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लोकतंत्र के उत्सव में 'मीरा नाचती है, वोट बेचती है'

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सागरनामा के सफ़र के पहले दिन के दौरान राष्ट्रीय राजमार्ग संख्या आठ पर चौमू-अजमेर के बीच ट्रक एक कतार में खड़े हैं। एक सपेरन अपनी किशोर बेटी के साथ अपने पारंपरिक गीत-संगीत से थके-हारे ट्रक ड्राइवरों का मनोरंजन कर रही है।
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हमारी कार रुकती देख वे उस ओर चली आती हैं। गीत-संगीत बजाते हुए। उन्हें पैसे चाहिए, कम से कम इतने कि एक किलो आटा आ सके। मां ढपली बजाती है। बेटी मीरा उसकी धुन पर नाचती है। पूछने पर वह कहती है नाचना-गाना ही उनका जीवन है।

दस रुपए देने पर सपेरन मां महंगाई का हवाला देती है- "बाबू महंगाई ने बुरा हाल कर दिया है। एक किलो आटा 25 रुपए में मिल रहा है। हम करें क्या, खाएं क्या?"

15 साल में ही डालने लगी वोट

करीब 15 साल की मीरा वोट भी डालती है। बिना उम्मीदवार का नाम या उनकी पार्टी के बारे में जाने। सिर्फ़ मीरा ही नहीं, उसके क़बीले के बाकी लोग भी बटन ज़रूर दबाते हैं, बिना उम्मीदवार या उसकी पार्टी के बारे में कुछ जाने।

मीरा बताती है कि हाल ही में हुए विधानसभा चुनावों में उसने फूल पर बटन दबाया। क्यों के जवाब में वह कहती है- गांव के प्रधान ने कहा था इसलिए। लेकिन क्या सपेरे इतने भोले होते हैं कि किसी के भी कहने पर कहीं भी वोट डाल दें? जवाब है नहीं। उन्हें भी अपने वोट की क़ीमत मालूम है।

मीरा बताती है, "हर एक वोट के बदले उन्हें सात-आठ सौ रुपए मिले थे। सिर्फ़ मीरा या उसकी मां को ही नहीं बल्कि उनकी जाति के बाक़ी लोगों को भी पैसे मिले थे।"

'जो पैसा ज्यादा देगा, उसे दूंगी वोट'

16वें लोकसभा चुनाव करीब हैं, क्या मीरा फिर वोट डालेगी? मीरा कहती है ज़रूर डालूंगी लेकिन इस बार उसे ही दूंगी जो ज़्यादा पैसे देगा। मां मीरा की आवाज़ में हां में हां मिला देती है।

मीरा की दोबारा उम्र पूछने पर मां कहती है, "है तो ये पंद्रह-सोलह साल की ही है। लेकिन किसी ने वोट बनवा दिया है।" मां के मुताबिक़ मीरा की शादी हो गई है और पति कॉलेज में पढ़ता है। मीरा कहती है, 'हमारी जाति में जल्दी शादी हो जाती है।'

क्या पढ़ता है पूछने पर मीरा कहती है, मुझे पढ़ाई का नहीं पता, मैं तो बस गाना-बजाना जानती हूं। बीच में ही उसकी मां बोल पड़ती है कि पति सुंदर है इसका।
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सात-आठ सौ रुपये का है एक वोट

सागरनामा के सफ़र पर हम आगे बढ़ जाते हैं और मीरा और उसकी मां गीत-संगीत बजाते हुए अगली किसी और गाड़ी की ओर। मीरा के साथ-साथ लोकतंत्र भी नाचता हुआ दिखता है।

करीब 16 साल की शादीशुदा मीरा का भी वोट है जो महज सात-आठ सौ रुपए में किसी ऐसे नेता को चला जाता है जिसके बारे में वह जानती ही नहीं।

लगता है जैसे मीरा और उस जैसे न जाने कितनों का अस्तित्व सिर्फ़ इसलिए ही है कि कुछ नेताओं का राजनीतिक क़द बढ़ सके।
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