राजस्थान की अजमेर लोकसभा सीट राजस्थान की उन चंद लोकसभा सीटों में से है, जहां कांग्रेस और भाजपा में कांटे की टक्कर कही जा सकती है।
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इस सीट से केन्द्रीय मंत्री व प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष सचिन पायलट के सामने मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे ने सोची-समझी रणनीति के तहत खुद की सरकार के कैबिनेट मंत्री सांवर लाल जाट को खड़ा किया है।
विधानसभा चुनाव में चारों खाने चित होने के कारण हताश व ऊर्जाविहीन प्रदेश कांग्रेस का जिम्मा आठ सप्ताह पहले ही सचिन पायलट को मिला है।
प्रदेश कांग्रेस के कप्तान होने के नाते खुद की सीट पर ही नहीं पूरे प्रदेश में ये चुनाव उनके लिए अग्नि परीक्षा की तरह साबित होनेवाले हैं।
सूत्रों ने बताया कि जल संसाधन मंत्री बने रहने के कारण जाट लोकसभा चुनाव नहीं लडऩा चाहते थे, लेकिन राजे को दो बार मना करने के बाद तीसरी बार मजबूरन हां करना पड़ा।
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अब उनके दोनों हाथों में लड्डू हैं। जीत गए तो ठीक, नहीं तो वर्तमान पद सुरक्षित है। इस सीट में आनेवाली सभी विधानसभा सीटों पर भाजपा का कब्जा है। रोचक बाद यह है कि सभी जाट को जिताना चाहते है, जिससे मंत्री पद खाली हो और उनका नम्बर आए। ऐसे में सुस्त मुद्दई से नहीं, पायलट का मुकाबला उसके चुस्त गवाहों से है।
पायलट ने झोंकी जान, सांवर कर रहे हैं आराम
प्रतिष्ठा बचाने के लिए खुद की सीट जीतने को सचिन पायलट ने जान झोंक रखी है। कांटे की टक्कर के चलते वे जमकर जनसम्पर्क कर रहे हैं और विधानसभा चुनाव के दौरान रूठे कांग्रेसियों को मनाने के लगातार प्रयास कर रहे हैं।
उनके प्रयास काफी हद तक सफल भी हो रहे हैं। इधर, सांवरलाल जाट टिकट मिलने से खुश नजर नहीं आ रहे हैं। राजे की सभा में भी उनका चेहरा मुर्झाया सा रहा।
राजे ने उन्हें मंच पर माला पहनाते हुए कहा था कि मुस्कुरा भी दो और इस माला को फंदा समझकर पहन लो। इस सभा को दो सप्ताह हो गए, लेकिन सांवर लाल उतने उत्साह से सक्रिय नहीं हुए, जितना कि विधानसभा चुनाव के समय में रहे थे।
अगर राजे का दांव जीता तो..
इस लोकसभा सीट में आनेवाली विधानसभा सीटों के विधायक सांवरलाल को जिताने के लिए जमकर प्रयास कर रहे हैं।
हालांकि इस काम में पार्टी को बढ़त दिलाने के बजाय अधिक मंशा यह है कि सांवल लाल जीतकर लोकसभा जाएं और उनका नम्बर मंत्री पद के लिए आए।
खेल इन विधायकों ने ही रोचक बनाया हुआ है। राजे के निकट होने के कारण संवरलाल पिछली राजे सरकार में भी जल संसाधन मंत्री थे।
इस क्षेत्र के वासुदेव देवनानी सहित वरिष्ठ विधायकों को पता है कि सांवरलाल के रहते उनका केबिनेट मंत्री बनने का सपना अधूरा रह सकता है।
कांग्रेस की अग्नि परीक्षा
विधानसभा चुनाव में राजस्थान की 200 में से मात्र दस प्रतिशत सीटें हासिल कर पाई कांग्रेस ने आठ सप्ताह पहले ही पायलट को प्रदेश की जिम्मेदारी सौंपी और ये लोकसभा चुनाव सामने आ खड़े हुए हैं।
वसुंधरा राजे इस चुनाव में पायलट को खुद की सीट पर ही व्यस्त रखना चाहती थीं और उन्हों मजबूत जाट समाज के प्रत्याशी के तौर पर सांवर लाल को इस सीट से उतारा।
अब पायलट को ऐसा कड़ा मुकाबला मिल रहा है कि वे अपनी सीट के अलावा अन्य सीटों पर कहीं प्रचार के लिए निकल पा रहे।
कांग्रेस की उम्मीदें
इस सीट पर करीब 16.5 लाख मतदाता हैं। पायलट को गुर्जर समाज के करीब दो लाख मत मिलने का भरोसा है।
साथ ही, अनुसूचित जाति व जनजाति के यहां 3.5 लाख वोट हैं और अल्पसंख्यकों के 2 लाख मतों से भी पायलट को काफी उम्मीदे हैं। पायलट ने पिछली बार भाजपा की किरण माहेश्वरी को 70 हजार वोटों से हराया था और इस बार पायलट डेढ़ लाख वोटों से जीतने का दावा भी कर रहे हैं।
पायलट के खिलाफ खड़े जाट उम्मीदवार के चलते यहां के एक लाख से ऊपर राजपूत मतदाताओं में से कई कांग्रेस के पक्ष में भी वोटिंग कर सकते हैं।
भाजपा के टिकट वितरण को लेकर राजपूत समाज नाराज भी चल रहा है। उनका आरोप है कि भाजपा ने टिकट देने में वरिष्ठ नेता जसवंत सिंह सहित कई राजपूतों की अनदेखी की है।
बीजेपी के हित में ये समीकरण
सांवरलाल जाट को अजमेर लोकसभा सीट के 2.5 लाख जाट मतदाताओं से काफी उम्मीदे हैं।
यही नहीं, इस समय देशभर में महंगाई व भ्रष्टाचार को लेकर कांग्रेस के खिलाफ चल रही लहर तथा बदलाव चाहनेवालों के लिए चल रही मोदी लहर भी उनके साथ है।
इस सीट पर सवर्ण वोट करीब 5 लाख हैं और विशेषज्ञ मान रहे हैं कि इन लहरों के चलते इनमें से 80 प्रतिशत मत भाजपा के खाते में जा सकते हैं।
इस लोकसभा सीट में आनेवाली आठों विधानसभा सीटें इस समय भाजपा के पास हैं और सभी विधायक भाजपा को जिताने में कोर-कसर नहीं छोडऩा चाहते। ये फायदा भी सांवललाल के खाते में है।
पायलट की साफ छवि और युवाओं में पैठ है। साथ ही,वर्तमान सांसद होने के नाते पायलट के पास गिनाने के लिए काम भी हैं।
चुनाव प्रचार के दौरान वे जनता के बीच पहुंचकर बता रहे हैं कि उनके समय में ही केन्द्रीय विश्वविद्यालय, हवाई अड्डा, सेंट्रल एक्साइज व डाक विभाग का प्रशिक्षण केन्द्र यहां आया तथा स्लम फ्री योजना भी वे यहां लाए।
दो दर्जन से अधिक ट्रेने भी राजस्थान को मिलीं। लेकिन इन सब के बावजूद उन्हें केन्द्र सरकार की खराब छवि का नुकसान उठाना पड़ सकता है।