केंद्र सरकार ने भले ही सूखे का ऐलान करते हुए स्थिति से निपटने के लिए बड़े स्तर पर तैयारियां शुरू करने का ऐलान किया है, लेकिन जमीनी स्तर पर सरकार का कोई प्रयास अभी तक लागू नहीं हो पाया है। कृषि विशेषज्ञों के अनुसार इस सूखे से अब तक कृषि का एक चौथाई हिस्सा चौपट हो चुका है। ऐसे में अगर अब भी बरसात होती है तो खरीफ की फसलों की पछेती किस्में बीज कर सूखे से पड़ने वाले अकाल को कुछ हद तक नियंत्रित किया जा सकता है।
सहायक पौध सुरक्षा अधिकारी रणवीर सिंह यादव ने बताया कि सूखे से जूझ रहे धान उत्पादकों के लिए यह सप्ताह बेहद महत्वपूर्ण है। इस सप्ताह अगर बरसात नहीं हुई तो 20 से 25 प्रतिशत तक फसल पूरी तरह से नष्ट हो जाएगी। उन्हाेंने बताया कि अगर पूरा सावन सूखा जाता है तो धान की खेती को 50 से 60 प्रतिशत तक का नुकसान होगा ऐसे में नहरी पानी ही फसल से ही बचाया जा सकेगा। उनके अनुसार जिन किसानों ने पहली बार धान की रोपाई की है, उन पर सबसे अधिक सूखे की मार पड़ेगी। जबकि नरमे की फसल पर सूखे का खास असर नहीं पड़ेगा।
आढ़तिया एसोसिएशन के प्रधान प्रमिल कलानी के अनुसार सूखे के कारण पंजाब में धान का उत्पादन बहुत प्रभावित होगा। कई क्षेत्रों में खरीफ की फसलों की बुआई भी नहीं हो सकी है। जिससे आने वाले समय में राज्य की अर्थव्यवस्था बुरी तरह से प्रभावित होगी और महंगाई का ग्राफ और ऊंचा होगा। उन्होंने बताया कि सूखे का असर सिर्फ फसलों व किसानों पर ही नहीं होगा, बल्कि आम जनता भी इससे बुरी तरह प्रभावित होगी। बरसात न होने से आने वाले दिनों में पेयजल संकट पैदा हो सकता है।
इसके साथ ही पशुओं के लिए हरे चारे की भी किल्लत आएगी। इसका सीधा असर दुधारू पशुओं पर पड़ेगा जिससे दूध उत्पादन पर भी असर होगा। खेतों में उगी घास पर निर्भर रहने वाले पशुओं का जीवन भी संकट में पड़ सकता है। सूखे के कारण कृषि से जुड़े मजदूर और किसान बेरोजगार हो जाएंगे। कलानी के अनुसार सूखे से निपटने की तैयारी के दावे करने वाली केंद्र सरकार को तुरंत ही मनरेगा में न्यूनतम 200 दिनों के काम का प्रावधान तैयार करना चाहिए और मनरेगा मजदूरों को बिना झंझट सीधे भुगतान को भी सुनिश्चित करना चाहिए। ताकि देश को सूखे के बाद भुखमरी की स्थिति से बचाया जा सके।