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शहरों की सत्ता से आगे की लड़ाई: दूसरे चरण में भाजपा-कांग्रेस की सियासी जमीन का होगा टेस्ट, जानिए क्यों?

Thu, 10 Sep 2026 04:21 PM IST
Sourabh Bhatt न्यूज डेस्क, अमर उजाला, जयपुर

सार

राजस्थान निकाय चुनाव के दूसरे चरण में छह बड़े नगर निगमों के 4,774 वार्डों पर मतदान होगा। पहले चरण से तुलना करें तो इस बार वार्ड और प्रत्याशी कम हैं, लेकिन फिर भी दूसरे चरण के चुनाव सियासत पर ज्यादा असर रखते हैं..जानिए क्यों?
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राजस्थान निकाय चुनाव - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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Rajasthan Politics: राजस्थान के शहरी निकाय चुनाव अब उस दौर में पहुंच गए हैं, जहां मुकाबला सिर्फ नगर निगमों की सत्ता का नहीं, बल्कि भाजपा की शहरी पकड़ और कांग्रेस की वापसी की ताकत का इम्तिहान बन गया है। शुक्रवार को होने वाले दूसरे चरण में जयपुर से लेकर जोधपुर तक बड़े शहरों के साथ कई दिग्गज नेताओं की साख भी दांव पर है। मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा की राजधानी जयपुर में भाजपा के प्रदर्शन पर नजर होगी, तो पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के गढ़ जोधपुर में कांग्रेस के सामने अपनी राजनीतिक जमीन बचाने की चुनौती होगी। इन नतीजों से यह भी संकेत मिलेगा कि बड़े शहरों का मतदाता सत्ता के साथ खड़ा है या बदलाव का मूड बना चुका है।
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राजस्थान के निकाय चुनाव का पहला चरण संख्या के लिहाज से बड़ा है, लेकिन राजनीतिक वजन के मामले में दूसरा चरण ज्यादा भारी पड़ता दिख रहा है। पहले चरण में 162 निकायों के 5,393 वार्डों में मतदान हुआ, जबकि दूसरे चरण में 4,774 वार्डों के लिए वोट डाले जाएंगे। पहले चरण में करीब 57.5 लाख मतदाता और 20 हजार से ज्यादा प्रत्याशी मैदान में थे, जबकि दूसरे चरण में 87.60 लाख मतदाता 18,266 प्रत्याशियों का फैसला करेंगे।

आंकड़ों में भले ही दूसरे चरण में वार्ड और प्रत्याशी कम हों, लेकिन इस चरण में जयपुर, जोधपुर, कोटा, उदयपुर, अजमेर और पाली जैसे छह बड़े नगर निगम शामिल हैं। यही वजह है कि 11 सितंबर का मतदान केवल पार्षद चुनने का चुनाव नहीं, बल्कि भाजपा और कांग्रेस के लिए बड़े शहरी इलाकों में अपनी राजनीतिक पकड़ और संगठन की ताकत परखने का मौका भी है।
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राजधानी जयपुर से शुरू होगा सियासी संदेश
दूसरे चरण का सबसे बड़ा केंद्र जयपुर है। राजधानी में 150 वार्डों के लिए 723 प्रत्याशी मैदान में हैं और 24.33 लाख से ज्यादा मतदाता अपने प्रतिनिधि चुनेंगे। पहले चरण से इसकी तुलना करें तो अकेले जयपुर में पहले चरण के 162 निकायों के कुल वोटर्स का 42 प्रतिशत से ज्यादा है। हालांकि जयपुर का महत्व सिर्फ इसलिए नहीं है कि यह प्रदेश का सबसे बड़ा शहरी निकाय है और यहां सबसे ज्यादा वोटर है। बल्कि यहीं सरकार बैठती है और यहीं सत्ता के फैसलों का सीधा असर दिखाई देता है। यहां जीत और हार के मायने दूर तक असर डालने वाले होते हैं। सरकार की असल रेटिंग यहीं से तय होगी। जहां जीत-हार पार्षद से ज्यादा सत्ताधारी दल और विपक्ष से सीधे जोड़ी जाती है। 

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जोधपुर में गहलोत के गढ़ की परीक्षा
दूसरे चरण का दूसरा बड़ा राजनीतिक केंद्र जोधपुर है। यह पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत का राजनीतिक गढ़ माना जाता है। इसलिए जोधपुर नगर निगम के नतीजों को कांग्रेस के लिए खास तौर पर प्रतिष्ठा से जोड़कर देखा जाएगा। यहां सवाल सिर्फ यह नहीं होगा कि कौन कितने वार्ड जीतता है। राजनीतिक नजरिया यह भी रहेगा कि गहलोत के प्रभाव वाले शहर में कांग्रेस अपनी पकड़ कितनी कायम रख पाती है और भाजपा कितनी सेंध लगा पाती है। 

कोटा में बिरला से धारीवाल तक बड़े चेहरे
कोटा में भी मुकाबला कम अहम नहीं है। लोकसभा अध्यक्ष और कोटा से सांसद ओम बिरला की राजनीतिक जमीन होने के साथ यहां कांग्रेस के वरिष्ठ नेता शांति धारीवाल का भी मजबूत प्रभाव रहा है। भाजपा की ओर से मंत्री मदन दिलावर और हीरालाल नागर जैसे बड़े चेहरे भी कोटा संभाग की राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका रखते हैं। इसलिए कोटा नगर निगम के नतीजे यह संकेत देंगे कि शहर की राजनीति में भाजपा का संगठन कितना मजबूत है और कांग्रेस के पुराने स्थानीय समीकरण कितने प्रभावी हैं। यहां नगर निगम चुनाव का असर सिर्फ बोर्ड बनाने तक सीमित नहीं रहेगा। दोनों दलों के स्थानीय नेताओं की ताकत का आकलन भी इन्हीं नतीजों से होगा।

उदयपुर में कटारिया की विरासत बनाम कांग्रेस
उदयपुर में मुकाबले का राजनीतिक महत्व अलग है। भजनलाल सरकार के सहकारिता मंत्री गौतम दक यहीं से आते हैं। वहीं  समय तक यहां की राजनीति का बड़ा चेहरा रहे हैं। मौजूदा सांसद मन्नालाल रावत भी भाजपा के प्रमुख नेताओं में हैं। इसके अलावा पंजाब के राज्यपाल गुलाबचंद कटारिया भी मेवाड़ में बीजेपी का लंबे समय तक चेहरा रहे हैं। कांग्रेस की ओर से भी यहां मजबूत स्थानीय राजनीतिक आधार रहा है। ऐसे में 80 वार्डों वाले उदयपुर नगर निगम का चुनाव यह देखने का मौका देगा कि भाजपा अपनी पुरानी राजनीतिक पकड़ को बरकरार रखती है या कांग्रेस शहरी क्षेत्र में वापसी करती है।

अजमेर में विधानसभा अध्यक्ष से केंद्रीय मंत्री तक की प्रतिष्ठा
अजमेर में भी चुनावी मुकाबला बड़े राजनीतिक चेहरों से जुड़ जाता है। विधानसभा अध्यक्ष वासुदेव देवनानी अजमेर की राजनीति का प्रमुख चेहरा हैं, जबकि अजमेर सांसद और केंद्रीय राज्य मंत्री भागीरथ चौधरी भी भाजपा के महत्वपूर्ण नेता हैं। कांग्रेस की तरफ से पूर्व मंत्री रघु शर्मा जैसे बड़े चेहरे का राजनीतिक प्रभाव रहा है। इसलिए अजमेर के 80 वार्डों का परिणाम दोनों दलों के लिए स्थानीय संगठन और नेताओं की पकड़ का टेस्ट होगा।

पाली में भाजपा संगठन की परीक्षा
पाली नगर निगम भले ही दूसरे चरण के छह निगमों में सबसे छोटा हो, लेकिन राजनीतिक महत्व कम नहीं है। भाजपा प्रदेश अध्यक्ष मदन राठौड़ का क्षेत्र होने के कारण यहां पार्टी के संगठनात्मक प्रदर्शन पर विशेष नजर रहेगी। पाली से सांसद और पूर्व केंद्रीय मंत्री पीपी चौधरी तथा भाजपा के वरिष्ठ नेता ज्ञानचंद पारख भी यहां महत्वपूर्ण राजनीतिक चेहरे हैं।

छह निगमों में एक साथ होगा शहरी वोट का टेस्ट
दूसरे चरण की सबसे बड़ी राजनीतिक खासियत यही है कि राजधानी से लेकर पूर्व मुख्यमंत्री के गढ़ और बड़े राजनीतिक नेताओं के प्रभाव वाले शहर एक ही चरण में चुनावी परीक्षा से गुजरेंगे। जयपुर बताएगा कि राजधानी का शहरी मतदाता सरकार और विपक्ष को किस नजर से देख रहा है। जोधपुर में गहलोत के प्रभाव की परीक्षा होगी। कोटा में बिरला-धारीवाल जैसे बड़े राजनीतिक चेहरों के प्रभाव और स्थानीय संगठन की ताकत का आकलन होगा। उदयपुर और अजमेर में भाजपा-कांग्रेस के पुराने समीकरणों की परीक्षा होगी, जबकि पाली में प्रदेश भाजपा संगठन की पकड़ पर नजर रहेगी।

पहला चरण संख्या में बड़ा, दूसरा चरण राजनीतिक रूप से भारी
पहले चरण में 162 निकाय और 5,393 वार्ड हैं, जबकि दूसरे चरण में 4,774 वार्ड हैं। लेकिन दूसरे चरण में छह नगर निगम होने के कारण इसके परिणामों का राजनीतिक संदेश कहीं बड़ा हो सकता है। पहले चरण के नतीजे 14 सितंबर को आएंगे। उसी दिन यह तस्वीर भी सामने आने लगेगी कि स्थानीय निकायों में भाजपा और कांग्रेस में किसका पलड़ा भारी रहा। लेकिन दूसरे चरण के नतीजे खास तौर पर यह बताएंगे कि राजस्थान के बड़े शहरों में सत्ता पक्ष की पकड़ कितनी मजबूत है और विपक्ष कितनी वापसी कर पाया है।

इनका कहना है....

वरिष्ठ पत्रकार मनीष गोधा बताते हैं कि दूसरे चरण में वार्ड संख्या के हिसाब से कम हो लेकिन जितने बड़े शहर जितने भी हैं वह सब इसी में शामिल हैं। इसका इंपैक्ट ज्यादा है। वोटर संख्या ज्यादा है। शहरी मतदाता का असल मेंडेट इसी से माना जाएगा। पहले चरण में जो निकाय थे उनमें ज्यादातर निकाय वे हैं जो पंचायतों से अपग्रेड हुए हैं। दूसरे चरण की बात करें तो अकेले जयपुर में ही 24 लाख से ज्यादा मतदाता है-इसलिए पॉलिटिकल नरेटिव सेट करने के लिए यह फेज सबसे महत्वपूर्ण है।
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वरिष्ठ पत्रकार त्रिभुवन का कहना है कि शहरी निकायों में बीजेपी का ट्रेंड देखने को मिलता है। पहले चरण में ज्यादातर छोटे निकाय थे जबकि इस फेज में बड़े शहर शामिल हैं। 10 में से 6 मेयर इसी फेज में चुने जाने हैं। मेयर और नगर परिषद के चेयरमैन ज्यादा पावरफुल होते हैं। राजस्थान के कई नेता नगर निकायों के सभापति बनकर विधायक और सांसद रहे हैं। 
 
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