क्या यह सिर्फ लापरवाही है?
IFMS 3.0 सॉफ्टवेयर को प्राइवेट कंपनियों के हाथों लागू करवाने के लिए बड़े अफसर दिन रात एक किए हुए हैं उनकी कोई जिम्मेदारी नहीं है? हो सकता है इस मामल की गाज भी छोटे कर्मचारियों पर गिराकर रसूखतार बच निकलें। लेकिन, जीरो टोलरेंस का दम भरने वाली सरकार ऐसा होता कब तक देखती रहेगी यह भी बड़ा सवाल है?
3 हजार से ज्यादा कर्मचारियों ने उठाया था एडवांस वेतन
गौरतलब है कि पूर्ववर्ती गहलोत सरकार ने 2023 के बजट में कर्मचारियों की सुविधा के लिए Earned Salary Advance Drawal Access Scheme for Government of Rajasthan Employees स्कीम लागू की थी। साथ ही IFMS3.0 सॉफ्टवेयर में इसे लागू करवाने का प्रावधान करवाया गया। इसमें प्रावधान किया गया था कि कर्मचारी सरकार के पार्टनर वित्तीय संस्थान/बैंक से अपने वेतन का 50% एडवांस ले सकेंगे। यह एडवांस वेतन कार्मिक को उसी महीने के देय वेतन से अगले महीने की एक तारीख को मिलने वाले वेतन से कटौती कर वसूल लिया जाता है।
इसके एवज में वित्तीय संस्था कार्मिक का क्रेडिट स्कोर अपडेट करती है। यह ठीक उसी तरह है जिस तरह लोन लेकर बैंक की किस्त समय पर चुकाने पर सिबिल अपडेट होता है। किश्त समय पर नहीं चुकाने पर सिबिल खराब होता है, जिससे उपभोक्ता को भविष्य में लोन लेने में दिक्कतें आ सकती हैं। राजस्थान में पिछले महीने बुधा राम, नंदलाल, मुकेश कुमार, दिनेश कुमार शर्मा, प्रमोद कुमार, सुरेश कुमार, नेत राम सैनी, अविनाश और राजकुमार मेघवाल समेत 3 हजार से ज्यादा कर्मचारियों ने अर्जित अग्रिम वेतन की सुविधा का लाभ लिया। यह राशि एक फरवरी को देय वेतन से काटी जानी थी। लेकिन, जिम्मेदार अधिकारियों और IFMS 3.0 चला रही निजी कंपनियों की तकनीकी खामी के कारण बिना जांच किए करोड़ों रुपए का वेतन E-Ceiling Software के माध्यम से कर दिया गया।
बीमा की कटौती नहीं हुई, SIPF के 200 फर्जी बिल पास
IFMS 3.0 में टेक्नोलॉजी शिफ्ट के चलते यह पहली गड़बड़ी नहीं है। बीते एक साल से राजस्थान के खजाने को हजारों करोड़ रुपए की चपत लगती आई है और हैरानी यह है कि एक भी बड़े अफसर पर इसकी गाज नहीं गिरी। न पिछली सरकार ने और न ही मौजूदा सरकार ने कोई कार्रवाई की। सिस्टम की खामी के चलते कर्मचारियों के जीवन बीमा की कटौती नहीं हो पा रही। देरी से प्रीमियम जमा करवाने पर जो पेनल्टी लगेगी उसके लिए कौन जिम्मेवार होगा।
एसआईपीएफ डिपार्टमेंट ने 200 कर्मचारियों के फर्जी बिल प्रेशित कर दिए और वित्त विभाग ने बिना जांचे e-Ceiling Software के माध्यम से भुगतान कर दिया। इसमें भी सरकार को करोड़ों रुपए की चपत लगी लेकिन एक भी अफसर का बाल बांका नहीं हुआ।
IFMS 3.0: जिन पर थे आरोप उन्होंने बना दी रिपोर्ट
यही नहीं IFMS 3.0 को लेकर ब्यूरोक्रेसी में एक दूसरे को बचाने का खेल भी शुरू हो गया। जानकारी के मुताबिक मामले में केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण की तरफ से डीओआईटी मंत्री से रिपोर्ट मांगी गई थी। रिपोर्ट तैयार भी की गई, लेकिन जो रिपोर्ट तैयार हुई वह दिखाई ही नहीं गई। बल्कि, जिम्मेदार अफसरों को क्लीन चिट दिलवाने की कोशिश की गई, जिसके लिए दूसरी रिपोर्ट वित्त विभाग से तैयार करवा कर सीएस ऑफिस को भेज दी गई। इस पूरे मामले की डीओआईटी मंत्री को भनक भी नहीं लगने दी गई।
3 सरकारें बदलीं, DOIT में टेंडर वाले अफसर वहीं के वहीं
डीओआईटी में क्या खेल चल रहा है इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि वहां कई ऐसे रसूखदार अफसर हैं तो 3 सरकार बदलने के बाद भी एक ही पोस्ट पर जमे बैठे हैं। यदि, इसके पीछे योग्यता समझी जा रही है तो कारण वह भी नहीं है। सिविल के इंजीनियर को मैकेनिकल की पोस्ट पर लगाने के पीछे क्या मकसद हो सकता है यह समझा जा सकता है।
जानिए पहले क्यों नहीं होती थी ऐसी गड़बड़ी?
- IFMS सॉफ्टवेयर राजस्थान की वित्तीय प्रणाली को पिछले 12 सालों से चला रहा है। लेकिन पहले इस तरह के मामले कभी नहीं हुए। अमर उजाला ने इसकी तह तक जाकर जानकारी जुटाई।
- IFMS 2.0 में भुगतान के अधिकार ट्रेजरी ऑफिसेस को थे। सरकार कर्मचारियों और लेखाधिकारियों की हजारों की संख्या में वर्कफोर्स बिलों की त्रिस्तरीय जांच करती थी। बिलों का वेरिफिकेशन होने के बाद ही पास होते थे।
- IFMS 1.0 से 2.0 तक का काम केंद्र सरकार की एजेंसी एनआईसी करती थी। इसमें 1.0 से 2.0 तक जाने के लिए सिर्फ सिस्टम अपग्रेट करना पड़ा।
- IFMS 3.0 में अफसरों ने एनआईसी को हटाकर पीडब्लूसी और दूसरी विदेशी कंपनियों को ठेके पर काम दे दिया। इन कंपनियों ने 12 साल से चल रही टेक्नोलॉजी को जावा से रिप्लेस करने की कार्रवाई शुरू कर दी। जो काम एनआईसी महज 65 करोड़ रुपए में कर रही थी उसी काम को करने के लिए प्राइवेट कंपनियों के लिए 1000 करोड़ तक का बजट बढ़ा दिया गया।
- IFMS 3.0 में टेक्नोलॉजी शिफ्ट होने के साथ सब कुछ ऑटोमेशन पर छोड़ दिया गया। किसी तरह की कोई जांच नहीं होने से बिलों के फर्जी भुगतान के मामले हर रोज सामने आ रहे हैं।