भारतीय जनता पार्टी के दिग्गज जसवंत सिंह को अगर यह गलतफहमी थी कि वो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को आंखें दिखाकर पार्टी में बने रह सकते हैं और मनचाही जगह से टिकट पा सकते हैं, तो वह अब दूर हो गई है।
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आखिर कौन बीजेपी नेता है, जो यह कहने की हिम्मत कर सके कि सरसंघचालक की बात कोई ईश्वर की वाणी नहीं है कि उसे मान लिया जाए?
जसवंत सिंह ने नवंबर 2013 में बीबीसी को दिए एक इंटरव्यू में कहा था कि पूर्व सरसंघचालक प्रोफेसर राजेंद्र सिंह उर्फ रज्जू भैया की बात “कोई श्रीकृष्ण उवाच, ईश्वर की वाणी नहीं है...मैं (उनकी बात से) सहमत नहीं हूं”?
संदर्भ था साल 1999 में एअर इंडिया के विमान का अपहरण जिसे चरमपंथी कंधार ले गए थे। तब रज्जू भैया ने कहा था कि हिंदू डरपोक होता है और विमान में सवार हिंदू युवकों को इकट्ठा होकर अपहरणकर्ताओं को काबू कर लेना चाहिए था।
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इस पर जसवंत सिंह ने कहा था कि वो दिवंगत आरएसएस प्रमुख की बात से सहमत नहीं है क्योंकि वो ईश्वर की वाणी नहीं है। संघ के वरिष्ठ नेता भारतीय जनता पार्टी और उसके नेताओं पर कडी से कडी टिप्पणी करने से नहीं चूके हैं पर आम तौर पर भारतीय जनता पार्टी के नेता संघ के अधिकारियों पर कडवी टिप्पणी करने से बचते हैं।
खामियाजा?
पर जसवंत सिंह ने यह हिम्मत की और अब भारतीय जनता पार्टी ने बाडमेर से लोकसभा चुनाव लडने की उनकी ख्वाहिश को पूरा नहीं होने दिया। उनकी जगह कांग्रेस छोडकर हिंदुत्ववादी पार्टी में आ पहुंचे कर्नल सोनाराम को टिकट दे दिया गया।
पार्टी महासचिव अरुण जेटली ने जसवंत सिंह को ‘एडजस्ट’ करने की बात कहकर जैसे उनके जख्मों पर नमक छिडक दिया और सिंह ने कहा कि “मैं कोई मेज कुर्सी नहीं हूं कि मुझे कहीं ‘एडजस्ट’ कर दिया जाए”।
जिस लोकसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी, और दरअसल आरएसएस का सर्वस्व दांव पर लगा हो, उससे ऐन पहले जसवंत सिंह ने आजाद उम्मीदवार के तौर पर बाडमेर से पर्चा दाखिल करके बगावत का बिगुल बजा ही दिया है।
यह पहले भी कई बार कहा जा चुका है कि 2014 का चुनाव भारतीय जनता पार्टी नहीं बल्कि आरएसएस लड रहा है। पिछले दस साल से संघ सत्ता की परिधि से बाहर रहा है और उसे इसका नुकसान भी हुआ है। इसलिए इस बार वह चाहता है कि किसी भी कीमत पर केंद्र में स्वयंसेवकों की सरकार बने।
हालांकि अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की सरकार के दौरान जब संघ और विश्व हिंदू परिषद जैसे आनुषांगिक संगठनों ने पर्दे के पीछे से सरकार पर नियंत्रण करने की कोशिश की थी तो वाजपेयी ने एक बार इस्तीफा देने की धमकी तक दे डाली थी।
वाजपेयी जैसा बूता
उस दौर में बीजेपी और संघ के रिश्तों में इतनी खटास आ गई थी कि संघ के बुजुर्ग नेता दत्तोपंत ठेंगडी ने अटल बिहारी वाजपेयी की तुलना "घटिया राजनीतिज्ञ" से कर दी। तभी रामलीला मैदान में भारतीय मजदूर संघ की एक रैली में ठेंगडी ने तत्कालीन वित्तमंत्री यशवंत सिन्हा को खुलेआम अपराधी कहा था।
अटल बिहारी वाजपेयी संघ के कटाक्षों और हमलों के सामने खडे रहे चूंकि वो अटल बिहारी वाजपेयी थे, और उस दौर में सरसंघचालक कोई कद्दावर नेता नहीं बल्कि कुप्पहल्लि सीताराम सुदर्शन थे जिन्हें उनके कार्यकाल में ही हटा दिया गया था।
पर जसवंत सिंह हों या मुरली मनोहर जोशी या लालकृष्ण आडवाणी हों- इनमें वाजपेयी जैसा बूता नहीं है जो राजनीतिक परिदृश्य के हर रंग में अपने प्रशंसक पा सके।
इस समय आरएसएस के विचार और कार्यक्रम को कमर कसकर और पूरे उग्र भाव से लागू करने वाला अगर कोई नेता है, तो वो हैं नरेंद्र दामोदर मोदी।
इसलिए मोदी की राह में रोडा बनने वाले हर बाहरी या भीतरी तत्व को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ बर्फ में लगाने में संकोच नहीं करेगा- जैसा कि मुरली मनोहर जोशी और आडवाणी को किया।
किसकी बीजेपी?
बाडमेर से जसवंत सिंह को टिकट न दिए जाने के एक से अधिक कारण हो सकते हैं। नरेंद्र मोदी के नेतृत्व को स्वीकार कर चुके पार्टी के नेता मानते हैं कि यह चुनाव लडने के लिए या अपना कोई तर्क सिद्ध करने के लिए नहीं बल्कि जीतने और केंद्र में सरकार बनाने के लिए लडा जा रहा है।
ऐसे में जीतने की संभावना वाले उम्मीदवारों को ही टिकट दिया जा रहा है और इसके कारण बडे-बडे महारथियों को रथ से या तो उतार दिया जा रहा है या फिर उन्हें समरक्षेत्र के अंधेरे कोनों में जाने को कह दिया गया है।
बाडमेर में जिन सोनाराम को टिकट दिया गया है वह 1996, 1998 और 1999 में कांग्रेस से चुनाव जीत चुके हैं। सिर्फ 2004 के चुनावों में जसवंत सिंह के बेटे मानवेंद्र सिंह ने यहां से लोकसभा चुनाव जीता। पिछले चुनावों में भी कांग्रेस प्रत्याशी ही बाडमेर से जीते। अब बीजेपी को लगता है कि जसवंत सिंह को चुनाव अपनी पिछली सीट दार्जिलिंग से ही लडना चाहिए।
ये सभी जानते हैं कि जसवंत सिंह ने संघ की शाखाओं में राजनीतिक दीक्षा नहीं ली। पर बीजेपी में सुषमा स्वराज जैसे कई नेता हैं जो आरएसएस की परिधि से बाहर से राजनीति में आए और अब महत्वपूर्ण पदों पर आसीन हैं।
इनमें से कितने नेता हैं जो आरएसएस में “पूजनीय” समझे जाने वाले अधिकारियों की खुलेआम आलोचना करने की हिम्मत कर सकें? अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में जब राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन सत्ता में था तो आरएसएस अरुण जेटली जैसे नेताओं से बहुत खुश नहीं था। पर जेटली हमेशा संघ पर टिप्पणी करने से बचते रहे।
पर जसवंत सिंह ने न तो संघ के पुरोधाओं की परवाह की और न ही अब ये कहने में संकोच किया कि “राजनाथ सिंह और वसुंधरा राजे सिंधिया ने मेरे साथ गद्दारी की, मुझे धोखा दिया।”
साथ ही बाडमेर में जसवंत सिंह के समर्थकों ने अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी की तस्वीरों वाले पोस्टर लगा दिए हैं– यानी संदेश सीधा है कि जिस भारतीय जनता पार्टी में जसवंत सिंह हैं उसके नेता नरेंद्र मोदी नहीं हैं।
जसवंत सिंह एक और संदेश दे रहे हैं कि नरेंद्र मोदी उस भारतीय जनता पार्टी के नेता हैं जिसमें लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी या जसवंत सिंह जैसे कद्दावरों की नहीं बल्कि आपराधिक गतिविधियों में शामिल होने का आरोप झेल रहे (गुजरात के पूर्व गृहमंत्री और नरेंद्र मोदी के दाहिने हाथ) अमित शाह की चलती है।