धौलपुर में बुधवार को देव छठ के अवसर पर सभी तीर्थ के भांजे तीर्थराज मचकुंड पर आस्था का सैलाब उमड़ पड़ा। मचकुंड सरोवर में साधु संत एवं श्रद्धालुओं ने आस्था की डुबकी लगाई। भगवान श्री कृष्ण की पूजा अर्चना की गई। नव विवाहित जोड़ों ने कलंगियों का विसर्जन किया। देर रात तक विशाल लक्खी मेले का आयोजन किया जाएगा। देव छठ मेले में कानून व्यवस्था बनाए रखने के लिए भारी तादाद में पुलिस बल भी तैनात किया गया है।
देव छठ महापर्व के अवसर पर बुधवार को धौलपुर शहर के ऐतिहासिक तीर्थराज मचकुंड पर साधु संत एवं श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ पड़ी। सुबह 4 बजे भगवान श्री कृष्ण की मंगला आरती के बाद श्रद्धालुओं का आना-जाना शुरू हो गया। श्रद्धालुओं द्वारा मचकुंड सरोवर में स्नान कर आस्था की डुबकी लगाई। मचकुंड मेले में महिला एवं बच्चों की भारी संख्या देखी गई। सर दारूओं द्वारा पूजा अर्चना कर साधु संतों को दान भी किया गया। हवन एवं धार्मिक अनुष्ठान जगह श्रद्धालुओं द्वारा किए गए।
मचकुंड महाराज के दर्शन के बाद ही चार धाम की यात्रा पूरी होती है
मंदिर महंत कृष्ण दास ने बताया देव छठ के दिन ऐतिहासिक तीर्थराज मचकुंड पर लक्खी मेले का आयोजन किया जाता है। लाखों की तादाद में श्रद्धालु आस्था लेकर पहुंचते हैं। भगवान मचकुंड श्रद्धालुओं की मनोकामना पूरी करते हैं। उन्होंने बताया तीर्थों की नानी देवयानी के बारे में बताया जाता है, लेकिन राजस्थान के धौलपुर जिले में स्थित मचकुंड को तीर्थों का भांजा कहा जाता है। मान्यता है कि मचकुंड महाराज के दर्शन के बाद ही चार धाम की यात्रा पूरी होती है। मचकुंड मेले में राजस्थान के विभिन्न जिलों के लोगों के साथ ग्वालियर, मुरैना, अयोध्या, वृन्दावन, मथुरा एवं अन्य स्थानों से भी श्रद्धालु आते हैं। मचकुंड सरोवर में साधु संत शाही स्नान करते हैं और उसके बाद मेले का आगाज होता है। यह मेला गणेश चतुर्थी के बाद छठ को आयोजित होता है। मचकुंड मेले में बड़ी संख्या में साधु-संत बैंड-बाजों के साथ पहुंचते है। मान्यता है कि मचकुंड सरोवर में देवछठ वाले दिन स्नान करने वालों को पुण्य लाभ मिलता है।
मचकुंड मेले की मान्यता
देवासुर संग्राम के बाद जब राक्षस कालयवन के अत्याचार बढ़ने लगे। द्वापर युग में रक्षा के अत्याचार से सभी परेशान थे, तब भगवान श्री कृष्ण ने कालयवन को युद्ध के लिए ललकारा और उससे युद्ध किया। इस युद्ध में लीलाधर को भी हार का मुह देखना पड़ा, तब लीलाधर ने छल से मचकुंड महाराज के जरिए कालयवन का वध कराया था, जिसके बाद कालयवन के अत्याचारों से पीड़ित ब्रजवासियों में खुशी कि लहर दौड़ गई। इसके बाद से ही आज तक मचकुंड महाराज की तपोभूमि देवछठ के मौके पर स्नान पर्व लिया जाता है। ऐसी मान्यता भी बताई गई है, नव विवाहित जोड़ों की कलंगियों का विसर्जन किया जाता है। मचकुंड भगवान के आशीर्वाद से दाम्पत्य जीवन में हमेशा खुशियां बनी रहती हैं।