सूरज से तपते रेगिस्तानों में जहां एसयूवी भी हार मान जाया करती है, वहां रेगिस्तान का जहाज हवा से बात करने के लिए जाना जाता है।
एचटी की खबर के मुताबिक यहां चुनावी तैयारियां धीमी हैं। 3जी पर दौड़ने वाला सोशल मीडिया यहां नहीं हैं और न उम्मीदवारों की गाड़ियों के रेले हैं।
यहां ऊंट हैं, जो इंसान और उसके साजो-सामान को उस जगह तक पहुंचाते हैं, जहां गाड़ियां नहीं पहुंच पातीं।
राज्य में 1 दिसंबर को होने वाले विधानसभा चुनावों के लिए प्रचार जोर पकड़ रहा है, ऐसे में थार रेगिस्तान के दूर-दराज के क्षेत्रों में ऊंट एक बार फिर 'चुनावी चिन्ह' जैसे लग रहे हैं।
कांग्रेस और भाजपा के बीच कड़ी टक्कर है और अशोक गहलोत को पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे की तरफ से चुनौती मिल रही है।
नौ विधानसभा क्षेत्र थार रेगिस्तान में पड़ते हैं, जिनमें जैसलमेर, पोखरन, बाड़मेर शामिल हैं। इन इलाकों में न केवल राजनीतिक दल, बल्कि सरकारी एजेंसियों को भी कामकाज के लिए ऊंटों पर निर्भर रहना पड़ता है।
बाड़मेर के फील्ड पब्लिसिटी ऑफिसर नरेंद्र तनसुखानी ने कहा कि जहां सड़क और संचार की व्यवस्था नहीं, वहां ऊंट कामयाब हैं। उन्होंने कहा, "हम उन इलाकों पर गौर कर रहे हैं, जहां जागरुकता की कमी के कारण वोटिंग पर्सेंटेज काफी कम है। लेकिन इन इलाकों में केवल ऊंटगाड़ी से काम चलता है।"