में सुधार हो रहा था और आज या कल उसे छुट्टी मिलने वाली थी। हादसे को लेकर उन्होंने कहा कि मैं तो वहां था नहीं अंदर, मेरी मम्मी जी थीं। जब मैं पहुंचा तो देखा कि भगदड़ मची हुई है। वहां कोई उनके भाई को उठाने वाला तो था नहीं, बाकी लोगों के परिजन उन्हें उठा रहे थे। धुएं की वजह से उनके भाई को सांस लेने में रुकावट आ गई और दम घुटने से उसकी मौत हो गई। वह नेत्रहीन था और हमलोग ही उसकी देखभाल करते थे।
परिजनों ने सुनाई आपबीती
- फोटो : अमर उजाला
भाग गए थे डॉक्टर और कंपाउंडर
नरेंद्र सिंह, एक अन्य रिश्तेदार ने बताया कि उन्हें शुरुआत में आईसीयू में आग लगने की जानकारी ही नहीं थी। उन्होंने कहा कि मैं तो नीचे खाना खाने आया था, तब मुझे कुछ पता नहीं था। वहां आग बुझाने के लिए कोई उपकरण या सुविधा भी नहीं थी। मेरी मां वहां भर्ती थीं।
वहीं ओम प्रकाश, जिनके 25 साल के मामा के लड़के को भर्ती कराया गया था। उन्होंने हादसे को लेकर बताया कि जब धुआं फैलना शुरू हुआ तो मैंने डॉक्टरों को चेतावनी दी थी कि इससे मरीजों को तकलीफ हो सकती है। लेकिन जब तक धुआं ज्यादा फैल गया, तब तक डॉक्टर और कंपाउंडर वहां से भाग चुके थे।