जैन समाज में रविवार को एक भावनात्मक दृश्य देखने को मिला जब दो युवतियों ने सांसारिक जीवन को त्यागकर जैन दीक्षा ग्रहण की। बाड़मेर की मुमुक्षु सेजल बोथरा और बीकानेर की चित्रा पारख ने अपने परिवार की उपस्थिति में जैन धर्म के उच्चतम सिद्धांतों को अपनाते हुए संयम जीवन का व्रत लिया। यह जैन समाज के लिए अपने आप मे गौरव का क्षण रहा।
बाड़मेर की सेजल बोथरा और बीकानेर की चित्रा पारख ने रविवार को शहर के महावीर वाटिका में खरतरगच्छाधिपति आचार्य जिनमणिप्रभसूरीश्वरजी, अचलगच्छाधिपति आचार्य जिनकलाप्रभसूरीश्वरजी सहित जैन मुनियों और साध्वियों की उपस्थिति में दीक्षा ग्रहण की।
दीक्षा से पहले, मुमुक्षुओं ने अपने सांसारिक जीवन की वस्तुओं का त्याग किया और दोनों हाथों से दान किया। परिजनों ने मुमुक्षुओं का विजय तिलक किया। आचार्य श्री ने दोनों मुमुक्षुओं को रजोहरण देते हुए सांसारिक और संयम जीवन के बीच के अंतर को समझाया। दोनों मुमुक्षुओं ने संयम जीवन अपनाने की इच्छा व्यक्त की। रजोहरण मिलते ही मुमुक्षु खुशी से झूम उठे और उन्होंने अपने आभूषण और रंग-बिरंगे वस्त्र त्याग दिए। नए वस्त्र पहनकर पांडाल में लौटने पर, लोगों में उन्हें देखने के लिए जैन समाज के लोगो मे उत्साह नजर आया। केश लोचन के बाद, दीक्षार्थी सेजल बोथरा का नाम साध्वी श्रीसाहित्यनिधि श्रीजी और चित्रा पारख का नाम साध्वी अर्पण निधि श्रीजी रखा गया। दीक्षा समारोह में बड़ी संख्या में जैन समुदाय के लोग शामिल हुए।
खरतरगच्छाधिपति आचार्य जिनमणिप्रभसूरीश्वरजी ने दीक्षा समारोह में कहा कि साधु जीवन की मर्यादा है, साधु हंसते-हंसते कष्ट सहन करता है। उन्होंने आगे कहा कि दुनिया में भी कष्ट सहन करने वाले बहुत सारे हैं, भूख, प्यास, अभाव के कष्ट दुनियाभर के हैं। उन्होंने कहा कि रोते-रोते जो कष्ट सहन करता है वह सांसारिक जीवन है और जो हंसते-हंसते कष्ट सहन करता है उसका नाम साधु।