भाजपा आलासकमान ने जसवंत सिंह के तेवर देखते हुए उन्हें मानाने और प्रलोभन के दौर शुरू कर दिए हैं। भाजपा सूत्रों ने कहा है कि वसुंधरा राजे की ओर से जसवंत सिंह को उनके पुत्र विधायक मानवेन्द्र सिंह को मंत्री पद देने का प्रलोभन दिया गया है।
भाजपा आलाकमान भी जसवंत सिंह को कहीं और से टिकट लेने के लिए मना रही है। भाजपा आलाकमान सहित राजे नहीं चाहती कि जसवंत सिंह बागी होकर निर्दलीय चुनाव लड़े। इससे प्रदेश भाजपा में माहौल खराब होगा और जसवंत सिंह व कर्नल सोनाराम के बीच की टक्कर में भाजपा को एक सीट का नुकसान हो सकता है।
दोनों के मैदान में उतरने से कांग्रेस को फायदा मिल सकता है। जसवंत सिंह एनडीए सरकार में वित्त और विदेश जैसे अहम मंत्रालय संभाल चुके हैं।
जसवंत की नाराजगी की अनदेखी
भारतीय जनता पार्टी की भीतरी कलह खत्म होने का नाम नहीं ले रही। जसवंत सिंह ने पार्टी के निर्णय के खिलाफ बगावत के सुरों को अनदेखा कर दिया है।
पूर्व केंद्रीय मंत्री और दार्जिलिंग से मौजूदा सांसद जसवंत सिंह आखिरी बार गृह प्रदेश से चुनाव लड़ना चाहते थे। और उनकी ख्वाहिश थी कि वो राजस्थान के बाड़मेर से चुनाव लड़ें। सिंह का पुश्तैनी गांव जसौला बाड़मेर जिले में ही पड़ता है।
जिले से भाजपा के छह विधायकों ने जसवंत सिंह को टिकट देने का समर्थन किया था। अब तक के घटनाक्रम को देखते हुए कहा जा सकता है कि इस सीट से जसवंत के चुनाव लड़ने की उम्मीदें समाप्त हो चुकी हैं।
सोनाराम को इसलिए दिया टिकट
जसवंत सिंह पार्टी के वरिष्ठ और पुराने नेताओं में से एक हैं। ऐसे में उनकी आखिरी चुनावी ख्वाहिश को नजरअंदाज किए जाने का बहुत बड़ा कारण है। इस बार पार्टी जीत दिलाने वाले उम्मीदवारों पर दांव लगा रही है और बाड़मेर में भी यही हो रहा है।
सोनाराम चौधरी राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे की पसंद माने जाते हैं। राजे ने पार्टी हाईकमान को समझाया कि बाड़मेर में बड़ी संख्या में जाट रहते हैं, ऐसे में यदि किसी जाट लीडर को टिकट दिया जाए, तो जीत पक्की है।
बीजेपी इस बार सत्ता में आने का कोई भी मौका नहीं गंवाना चाहती। वो इस बार सिर्फ जीतने वाले उम्मीदवारों पर दांव खेल रही है। फिर चाहे उसके लिए वरिष्ठ नेताओं का गुस्सा या नाराजगी क्यों न सहनी पड़े। सोनाराम हाल ही में कांग्रेस छोड़कर बीजेपी में शामिल हुए हैं।
क्या होगा जसवंत का अगला कदम?
अब जब पार्टी ने जसवंत सिंह की ख्वाहिश को ताक पर रख दिया है, तो जाहिर है कि सिंह भी नाराज हो गए हैं। यह लगभग तय है कि आला कमान जसवंत सिंह जैसे पुराने सिपहसालार को मनाने की कोशिश करेगा। मोदी इस वक्त किसी नेता को खफा नहीं करना चाहते। अगर कोई नाराज है, तो वो नाराजगी छिपी रहे, इसमें भाजपा की भलाई है।
जसवंत सिंह पहले ही कह चुके हैं कि यदि उन्हें बाड़मेर से टिकट नहीं मिला, तो वे स्वतंत्र रूप से चुनाव लड़ेंगे। 24 मार्च को ये साफ हो जाएगा कि सिंह अपनी आखिरी चुनावी लड़ाई में भाजपा के साथ रहते हैं या फिर भाजपा के खिलाफ।
सिंह उम्मीद कर रहे हैं कि बाड़मेर सीट से उन्हें जीत मिल सकती है। इसका एक कारण यह भी है कि सिंह के बेटे मानवेंद्र यहां से दो बार चुनाव लड़ चुके हैं।
आडवाणी के बाद दूसरी मुसीबत
इससे पहले पार्टी के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी भी पार्टी से नाराज हो गए थे। आडवाणी अपनी पारंपरकि सीट गांधीनगर से न लड़कर भोपाल से लड़ना चाहते थे। लेकिन पार्टी हाईकमान ने उनकी इस ख्वाहिश को दरकिनार कर उन्हें गांधीनगर से टिकट दे दिया है।
हालांकि आडवाणी को मनाना अकेले पार्टी अध्यक्ष राजनाथ सिंह के बस की बात नहीं थी। इसलिए संघ ने भी पार्टी की आडवाणी को मनाने में मदद की। और आखिरकार कामयाबी मिल गई।
अब जब जसवंत सिंह रूठे हैं, तो मनाने का दौर यहां भी चलेगा। लेकिन देखना यह दिलचस्प रहेगा कि आखिर बार चुनाव लड़ रहे सिंह क्या आडवाणी की तरह अपना गुस्सा पीकर पार्टी के साथ खड़े होंगे या नहीं।