पंजाब के मत्तेवाड़ा में टैक्सटाइल प्रोजेक्ट रद्द होने से राहत महसूस की जा रही है, खासकर लुधियाना जैसे औद्योगिक शहर के बाशिंदों को अब मत्तेवाड़ा के जंगल ऑक्सीजन देते रहेंगे। लुधियाना की प्रदूषण से भरी आबोहवा से यहीं की प्रकृति सांस लेने भर के लिए ऑक्सीजन देती है। अकेले मनुष्य ही नहीं, मत्तेवाड़ा जंगलों की कई तरह की दुर्लभ वनस्पति के अलावा सैकड़ों पशु-पक्षियों के आवास भी बच गए हैं।
चिंता इस बात भी थी कि अगर मत्तेवाड़ा में टैक्सटाइल उद्योग लग जाता है तो वहां से निकलने वाला केमिकलयुक्त पानी सतलुज में गिरेगा और विभिन्न जीवों को खतरा पैदा होगा। साथ ही कृषि की उत्पादकता भी प्रभावित होने की आशंका सता रही थी। इन तमाम बातों को देखते हुए लोगों की चिंता जायज लगती थी कि क्या इस जंगल में रहने वाले जीव जंतु, प्राकृतिक वनस्पति इस प्रदूषण को झेल पाएगी।
पंजाब के मत्तेवाड़ा के जंगल को राज्य का फेफड़ा माना जाता है। हालात यह है कि पंजाब सरकार ने छोटे जंगल तैयार करने का प्रस्ताव तैयार किया था, लेकिन दो साल से इससे संबंधित फाइल ही आगे नहीं बढ़ी। उलटा मत्तेवाड़ा जंगल पर खतरा मंडराने लगा था।
जंगल और हरियाली के प्रति उदासीन ही रहीं सरकारें
दरअसल, पंजाब में धान और गेहूं की खेती के कारण जंगलों को रहने ही नहीं दिया गया है। लुधियाना के बाद पटियाला जिले में ही छोटे-छोटे बीहड़ बचे हैं, लेकिन इनकी गिनती बहुत कम है, जबकि यह इलाका पूरी तरह से जंगलों के अधीन था। सरकार जंगल व हरियाली के प्रति कितनी उदासीन रही है, इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि कृषि नीति 2018 को उसी समय में अमल में लाया जाता और हर गांव में ढाई एकड़ का जंगल तैयार किया जाता तो निश्चित तौर पर पंजाब में 30 हजार एकड़ का रकबा जंगल के लिए तैयार होने लगता।
मात्र दस फीसदी क्षेत्र को ही सरकार जैव विविधता केंद्रों में बदल देती तो आज दो साल में ही एक नया मत्तेवाड़ा खड़ा हो जाता, लेकिन त्रासदी यह है कि नए जंगल खड़े करने के बजाय जो सालों से खड़े जंगल हैं, उन्हें ही खत्म करने की योजनाएं बन गई थी।
मत्तेवाड़ा से धार्मिक भावनाएं भी जुड़ीं
वहीं मत्तेवाड़ा जंगलों से पंजाब की धार्मिक भावनाएं भी जुड़ी हुई हैं। मत्तेवाड़ा जंगल से चंद किलोमीटर दूर माछीवाड़ा साहिब का सिख इतिहास में अहम स्थान है। यहां की धरती ने सरबंसदानी श्री गुरु गोबिंद सिंह जी को उस समय ठहराने का गर्व हासिल किया जब चमकौर साहिब व सरहिंद की धरती व सरसा नदी का पानी बेरहम हो गया था। गुरु गोबिंद सिंह जी एक झाड़ के नीचे भी रुके थे, जहां आजकल गुरुद्वारा झाड़ साहिब स्थित है। गुरु महाराज के पैरों से बहता खून इसी धरती पर गिरा था और यहीं पर दसवें पातशाह ने कहा था... मित्र प्यारे नूं हाल मुरीदा दा कहणा।।
बेशक ऐतिहासिकता के अन्य चिन्ह तो लुप्त हो गए हैं लेकिन ऐतिहासिक कुआं जहां से गुरु साहिब ने गुलाबे पंजाबे के बाग से पानी पीया था व जंड का पेड़ जिसके नीचे गुरु साहिब ने टिड का तकिया लेकर विश्राम किया था, आज भी मौजूद है।